रोहड़ी के एक इलाके लोकोशेड में मेरा जन्म स्थान है, वालिद का नाम जुमा खान है। वालिद और वालिदा दोनों तरफ़ से हमारा खा़नदानी मसलक बरेल्वी था और बरेल्वी होने की वाहिद वजह (एकमात्र कारण) जहालत थी। तालीम का कोई खा़स रिवाज नहीं था, अल्बत्ता हमारे वालिदेन ने हम बहन भाइयों को मैट्रिक तक तालीम ज़रूर दिलवाई थी। नज़र व नियाज़ का हमारे हॉं खा़स अहतमाम होता था, हमारे नाना नियाज़ की किसी तारीख़ को नजर अन्दाज़ नहीं करते थे और कुछ न कुछ नियाज़ ज़रूर करते। हमारे वालिद साहब बिलखुसूस (विशेषतः) ग्यारहवी शरीफ़ की नियाज़ बड़ी धूम-धाम से करते, देगें चढ़ती थीं लोग जमा होते और बड़ी रौनक हो जाती। हमारे घर में मजा़रों पर चादरें और नज़र बगै़रह भी चढ़ाई जाती थी। मजा़रों और बुजुर्गों के मुताल्लिक़ बचपन से ही हमें यह अ़की़दा दिया गया था कि यह अल्लाह के हां हमारा वसीला हैं। हम तो गुनाहगार लोग है।, बराहे रास्त हमारी बात अल्लाह के नज़दीक वह मुका़म हासलि नहीं करती जो बुजुर्गों की करती है। इसलिए बुजुर्गों के वसीले से ही जो हाजात (ज़रूरतें) अल्लाह के सामने पहुंचती हैं वह जल्दी पूरी हो जाती हैं।
अगर्चे मैं चादरें बगैरह चढ़ाने वालों को और मजा़रों पर जाकर नज़र व नियाज़ करने वालों को बुरा नहीं समझता था लेकिन कुदरती तौर पर बचपन से आज तक कभी भी मेरा झुकाव इस ओर नहीं हुआ था, घर वाले मजा़रों पर जाते लेकिन मैं कभी नहीं गया, मुझे याद है एक मर्तबा तमाम घर वाले लाल शहबाज़ क़लन्द के मजा़र उनके उर्स में षिर्कत के लिये जा रहे थे, हालांकि एक तफ़रीह का मौका़ भी था लेकिन उस वक्त भी मैंने मजा़र पर जाने के बजाय घर में रहने को तरजीह दी।
अगर्चे हमारे घर में नमाज़ बगै़रह की पाबन्दी नही थी लेकिन बचपन से ही मज़हब की जानिब मेरा झुकाव था, अगर्चे मुस्तक़िल मिजाजी़ नहीं थी, ईमान घटता और बढ़ता रहता था, कभी बाका़यदी से पांच वक्त की नमाज़ें शुरू हो जाती थीं और कभी कई कई दिन हो जाते नमाज़ पढ़े हुए, नमाज़ के मामले में मुस्तक़िल मिजाजी़ तक़रीबन नौ दस साल पहले हासिल हुई जब मैंने यह अ़हद किया कि या अल्लाह मुझे सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर कोई नमाज़ नहीं छोडूंगा और ऐसा ही हुआ, अल्हम्दु लिल्लाह जब से सरकारी मुलाज़िमत मिली उसके बाद से आज तक मुस्तक़िल मिजाजी से नमाजें पढ़ रहा हूं .
अगर्चे मैं चादरें बगैरह चढ़ाने वालों को और मजा़रों पर जाकर नज़र व नियाज़ करने वालों को बुरा नहीं समझता था लेकिन कुदरती तौर पर बचपन से आज तक कभी भी मेरा झुकाव इस ओर नहीं हुआ था, घर वाले मजा़रों पर जाते लेकिन मैं कभी नहीं गया, मुझे याद है एक मर्तबा तमाम घर वाले लाल शहबाज़ क़लन्द के मजा़र उनके उर्स में षिर्कत के लिये जा रहे थे, हालांकि एक तफ़रीह का मौका़ भी था लेकिन उस वक्त भी मैंने मजा़र पर जाने के बजाय घर में रहने को तरजीह दी।
अगर्चे हमारे घर में नमाज़ बगै़रह की पाबन्दी नही थी लेकिन बचपन से ही मज़हब की जानिब मेरा झुकाव था, अगर्चे मुस्तक़िल मिजाजी़ नहीं थी, ईमान घटता और बढ़ता रहता था, कभी बाका़यदी से पांच वक्त की नमाज़ें शुरू हो जाती थीं और कभी कई कई दिन हो जाते नमाज़ पढ़े हुए, नमाज़ के मामले में मुस्तक़िल मिजाजी़ तक़रीबन नौ दस साल पहले हासिल हुई जब मैंने यह अ़हद किया कि या अल्लाह मुझे सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर कोई नमाज़ नहीं छोडूंगा और ऐसा ही हुआ, अल्हम्दु लिल्लाह जब से सरकारी मुलाज़िमत मिली उसके बाद से आज तक मुस्तक़िल मिजाजी से नमाजें पढ़ रहा हूं .
वहाबियों से मुताल्लिक़ मेरे नज़रियात
वहाबियों से मुताल्लिक़ मुझे कोई खा़स मालूमात नहीं थीं, बस इतना सुन रखा था कि यह काफ़िर होते हैं, नज़र व नियाज़ को नहीं मानते, औलिया-अल्लाह के गुस्ताख़ हैं, रसूलुल्लाह पर दरूद व सलाम नहीं पढ़ते, यह सब गुस्ताख़े रसूल हैं। बस जो कुछ सुना उस पर यक़ीन कर लिया था, कभी तहकी़क की ज़हमत गवारा नहीं की थी। अगर्चे इलाके़ में अहले हदीस की मस्जिद मौजूद थी लेकिन मेरा कभी किसी अहले हदीस से वास्ता नहीं पड़ा था।
आ़मिर भाई हमारे क़रीबी दोस्तों से थे, क्रिकेट के अ़लावा भी हमारे दरमियान काफ़ी हम-आहंगी थी। मज़हबी सरगर्मियों में भी वह हमारे साथ ही होते थे। बल्कि वह मस्जिद के मामलात में मुझसे ज़्यादा सरगर्म रहते थे। एक रोज़ में अहले हदीस मसिजद के सामने से गुज़र रहा था, मस्जिद के साथ ही मुहम्मदी लाइब्रेरी थी, जिसमें किताबों के अलावा अहले हदीस उलेमा की तक़रीरों की कैसिटें भी मिलती थीं। मेरी नज़र अचानक उसमें बैठे हुए एक नौजवान पर पड़ी शकल तो बहूत मानूस (जानी-पहचानी) है। आ़मिर भाई हैं? नहीं वह यहां कैसे हो सकते हैं, मैं मुंह ही मुंह में बड़बड़ाया, जबक मैंने थोड़ा सा क़रीब होकर गौ़र किया तो मालूम हुआ कि वह वाक़ई आ़मिर भाई हैं। मैं बड़ा हैरान हुआ कि वह वहाबियों की लाइब्रेरी में कैसे पहुंच गये? मुझे फ़िक्र ने आ घेरा। कहीं यह वहाबियों के चंगुल में तो नहीं फंस गये? वैसे भी सुन रखा था कि वहाबी आदमी को बहुत जल्द अपना लेते हैं। उनकी दलीलों को कोई जवाब नहीं होता। हमें आ़मिर भाई को वहां बैठे देखने पर तशवीश हुई कि हम यह भी सुनते आये थे कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान ख़राब हो जाता है। दोस्त से हमारी मुहब्बत जागी दोस्ती का तका़जा़ यह ठहरा कि आ़मिर भाई को वहाबियों के चंगुल से फंसने से बचाया जाय। मैंने सोचा यह ज़रा बाहर आ जाय फिर मामले की तहकी़क करके उसे समझाते हैं। हर रोज़ शाम को मग़रिब और इषा के बाद आ़मिर भाई के घर के सामने हमारी बैठक होती थी। उस रोज़ जब वह वहां आये तो मैंने झट सवालात की झड़ी लगा दी। वहाबियों की लाइब्रेरी में क्यों गये थे? क्या काम था? क्या ज़रूरत पेश आ गई थी? तुम्हें मालूम नहीं है कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान कमजो़र हो जाता है, यह जानते-बूझते उनकी मस्जिद में क्यों गये? मेरे इन तमाम सवालों का आ़मिर भाई ने एक ही जवाब दिया जो चंद लम्हों के लिये मुझ पर बड़ा गिरां गुज़रा। कहने लगे अरशद भाई मैं वहाबी हो गया हूं। वहाबी.......मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, ऐसा लगा कि गोया मेरे सामने दुनिया का आठवां अजूबा पेश कर दिया गया है और मैं उसे देख कर हैरान हो रहा हूं। मैं अभी हैरानगी की के आलम में ही था कि मुझ पर अल्लाह का करम हुआ और अल्लाह तआ़ला ने मेरे ज़हन में मसबत नुक्ता नजर (सकारात्मक दृष्टिकोण) डाला। मैंने सोचा कि आ़मिर भाई पढ़े लिखे ज़हीन और बा-शऊर नौजवान हैं यह अगर वहाबी हुए हैं तो ज़रूर कोई न कोई बात है। मसलक अहले हदीस में ज़रूर कोई ऐसी सच्चाई है जो पढ़े लिखे और बा-शऊर लोगों को अपनी जानिब खींच लेती है। मैंने आ़मिर भाई को समझाने की नीयत कर रखी थी लेकिन हाल यह हो गया कि उल्टा वह मुझे समझा रहे थे और सहर ज़दा शख़्स की तरह बिला चूं व चिरां उनकी गुफ़्तगू सुन रहा था। इस गुफ़्तगू में उनकी एक बात ज़हन में बैठी, उन्होंने कहा कि किसी की न मानो न वहाबियों की मानों और न अपने मौलवियों की खुद कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ कर देख लो कि किसका मसलक सही है और कुरआन के मुताबिक़ है। दूसरी बात जो उन्होंने मेरे ज़हन में बिठाने की कोशिश की वह हदीस और फ़िक्ह का फ़र्क़ था। और शायद बाद में मैं इसी बुनियाद पर अहले हदीस हुआ, उन्होंने कहा कि हमने मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का कलिमा पढ़ा है किसी इमाम का कलिमा नहीं पढ़ा। हम सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल की इता़अ़त के पाबन्द हैं किसी इमाम की फ़िक्ह के मुता़बिक़ नहीं। उन्होंने बताया कि हम हनफी़ कहलाते हैं, क्योंकि हम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करते हैं और हमारे मौलवी कहते हैं कि हम हक़ पर हैं, अगर सिर्फ़ हम यानी इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करने वाले ही हक़ पर हैं तो इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) से पहले जो मुसलमान गुज़रे जिनमें खुद सहाबा किराम जैसी मुक़द्दस हस्तियां भी षामिल थीं, क्या वह सब नाहक पर थे? उन्होंने किस इमाम की पैरवी की थी। उन्होंने किसी की फ़िक्ह पर नहीं बल्कि सिर्फ़ उन ही बातों पर अ़मल किया था जो अल्लाह और रसूल की बातें थीं, यानी कुरआन व हदीस पर। यह सारे दलाइल (दलीलें) ऐसे थे जिन पर गै़र जानिबदाराना (निष्पक्ष रूप से) गौ़र किया जाय तो हर बा-शऊर आदमी को अपील करते हैं। मैं भी इन दलाइल से काफ़ी मुतास्सिर हुआ। लेकिन इतनी आसानी से वहाबी हो जाना तो हमारी शान के खि़लाफ़ था।
आ़मिर भाई हमारे क़रीबी दोस्तों से थे, क्रिकेट के अ़लावा भी हमारे दरमियान काफ़ी हम-आहंगी थी। मज़हबी सरगर्मियों में भी वह हमारे साथ ही होते थे। बल्कि वह मस्जिद के मामलात में मुझसे ज़्यादा सरगर्म रहते थे। एक रोज़ में अहले हदीस मसिजद के सामने से गुज़र रहा था, मस्जिद के साथ ही मुहम्मदी लाइब्रेरी थी, जिसमें किताबों के अलावा अहले हदीस उलेमा की तक़रीरों की कैसिटें भी मिलती थीं। मेरी नज़र अचानक उसमें बैठे हुए एक नौजवान पर पड़ी शकल तो बहूत मानूस (जानी-पहचानी) है। आ़मिर भाई हैं? नहीं वह यहां कैसे हो सकते हैं, मैं मुंह ही मुंह में बड़बड़ाया, जबक मैंने थोड़ा सा क़रीब होकर गौ़र किया तो मालूम हुआ कि वह वाक़ई आ़मिर भाई हैं। मैं बड़ा हैरान हुआ कि वह वहाबियों की लाइब्रेरी में कैसे पहुंच गये? मुझे फ़िक्र ने आ घेरा। कहीं यह वहाबियों के चंगुल में तो नहीं फंस गये? वैसे भी सुन रखा था कि वहाबी आदमी को बहुत जल्द अपना लेते हैं। उनकी दलीलों को कोई जवाब नहीं होता। हमें आ़मिर भाई को वहां बैठे देखने पर तशवीश हुई कि हम यह भी सुनते आये थे कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान ख़राब हो जाता है। दोस्त से हमारी मुहब्बत जागी दोस्ती का तका़जा़ यह ठहरा कि आ़मिर भाई को वहाबियों के चंगुल से फंसने से बचाया जाय। मैंने सोचा यह ज़रा बाहर आ जाय फिर मामले की तहकी़क करके उसे समझाते हैं। हर रोज़ शाम को मग़रिब और इषा के बाद आ़मिर भाई के घर के सामने हमारी बैठक होती थी। उस रोज़ जब वह वहां आये तो मैंने झट सवालात की झड़ी लगा दी। वहाबियों की लाइब्रेरी में क्यों गये थे? क्या काम था? क्या ज़रूरत पेश आ गई थी? तुम्हें मालूम नहीं है कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान कमजो़र हो जाता है, यह जानते-बूझते उनकी मस्जिद में क्यों गये? मेरे इन तमाम सवालों का आ़मिर भाई ने एक ही जवाब दिया जो चंद लम्हों के लिये मुझ पर बड़ा गिरां गुज़रा। कहने लगे अरशद भाई मैं वहाबी हो गया हूं। वहाबी.......मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, ऐसा लगा कि गोया मेरे सामने दुनिया का आठवां अजूबा पेश कर दिया गया है और मैं उसे देख कर हैरान हो रहा हूं। मैं अभी हैरानगी की के आलम में ही था कि मुझ पर अल्लाह का करम हुआ और अल्लाह तआ़ला ने मेरे ज़हन में मसबत नुक्ता नजर (सकारात्मक दृष्टिकोण) डाला। मैंने सोचा कि आ़मिर भाई पढ़े लिखे ज़हीन और बा-शऊर नौजवान हैं यह अगर वहाबी हुए हैं तो ज़रूर कोई न कोई बात है। मसलक अहले हदीस में ज़रूर कोई ऐसी सच्चाई है जो पढ़े लिखे और बा-शऊर लोगों को अपनी जानिब खींच लेती है। मैंने आ़मिर भाई को समझाने की नीयत कर रखी थी लेकिन हाल यह हो गया कि उल्टा वह मुझे समझा रहे थे और सहर ज़दा शख़्स की तरह बिला चूं व चिरां उनकी गुफ़्तगू सुन रहा था। इस गुफ़्तगू में उनकी एक बात ज़हन में बैठी, उन्होंने कहा कि किसी की न मानो न वहाबियों की मानों और न अपने मौलवियों की खुद कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ कर देख लो कि किसका मसलक सही है और कुरआन के मुताबिक़ है। दूसरी बात जो उन्होंने मेरे ज़हन में बिठाने की कोशिश की वह हदीस और फ़िक्ह का फ़र्क़ था। और शायद बाद में मैं इसी बुनियाद पर अहले हदीस हुआ, उन्होंने कहा कि हमने मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का कलिमा पढ़ा है किसी इमाम का कलिमा नहीं पढ़ा। हम सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल की इता़अ़त के पाबन्द हैं किसी इमाम की फ़िक्ह के मुता़बिक़ नहीं। उन्होंने बताया कि हम हनफी़ कहलाते हैं, क्योंकि हम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करते हैं और हमारे मौलवी कहते हैं कि हम हक़ पर हैं, अगर सिर्फ़ हम यानी इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करने वाले ही हक़ पर हैं तो इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) से पहले जो मुसलमान गुज़रे जिनमें खुद सहाबा किराम जैसी मुक़द्दस हस्तियां भी षामिल थीं, क्या वह सब नाहक पर थे? उन्होंने किस इमाम की पैरवी की थी। उन्होंने किसी की फ़िक्ह पर नहीं बल्कि सिर्फ़ उन ही बातों पर अ़मल किया था जो अल्लाह और रसूल की बातें थीं, यानी कुरआन व हदीस पर। यह सारे दलाइल (दलीलें) ऐसे थे जिन पर गै़र जानिबदाराना (निष्पक्ष रूप से) गौ़र किया जाय तो हर बा-शऊर आदमी को अपील करते हैं। मैं भी इन दलाइल से काफ़ी मुतास्सिर हुआ। लेकिन इतनी आसानी से वहाबी हो जाना तो हमारी शान के खि़लाफ़ था।
तर्जुमा पढ़ते हुए वहाबियों के खि़लाफ़ तो कोई दलील न मिली अल्बत्ता अपने मसलक के खिलाफ़ दलाइल मिलते रहे
कई रोज़ तक इसी तरह उनके साथ गुफ़्तगू चलती रही और मेरा ज़हन तैयार होता रहा, लेकिन बाप दादा का मसलक छोड़ना इतना आसान नहीं होता, इसके लिये अपनी ‘अना’ की कुरबानी देनी पड़ती है और अपने बाप दादा को ग़लत कहना पड़ता है और यह सब कुछ उसी वक्त होता है जब हक़ पूरी तरह दिल व दिमाग़ को मुसख्ख़र कर ले। इसके लिए बहरहाल कुछ न कुछ वक्त लगता ही है। आ़मिर भई की तरगी़ब पर मैंने कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ने की ठानी और इस नीयत के साथ तर्जुमा पढ़ना षुरू किया कि इसमें से वहाबियों के खि़लाफ़ दलाइल मिलते रहे बल्कि ऐसा लग रहा था कि पूरा कुरआन ही हमारे मसलक के खि़लाफ़ है। कुरआन के तो हर सफ़्हे पर तौहीद के दलाइल हैं जबकि हम जिस मस्लक पर कारबन्द थे वह तो शिर्क से आलूदा था।
मेरा ज़मीर मुझे मलामत करने लगा कि हक़ समझने के बाद भी क्या हक़ कुबूल नहीं करेगा
कुरआन के तर्जुमे ने मेरा दिल व दिमाग़ में बसी अ़का़इद की दुनिया को तहस नहस करके रख दिया था। तौहीद मेरी समझ में आ रही थी और जब तौहीद समझ में आ जाय तो शिर्क कैसे बरक़रार रह सकता है। एक जानिब कुरआन मजीद के तर्जुमे के असरात दूसरी तरफ़ आ़मिर भाई से फ़िक्ह और हदीस और नमाज़ व दीगर मसाइल पर मुसलसल गुफ़्तगू, यूं मैं चारों तरफ़ से जकड़ा गया, मेरा ज़मीर मुझे मलामत करने लगा, हक़ समझने के बाद भी क्या हक़ कुबूल नहीं करेगा? अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं अपनी शिकस्त तस्लीम कर लूं और हक़ को अपने पर फ़तह दे दूं। नहीं........ अगर मैं वहाबी हो गया तो घर वाले क्या सोचेंगे। वालिद साहब सख़्त आदमी हैं वह तो मुझे घर से बाहर निकाल देंगे.......खा़नदान वाले मुझे बदनाम कर देंगे दोस्त अहबाब क्या सोचेंगे। अरशद वहाबी हो गया........इस तरह के वस्वसे मेरे मन में सिर उठा रहे थे और कुबूल हक़ की राह में मुजा़हिम (रोक) बन रहे थे। लेकिन आखि़र मैंने इन तमाम षैतानी वस्वसों को शिकस्त दी और मसलक हक्क्हू-मसलक अहले हदीस कुबूल करने का पुख़्ता अ़ज़म (इरादा) कर लिया। घर और बाहर हर एक को बता दिया कि मैं वहाबी हो गया हूं।
अहले हदीस होने के बाद क्या गुज़री ?घर और खा़नदान में हर जगह मुझे मुखा़लिफ़त का सामना करना पड़ा। वालिद साहब तो कट्टर बरेल्वी अ़की़दा रखते थे और हर साल बड़े अहतमाम के साथ ग्यारहबी शरीफ़ की नियाज़ दिलाते थे उन्हें मेरा मसलक अहले हदीस कुबूल करना सख़्त नागवार गुज़रा, पहले पहल तो उन्होंने मुझे आराम से समझाने की कोशिश की, कहने लगे कि ‘‘बेटा! अभी तुमने दुनिया नहीं देखी तुम्हारा इल्म महदूद (सीमित) है। अभी तुम मज़हबी मामलात को नहीं समझ सकते, इसलिए वापिस अपने मस्लक पर आ जाओ जबकि मैं उनसे कहता कि आप कोई दलील तो दें कि जी यह बात वहाबियों की कुरआ़न व हदीस के ख़िलाफ़ है इसलिए ग़लत है।’’ वालिद साहब दलाइल दिये बगै़र मिन्नत समाजत करते बल्कि यहां तक भी कहने लगे कि तुम अपने मस्लक पर वापिस आ जाओ अगर तुम्हारे गुनाह होंगे तो आखि़रत के दिन मैं उन गुनाहों को अपने सिर ले लूंगा।
जैसे-जैसे खा़नदान वालों ने वालिद साहब को ता़ने देना शुरू किये, वैसे-वैसे उनकी मुखा़लिफ़त में इजा़फ़ा होता गया। यहां तक कि एक रोज़ उन्होंने मुझे घर से निकालने की धमकी दे डाली इस पर भी मैं साबित क़दम रहा और कह दिया जो दिल चाहे कर लो जिस मस्लक को मैंने कुरआन व हदीस के दलाइल से दुरूस्त समझा है उसे नहीं छोड़ सकता। वालिद साहब को मुझसे नफ़रत हो गयी थी, घर में मेरा वजूद उन्हें बर्दाष्त नहीं होता था वह समझते थे कि मैंने पूरे खा़नदान में उनकी नाक कटा दी।
वालिद साहब बरेल्वी मस्जिद के मौलवी साहब के पास ले गये
इब्तिदाई दिनों में जब वालिद साहब मुझसे ना उम्मीद नहीं हुए थे और अपने तईं मेरी इस्लाह की कोषिषों में मसरूफ़ थे तो एक रोज़ नाना के साथ मिल कर इलाक़े की बरेल्वी मस्जिद के मौलवी साहब के पास भी ले कर गये कि शायद वह इसे समझा देंगे मौलवी साहब से कहा, यह वहाबी हो गया है कहता है ग्यारहवीं शरीफ़ करना जाइज़ नहीं है। मौलवी साहब मेरी तरफ़ मुखा़तिब होकर कहने लगे किस तरह जाइज़ नहीं है, मैंने कहा कि कुरआन ने गैर-अल्लाह की नज़र व नियाज़ हराम कर दी है। कुरआन में अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया है किः ‘‘ ‘‘ ‘‘कि बेशक तुम पर हराम कर दिया गया है मुर्दार (बहता लहू, खिंजी़र का गोश्त और वह नियाज़ जिसे गैर-अल्लाह के साथ मंसूब कर दिया जाय।’’
मौलवी साहब कहने लगे कि हम ग्यारहवीं शरीफ़ के लिए जो जानवर ज़िब्ह करते हैं उस पर अल्लाह का नाम लेते हैं। ज़िब्ह करते वक्त या गौस या गौस थोड़ी कहते हैं, तकबीर ही पढ़ते हैं। मैंने कहा कि अगर खिंजी़र को अल्लाहु-अकबर कह कर ज़िब्ह किया जाय तो क्या वह हलाल हो जायेगा? इसी तरह जब एक जानवर को गै़र-अल्लाह की तरफ़ मंसूब कर दिया गया है कि शैख अब्दुल का़दिर जीलानी (रहमतुल्लाह अलैहि) के नाम की नियाज़ है तो उस पर लाख अल्लाहु-अकबर पढ़ लिया जाय तब भी वह कुरआन की आयत की रू से जाइज़ नहीं होगा। मौलवी साहब मेरे ऐतराजात का कोई इत्मीनान बख्श जवाब नहीं दे सके और वालिद साहब की यह कोशिश भी नाकाम हो गई।
इब्तिदाई दिनों में जब वालिद साहब मुझसे ना उम्मीद नहीं हुए थे और अपने तईं मेरी इस्लाह की कोषिषों में मसरूफ़ थे तो एक रोज़ नाना के साथ मिल कर इलाक़े की बरेल्वी मस्जिद के मौलवी साहब के पास भी ले कर गये कि शायद वह इसे समझा देंगे मौलवी साहब से कहा, यह वहाबी हो गया है कहता है ग्यारहवीं शरीफ़ करना जाइज़ नहीं है। मौलवी साहब मेरी तरफ़ मुखा़तिब होकर कहने लगे किस तरह जाइज़ नहीं है, मैंने कहा कि कुरआन ने गैर-अल्लाह की नज़र व नियाज़ हराम कर दी है। कुरआन में अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया है किः ‘‘ ‘‘ ‘‘कि बेशक तुम पर हराम कर दिया गया है मुर्दार (बहता लहू, खिंजी़र का गोश्त और वह नियाज़ जिसे गैर-अल्लाह के साथ मंसूब कर दिया जाय।’’
मौलवी साहब कहने लगे कि हम ग्यारहवीं शरीफ़ के लिए जो जानवर ज़िब्ह करते हैं उस पर अल्लाह का नाम लेते हैं। ज़िब्ह करते वक्त या गौस या गौस थोड़ी कहते हैं, तकबीर ही पढ़ते हैं। मैंने कहा कि अगर खिंजी़र को अल्लाहु-अकबर कह कर ज़िब्ह किया जाय तो क्या वह हलाल हो जायेगा? इसी तरह जब एक जानवर को गै़र-अल्लाह की तरफ़ मंसूब कर दिया गया है कि शैख अब्दुल का़दिर जीलानी (रहमतुल्लाह अलैहि) के नाम की नियाज़ है तो उस पर लाख अल्लाहु-अकबर पढ़ लिया जाय तब भी वह कुरआन की आयत की रू से जाइज़ नहीं होगा। मौलवी साहब मेरे ऐतराजात का कोई इत्मीनान बख्श जवाब नहीं दे सके और वालिद साहब की यह कोशिश भी नाकाम हो गई।
मैंने गै़र शरई नज़र व नियाज़ की मुखा़लिफ़त की
मैंने वालिद साहब की सख्ती के बावजूद घर में गै़र-शरई नज़र व नियाज़ की मुखा़लिफ़त की और घर वालों को समझाया कि अगर कुछ पकाना है, लोगों को खिलाना है तो मुक़र्ररह तारीखों के अलावा किसी भी दिन अल्लाह के नाम का पका लिया करें। हमारी वालिदा निस्बतन सुलझे हुए ज़हन की थीं और थोड़ी बहुत पढ़ी हुई थीं, मैं उन्हें कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ने की तरगी़ब देता और खुद भी उन्हें पढ़ कर सुनाता जिससे बहुत जल्द उनकी समझ में आई और उनके अकी़दे की इस्लाह हो गई। आज भी अगर्चे वह रफे-यदैन के साथ नमाज़ नहीं पढ़तीं लेकिन अकी़दतन अहले हदीस ही हैं।
नबी के कहने पर भी तुम कह रहे हो कि अल्लाह को नहीं जानते, बताओ नबी की बात का तुम पर क्या असर उन्हीं दिनों एक साहब से बात हुई वह मुका़मे मुस्तफ़ा बयान करते हुए कहने लगे कि हम तो अल्लाह को नहीं जानते, हमने अल्लाह को देखा ही नहीं। हम तो सिर्फ़ मुहम्मद रसूलुल्लाह को ही जानते हैं। मैंने कहा, मौहतरम अगर तुम मका़मे मुस्तफ़ा हम अहले हदीसों से पूछो, तो हम तो यह कहते हैं किः ‘‘बाद अज़ खुदा बुजुर्ग तो मैं क़िस्सा मुख़्तसर‘‘()
लेकिन यह जो आप बयान कर रहे हैं, यह मका़मे मुस्तफ़ा नहीं बल्कि नबी की गुस्ताख़ी है, ठीक है हम पहले अल्लाह को नहीं जानते थे, लेकिन नबी ने हमें बताया कि अल्लाह, उसे जानो। नबी के कहने पर भी तुम कह रहे हो कि अल्लाह को नहीं जानते। बताओ नबी की बात का तुम पर क्या असर हुआ?
एक मर्तबा षया से मेरी गुफ़्तगु हुई वह कहने लगा कि इसका क्या सबूत है कि जो हदीसें आप पढ़ते हैं और उस पर अमल करते हैं वह सही हैं, सच्ची हैं। मैंने जवाब देने के बजाय उल्टा उनसे सवाल कर दिया। मैंने कहा कि कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि हदीसें ग़लत हैं लेकिन जिन किताबों पर आपने अकी़दे और मसलक की बुनियाद रखी है उसकी क्या गारंटी है कि वह सही हैं। फिर मैंने उन्हें बात समझाते हुए कहा कि अगर्चे कुरआन से साबित है कि जिस तरह अल्लाह ने कुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली है उसी तरह हदीस की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी भी ली है। क्योंकि अगर नबी मुकर्रमकी ज़िन्दगी के हालात महफ़ूज़ नहीं होंगे तो कुरआन से इस्तिफ़ादा नहीं किया जा सकता, कुरआन कहता है नमाज़ पढ़ो लेकिन नमाज़ किस तरह पढ़नी है कितनी पढ़नी है? इन सवालों के जवाबात तो हदीस से मिलेंगे लेकिन अगर कुछ देर के लिए फ़र्ज़ कर लें कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि हदीसें सही हैं तो फ़िक्ह से मुताल्लिक तो और भी शक किया जा सकता है कि वह सही नहीं हैं, इस नुक्ता-नज़र (दृष्टिकोण) से सोचें कि हदीस का मसलक भी ग़लत है, इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी इमाम जाफ़र सादिक़ (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत, इमाम मालिक (रहमतुल्लाह अलैहि) और इमाम अहमद बिन हंबल(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक़्ह भी ग़लत, इमाम शाफ़ई(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत है। ऐसी सूरत में एक अक़लमंद आदमी का झुकाव यकी़नन हदीस ही की तरफ़ होगा, मेरा इन्तिखा़ब भी हदीस है। कल अगर रोज़-ए-क़यामत अल्लाह तआला ने कहा कि फ़लां फ़िक्ह सही थी तो तुमने उसे छोड़ कर हदीस की तरफ़ क्यों आये? तो मैं यह कह सकूंगा कि या अल्लाह दुनिया के बाजा़र में कोई मुझे अबू हनीफ़ा ‘लिल्लाह’ की तरफ़ बुला रहा था, कोई अहमद बिन हंबल ‘लिल्लाह’ की तरफ़, कोई शाफ़ई ‘लिल्लाह’ और मालिकी और जाफ़र सादिक़ की तरफ़ और कोई हदीस की तरफ़, मेरे ईमान ने गवारा नहीं किया कि मैं तेरे नबी की हदीसों को छोड़ कर किसी की फ़िक्ह की तरफ़ आऊं क्योंकि कोई भी मुझे सही होने की गारंटी नहीं दे रहा था। वैसे भी अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में ‘अत़ीउल्लाह व अती़उर्रसूल’ का हुकुम दिया है अगर हदीसें ग़लत हैं तो फिर रसूल की इता़अत कैसे करें? मेरे ख़्याल में यह एक ऐसी आम सी बात है जिसे हर शख़्स आसानी से समझ सकता है। नबी को छोड़ कर किसी इमाम की फ़िक्ह की तरफ़ जाने की क्या ज़रूरत है जबकि इस बात की किसी के पास कोई जमानत नहीं कि फ़लां फ़िक्ह दुरूस्त है।
लेकिन यह जो आप बयान कर रहे हैं, यह मका़मे मुस्तफ़ा नहीं बल्कि नबी की गुस्ताख़ी है, ठीक है हम पहले अल्लाह को नहीं जानते थे, लेकिन नबी ने हमें बताया कि अल्लाह, उसे जानो। नबी के कहने पर भी तुम कह रहे हो कि अल्लाह को नहीं जानते। बताओ नबी की बात का तुम पर क्या असर हुआ?
एक मर्तबा षया से मेरी गुफ़्तगु हुई वह कहने लगा कि इसका क्या सबूत है कि जो हदीसें आप पढ़ते हैं और उस पर अमल करते हैं वह सही हैं, सच्ची हैं। मैंने जवाब देने के बजाय उल्टा उनसे सवाल कर दिया। मैंने कहा कि कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि हदीसें ग़लत हैं लेकिन जिन किताबों पर आपने अकी़दे और मसलक की बुनियाद रखी है उसकी क्या गारंटी है कि वह सही हैं। फिर मैंने उन्हें बात समझाते हुए कहा कि अगर्चे कुरआन से साबित है कि जिस तरह अल्लाह ने कुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली है उसी तरह हदीस की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी भी ली है। क्योंकि अगर नबी मुकर्रमकी ज़िन्दगी के हालात महफ़ूज़ नहीं होंगे तो कुरआन से इस्तिफ़ादा नहीं किया जा सकता, कुरआन कहता है नमाज़ पढ़ो लेकिन नमाज़ किस तरह पढ़नी है कितनी पढ़नी है? इन सवालों के जवाबात तो हदीस से मिलेंगे लेकिन अगर कुछ देर के लिए फ़र्ज़ कर लें कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि हदीसें सही हैं तो फ़िक्ह से मुताल्लिक तो और भी शक किया जा सकता है कि वह सही नहीं हैं, इस नुक्ता-नज़र (दृष्टिकोण) से सोचें कि हदीस का मसलक भी ग़लत है, इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी इमाम जाफ़र सादिक़ (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत, इमाम मालिक (रहमतुल्लाह अलैहि) और इमाम अहमद बिन हंबल(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक़्ह भी ग़लत, इमाम शाफ़ई(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत है। ऐसी सूरत में एक अक़लमंद आदमी का झुकाव यकी़नन हदीस ही की तरफ़ होगा, मेरा इन्तिखा़ब भी हदीस है। कल अगर रोज़-ए-क़यामत अल्लाह तआला ने कहा कि फ़लां फ़िक्ह सही थी तो तुमने उसे छोड़ कर हदीस की तरफ़ क्यों आये? तो मैं यह कह सकूंगा कि या अल्लाह दुनिया के बाजा़र में कोई मुझे अबू हनीफ़ा ‘लिल्लाह’ की तरफ़ बुला रहा था, कोई अहमद बिन हंबल ‘लिल्लाह’ की तरफ़, कोई शाफ़ई ‘लिल्लाह’ और मालिकी और जाफ़र सादिक़ की तरफ़ और कोई हदीस की तरफ़, मेरे ईमान ने गवारा नहीं किया कि मैं तेरे नबी की हदीसों को छोड़ कर किसी की फ़िक्ह की तरफ़ आऊं क्योंकि कोई भी मुझे सही होने की गारंटी नहीं दे रहा था। वैसे भी अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में ‘अत़ीउल्लाह व अती़उर्रसूल’ का हुकुम दिया है अगर हदीसें ग़लत हैं तो फिर रसूल की इता़अत कैसे करें? मेरे ख़्याल में यह एक ऐसी आम सी बात है जिसे हर शख़्स आसानी से समझ सकता है। नबी को छोड़ कर किसी इमाम की फ़िक्ह की तरफ़ जाने की क्या ज़रूरत है जबकि इस बात की किसी के पास कोई जमानत नहीं कि फ़लां फ़िक्ह दुरूस्त है।
इसी तरह मुख़तलिफ़ जगहों पर मुख़तलिफ़ मसाइल पर बहसें होती रहीं और यह बहसें मुझे पुख़्ता अहले हदीस करने का सबब बनती रहीं। आज अल्हम्दु लिल्लाह मेरे छोटे भाई और एक कज़िन भी अहले हदीस हो गये हैं। वालिद साहब में भी बड़ी तब्दीली आई है और उनका अकी़दा बहतर हो गया है। खा़नदान के दीगर घरानों पर भी असरात मुरत्तब हुए हैं और उनकी षिद्दत में कमी आई है। आखि़र में अल्लाह तआला से दुआ़ है कि अल्लाह तआला जितने भी नये अहले हदीस हैं सबकों इस्तिका़मत अ़ता़ फ़रमाये और इस मसलक हक्क़हू के फुरोग के लिए अपना भरपुर किरदार अदा करने की तौफ़ीक़ अता़ फ़रमाये।...(आमीन)
स्रोत - http://www.ahlehadith.org/ (उर्दू से रूपान्तरित)
स्रोत - http://www.ahlehadith.org/ (उर्दू से रूपान्तरित)
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