1. छोटी लड़की से अगर किसी मर्द ने सोहबत की जो अभी जवान नहीं हुई है तो उस पर गुस्ल वाजिब नहीं है, लेकिन आदत डालने के लिए गुस्ल कराना चाहिये. (हिस्सा अव्वल मसला नं0 5)
2. मुर्दार की खाल को जब धूप में सुखा डालें या कुछ दवा बगैरह लगा कर दुरूस्त कर लें कि पानी मर जाय और रखने से खराब न हो तो पाक हो जाती है.
3. इस पर नमाज पढ़ना दुरूस्त है.
4. और मशक बगैरह बनाकर इसमें पानी रखना भी दुरूस्त है लेकिन सुअर की खाल पाक नहीं होती.
5. और सब खालें पाक हो जाती हैं मगर आदमी की खाल से कोई काम लेना और बरतना गुनाह है. (!?!?!) (हिस्सा अव्वल मसला नं0)
6. कुत्ता, बिल्ली, बन्दर, शेर बगैरह जिनकी खाल बनाने से पाक होती है बिसमिल्लाह कह कर जिब्ह करने से भी खाल पाक हो जाती है चाहे बनाई हो या बे-बनाई हो, अल्बत्ता जिब्ह करने से इनका गोश्त पाक नहीं होता और इनका खाना दुरूस्त नहीं. (हिस्सा अव्वल मसला नं023)
7. मुर्दार के बाल और सींग और हडडी और दांत यह सब चीजें पाक है.
8. अगर पानी में पड़ जाय तो नजिस न होगा, अल्बत्ता अगर हडडी और दांत बगैरह पर उस मुर्दार जानवर की कुछ चिकनाई बगैरह लगी हो तो वह नजिस है और पानी भी नजिस हो जायेगा. (हिस्सा अव्वल मसला नं0 24)
9. अगर पेशाब की छींटें सुई की नोक के बराबर पड़ जावें कि देखने से दिखाई न दें तो इसका कुछ हर्ज नहीं धोना वाजिब नहीं (हिस्सा दोयम मसला नं0 11)
10. हाथ में कोई नजिस चीज़ लगी थी इसको किसी ने ज़बान से तीन दफ़ा चाट लिया तो भी पाक हो जायेगा मगर चाटना मना. ( हिस्सा दोयम मसला नं0 26)
11. किसी मर्द ने किसी औरत से जि़ना किया तो अब उसकी औरत की मां और उस औरत की औलाद को उस मर्द से निकाह करना दुरूस्त नहीं. (हिस्सा चहारम मसला नं0 17)
12. किसी औरत ने जवानी की ख्वाहिश के साथ किसी मर्द को बद नियती से हाथ लगाया तो अब उस औरत की मां और औलाद को उस मर्द से निकाह करना जाइज़ नहीं, इसी तरह अगर किसी मर्द ने किसी औरत पर हाथ डाला तो वह मर्द उसकी मां और औलाद पर हराम हो गया. (हिस्सा चहारम मसला नं0 18)
13. अगर किसी औरत के बच्चा पैदा हुआ और खून बिल्कुल न निकले तो उस पर गुस्ल फ़र्ज न होगा. (कुछ समझे नाम निहाद ‘हकीमुल उम्मत’ थान्वी की इस ‘हिकमत’ को हिस्सा 11 मसला नं0 4)
14. अगर कोई लड़का इशा की नमाज़ पढ़ कर सोए और बाद तुलू फज्र के बेदार होकर मनी का असर देखे जिससे यह मालूम हो कि उसको अहतलाम हो गया है तो उसका चाहिए कि इशा की नमाज़ का इआदा करले यानी दोहरा ले. (आखिर क्यों भई? हिस्सा 11 मसला नं0 2)
15. मैयत के कफ़न पर बगैर रोशनाई के वैसे ही अंगुली की हरकत से कोई दुआ मिस्ल अहद नामा बगैरह लिखना या उसके सीने पर बिसमिल्लाहिर्रमानिर्हरहीम और पेशानी पर कलिमा ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह लिखना जाइज़ है मगर किसी हदीस से इसका सबूत नहीं. (हिस्सा 11 मसला नं0 14)
पाठको! यह है मौलाना अशरफ़ अली थान्वी साहब की किताब तथाकथित बहिश्ती जेवर (असल में इसका नाम ‘दोज़खी जेवर होना चाहिए था) के कुछ मसाइल जो फिक्ह हनफी के बतौर नमूना आपके सामने पेश हैं, इससे भी ज्यादा हयासोज़ मसाइल इस किताब में भरे पड़े हैं कि यहां पर इतने पर ही इक्तिफ़ा करना बहतर समझा गया. क्या यह किसी भले और शरीफ आदमी को अपील करते हैं? हरगिज़ नहीं. और यह वह मसाइल हैं जो मौजूदा तकलीदे शख्सी की वजह से मुकल्लिदों में पैदा हो गये हैं और जिन पर अमल करना आज तक़लीद कहा जाता है और जिनके न मानने की वजह से हमें गैर मुकल्ल्दि कहा जाता है, जिन मसाइल को तहक़ीक़ और कुरआन व हदीस से कोई दूर का भी सरोकार नहीं बल्कि उमूमन यह मसाइल कुरआन व हदीस और इंसानी फि़तरत के भी खिलाफ़ हैं. और उस पर यह कमाल व ताज्जुब की बात यह कि यह किताब औरतों के लिए हुक्मे हक़ की रहबर है और मर्दों के लिए शोर व शर से मुहाफि़ज़ है. क्या अजब जिस तक़लीद ने ऐसे मसाइल मनवाए हैं जब इन मसाइल की बुराई ज़हन नशीं हो जाय तो इस तक़लीद को खैर बाद कह दी जाय.
14 no. apne galat likha h wahan pe nabalig ki baat ho rhi h ap to main point ko hi chor diye ho..
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