दर्ज तहरीर दर असल
किताब ‘तज़किरतुल मुनाजिरीन’ تذکرۃالمناظرین (मुरत्तिब: मौलाना मुहम्मद मुक्तदा असरी ‘उमरी’ जिल्द: दौम 1947-2001 पब्लिशर्स- ‘इदारा तहक़ीक़ाते इस्लामी’
जामिया असरिया दारूल हदीस, मउ, यू0पी0 इण्डिया) से माखूज़ है जिसमें ‘’सदाक़त मस्लक अहले हदीस बर
ज़लालत हनफि़यत व बरेल्वियत’’ के उन्वान से पाकिस्तान
के मशहूर अहले हदीस मुनाजि़र हाफि़ज़ अब्दुल क़ादिर रोपड़ी साहब और हनफि़यत के
नाम निहाद ...... मुनाजि़र मुहम्मद उमर उछरवी के दरमियान हुए एक
तवील मुनाजि़रे (स्थान: कराची, तारीख: दिसम्बर8, 1957 ई0) की रूदाद है, इसी तवील
रूदाद में से नजदियत की हक़ीक़त
से मुताल्लिक तहरीर को आपके सामने इस गरज़ से पेश किया जा रहा है कि आप हनफि़यत की अय्यारी-मक्कारी, झूठ-फ़रेब की एक झलक
महज़ और मज़ीद देख सकें और लफ़्ज ‘नज्दी’ के बारे में वाजेह तौर पर गुमराहकुन लोगों की आंखे खुल सकें- इनशा अल्लाह।
‘’नजदियत की हक़ीक़त’’
उछरवी- हाफिज़ साहब ! आपको और आपकी जमात नज्दी को
प्यारे मुस्तफ़ा करीम ने क़र्न शैतान से नवाजा़ है। तुम अपने आपको अहले हदीस
कहलाते हो लो अब अपनी असलियत हदीसे रसूल के आईने में देखिये – बुखारी शरीफ़ जिल्द दौम और मिश्कात शरीफ़ सफ़ा 582 में हवाला मौजूद है ।
अब्दुल्लह बिन उमर रजि़अल्लाहो अन्हु से रवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहो
अलैहि वसल्लम ने दुआ फरमाई, ऐ अल्लाह ! हमारे शाम में मेरी उम्मत को बरकत दे, ऐ अल्लाह ! मेरी उम्मत को यमन में बरकत
दे । सहाबा किराम ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह
अपने नज्दी उम्मतियों के हक़ में भी दुआ फ़रमाइये। मुस्तफ़ा करीम सल्लल्लाहो
अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐ अल्लाह ! उम्मत के शामियों में बरकत अता फ़रमा और मेरी उम्मत के यमनियों में बरकत
अता फ़रमा। सहाबा किराम ने अर्ज़ किया कि या रसूलुल्लाह अपने नज्दी उम्मतियों
के हक़ में भी दुआ फ़रमाइये मेरा ख्याल है कि आप (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने
तीसरी दफ़ा इरशाद फ़रमाया वहां ज़लज़ले और फि़त्ने होंगे और वहां से शैतान का
सींग तुलू होगा।
रोपड़ी
साहब ! हदीस मज़कूरा से तीन उमूर
बिल्कुल वाजेह हो गये:
1;
मुस्तफ़ा करीम की उम्मत का यमन व शाम पर क़ब्जा साबित होना
2;
मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने अपने यमनी और शामी उम्मतियों के लिए
बरकत की दुआ फ़रमाई।
3;
सहाबा किराम ने अर्ज़ किया आप अपने नज्दी उम्मतियों के लिए भी दुआ फ़रमाइये तो
हजूर अकरम (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने नजदियों का नाम लेना ही पसन्द नहीं
फ़रमाया यहां तक कि नजदियों के लिए दुआ फ़रमाते। आं हजरत ने ‘’فی نجد نا’’ न फ़रमा कर नजदियों को अपनी
उम्मत से खारिज फ़रमाया और फिर नजदियों के लिए दुआए खैर नहीं फ़रमाई। यह भी प्यारे
मुस्तफ़ा के इल्म गै़ब की दलील है बल्कि बजाय दुआए खैर करने के फ़रमाया ‘’ ھناک
الزلازل والفتنؐؐ ‘’ वहां नज्द में ज़लज़ले और
फि़त्ने उठेंगे यानी वह जगह मक़ाम नज्द ज़लज़लों और फि़त्नों का मरकज़ होगी और
आखिर हदीस में रसूलुल्लाह ने फ़रमाया وبھا بطلع قرن الشیطن और वहां
से शैतान का सींग तुलू होगा।
सींग
का लफ़्ज़ इसलिए फ़रमाया क्योंकि सींग सारे जिस्म के हिस्से से ज्यादा सख्त
होता है। साबित हुआ कि नज्दी शैतान से भी ज्यादा सख्त हैं इसलिए नज्दी इब्लीस
से भी पहले जहन्नम में दाखिल होंगे और इब्लीस बाद में दाखिल होगा। यह इसलिए कि
शैतान तो सिर्फ आदम का अहतराम न करने से जहन्नमी हुआ और नज्दी तमाम अंबिया और
सैय्यदुल अंबिया के अहतराम नकरने से जहन्नमी
हुआ और नज्दी तमाम अंबिया और सैय्यदुल अंबिया का मुंकर हुआ। लिहाज़ा हाफि़ज साहब नज्दी
मज़हब से तौबा करो और मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब की इत्तिबा को छोड़ दो अगर तुम
निजात चाहते हो।
हाफि़ज अब्दुल क़ादिर रोपड़ी
نحمدہ ونصلی علی
رسولہ الکریم ، उछरवी साहब नज्द के बारे में जो आपने हदीस
पढ़ी है और लोगों को हस्बे आदत धोका और फ़रेब देने की कोशिश की है इन तलबीस
कारियों का मैं अभी पर्दा चाक करता हूं इनशा अल्लाह दज्ल व फ़रेब की तारीकियां
दूर हो जायेंगी और हक़ व सदाक़त की किरनों से लोगों के दिल मुनव्वर हो जायेंगे।
सुनिये!
(1)
नज्द का माना है कि हर वह उंची ज़मीन जो अपने
मका़बिल की नशीबी ज़मीन से बुलन्द हो और ऐसे नजिदों की तादाद अरब में बारह तक है
इनमें नज्द हजाज़, नज्द इराक़, नज्द यमन, नज्द यमामा, नज्द मरीअ, नज्द लबलब,
नज्द इजाअ, नज्द अज़र, नज्द बादया, नज्द खाल, नज्द अ़शरी, नज्द इक़ाब
(मुलाहिजा़ हो क़ामूस और मजमुल बलदान)
उछरवी साहब
लिहाज़ा तुम किस नज्द को यहां मुराद लेते हो, वाजेह करो।
(2)
यह तुम्हारी ग़लत बयानी है कि हम वहाबी नज्दी और
मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब के पैरोकार हैं। हम तो इमामुल अंबिया सल्लल्लाहो
अलैहि वसल्लम के पैरोकार है अगर मंसूब करना है तो हमको मक्की या मदनी कहना चाहिये
न कि नज्दी। आपकी उछरवी साहब यह मन्तिक़ भी हमारी समझ से बालातर है कि एक तो हर
रोज़ हमको गैर मुक़ल्लिद पुकारते हो और दूसरी तरफ़ वहाबी नज्दी यानी अब्दुल वहाब
के मुक़ल्लिद कहते हो। एक ज़रूर झूट है और तुम आला दर्जे के कज्ज़ाब हो।
(2)
(3)
आइये ज़रा कुरआन मजीद की रोशनी
में नजदियत की हक़ीक़त वाजेह कर दूं। चुनांचे अल्लाह तआला का इरशाद है- (الم نجعل لہ عینین
ولسانا و شفتین و ھدینہ النجدین)
‘’क्या हमने इंसान के लिए दो आंखे नहीं बनायीं और ज़बान और
(नहीं बनाये) और (भलाई और बुराई की) की दो राहें (नहीं) दिखलायीं’’ गौर का
मक़ाम है लफ़्ज नजदैन तसनिया का सीग़ा है नज्द इसका वाहिद है इसके माना है ‘’रास्ता’’
उछरवी साहब होश करो और सुनो बिला
शुब्ह रास्ता दो तरह का ही हो सकता है खैर और शर का । हर इंसान यक़ीनन इन दोनों
रास्तों में से किसी न किसी एक रास्ता को जरूर अख्तियार करता है जो खैर और भलाई
का रास्ता अख्तियार करेगा वह अच्छा और नेक नज्दी है जो शर और गुमराही का रास्ता
अख्तियार करेगा वह शरीर और गुमराह नज्दी होगा। बहरहाल नजदियत से राह फ़रार
नामुम्किन है। साबित हुआ हर इंसान नज्दी है।
(4)
तफ़सीर मज़हरी लि012 स0412 और
जामिउल बयान फ़ी तफ़सीरूल कुरआन में मौजूद है कि ھدینہ النجدین से मुराद दो दूध (दूध पीने के लिए
मां की छातियां) हैं। खुलासा यह है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजिअल्लाहो
अन्ह) क़तादा और अबू हाजि़म बगैरह मुफ़स्स्रिरीन ने नजदैन की यही तफ़सीर बयान की
है तो उछरवी साहब अब बतलाओ कि इंसान इस तफ़सीर का आ़मिल व हामिल नहीं।
मौलवी (उछरवी) साहब क़सम उठा कर
बतलाओ क्या तुमने अपनी मां के सीने से दूध नहीं पिया। अगर नहीं पिया तो क़सम उठाओ
अगर पीते रहे तो तुम भी नज्दी बन गये फिर नजदियों के खिलाफ़ ग़लीज़ ज़बान क्यों इस्तेमाल
करते हो, (लोगों ने शोर मचा दिया कि मौलवी उमर भी नज्दी, मौलवी उमर भी नज्दी ओय
ओय मौलवी उमर बरेल्वी नज्दी हो गया) । उस वक्त उछरवी साहब की हालत दीदनी थी।
चेहरे पर ज़र्दी छाई हुई रंग फक़ हो गया, बात ज़बान से निकलती न थी। इधर-उधर
हैरानी से देख रहा था। अहले तौहीद ने लानत लानत का शौर मचा दिया उस वक्त तो दिल
में यही कहता होगा कि काश मुझे ज़मीन निगल जाती और मेरा नाम व निशान ही मिट गया
होता जैसा कि कुरआन में है (یلیتنی مت قبل ھذا وکنت نسیا منسا )
(5) बाकी उछरवी साहब ने हदीस को पेश करके इसका मिस्दाक़
हुकूमत सउदिया को ठहराया है जिसमें जिक्र किया है कि हजूर अकरम ने नज्द के लिए
दुआ नहीं की इसलिए कि वहां ज़लज़ले और फि़त्ने होंगे और इसमें शैतान का सींग
निकलता है।
बरेल्वी उलमा अच्छी तरह याद रखे तअस्सुब और जहालत को दूर
करें कि वह नज्द जिसमें आले सऊद सुल्तान इब्न सऊद बगैरह है। यह नज्द यमन है और
जिस हदीस में नज्द के लिए दुआ नहीं की उस नज्द से मुराद नज्द इराक़ है। चुनांचे
बुखारी शरीफ स0 1050 में दूसरी हदीस है कि आंहजरत ने मशरिक़ की तरु़ मुंह करके
फ़रमाया फि़त्ना उस जगह है जहां से सींग शैतान का निकलता है। चुनांचे फतेहुल बारी
के असल अल्फ़ाज़ यह है’: وفی روایۃ شعیب الہ
ان الفتنۃ ھھنا یشیر الی المشرق حیث یطلع قرن الشیطان۔
(6)
मुसलिम शरीफ़ जि02 स0394 में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के यह अल्फ़ाज़ मौजूद हैं: ان الفتنۃ ھھنا ثلاثۃ حیث یطلع قرن الشیطان इन तमाम हदीसों से साबित
हुआ कि फि़त्नों की जगह और शैतान के सींग की जगह मशरिक़ की जानिब है और चूंकि यह
हदीस रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने मदीना में इरशाद फ़रमाई थी
इसलिए मदीना की मशरिक़ मुराद होगी और फि़र बुखारी के सफ़ा मज़कूर में है कि : قام الی جانب المنبر۔ यानी आप (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने मिंबर
के किनारे खड़े होकर यह बात बयान फ़रमाई और मुसलिम शरीफ़ में है कि हज़रत आयशा (रजिअल्लाहो
अन्हा) के घर से निकले थे और जा़हिर है कि मिंबरे रसूल और बैत आयशा दोनों मदीना
में हैं तो नतीजा निकला कि मदीना की मशरिक़ की जानिब का नज्द मुराद है। फतेहुल
बारी जुज़ 29 सफ़ा 543 में इस हदीस के तहत लिखा है: من کان بالمدینۃ کان نجدہ بادۃ العراق ونواحیھا
وھی مشرق اھل المدینۃ۔ यानी मदीना वालों का नज्द और उसका गर्दोनवाह है
और यही इलाक़ा इराक़ मदीना का मशरिक़ है।
(7) मौलवी मुहम्मद उमर साहब को अगर तारीख़ी
इल्म होता तो कभी इल्ज़ाम हमको न देते और अपनी भारी गलती न करते। एक नज्द हजाज
है जिसमें खुद अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) पैदा हुए मक्का और
मदीना हजाज़ में है। लिहाज़ा साफ़ और फ़ैसलाकुन बात है कि बेशक जुगराफि़याई (भौगोलिक)और
तारीखी (ऐतिहासिक) ऐतबार से हजाज को भी नज्द कहा जाता है मगर यह वह नज्द नहीं
जिसके मुताल्लिक़ आंहजरत (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फि़त्नों की पेशगोई की
है। यही मामला नज्द यमन का है कि उसके लिए अल्लाह के रसूल की बरकत की दुआ
मौजूद है। लिहाज़ा वह भी قرن الشیطان’’ (शैतान का सींग)
नहीं हो सकता। यह भी तमाम बिदअती मौलवियों को याद रखना चाहिए जब मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने नज्द के फि़त्नों का
जि़क्र किया तो रूख़ मुबारक मशरिक़ (पच्छिम) की तरफ़ किया तो मदीना से मशरिक़ की
तरफ़ इराक़ी नज्द है न कि समामा बिन असाल सहाबी रसूल का नज्द। और उस वक्त समामा
का नज्द तो मुसलमान हो चुका था तो सउदी नज्द जिसे मुशरिक बिदअती नज्द वहाबिया
के नाम से मशहूर कर रहे हैं दरासल यह नज्द यमामा हे जो महल वुकू के ऐतबार से मक्का
और यमन के दरमियान है। जुगराफि़या तो नहीं बदलता ऐसे अक़ल के अन्धों को
जुगराफि़ये और नक़शे पर ही एक निगाह डाल लेनी चाहिए और यही नज्द सऊद है जो अहदे
क़दीम में नज्द यमामा और वादी बनो हनीफ़ के नाम से मशहूर था। मुसनद अहमद जि02,
स0143 में हवाला मौजूद है कि हजरत अब्दुल्लाह बिन उम्रर (रजिअल्लाहो अन्हु)
फ़रमाते हैं मैंने अल्लाह के रसूल को अपने हाथ के साथ इराक़ की तरफ़ इशारा करते
हुए देखा है आपने फ़रमाया बेशक फि़त्ना यहीं है, फित्ना यहीं है, फित्ना यहीं
है। नतीजा निकला कि शैतानी फि़त्नों का सींग यही इराक़ की सरजमीन है बल्कि कन्जुल
अमाल में साफ़ सराहत है कन्जुल अमाल जि07, स077 में हदीस है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो
अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि ऐ अल्लाह हमारे मदीना में और शाम में और यमन में
बरकत कर, तो एक शख्स ने कहा पस इराक़ के लिए दुआ कीजिए : فقال رجل و عراقنا۔ पस इराक़ के लिए भी दुआ फ़रमा
दीजिए क्योंकि वहां हमारा दाखिला और हमारी ज़रूरतें हैं। आप सल्लल्लाहो अलैहि
वसल्लम चुप रहे उसने इस बात को लौटाया। आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फिर
सकोत किया फिर फ़रमाया कि इसमें कर्न शैतान का निकलेगा और इसमें ज़लज़ले और फि़त्ने
होंगे।
(8) मज़कूरा
तमाम रवायात से साबित हुआ कि नज्द से मुराद नज्द इराक़ ही है और कई रवायतों में
इराक़ की तसरीह भी आ गई है बावजूद इतने वाजेह दलाइल के फिर नज्द यमन ही को बुरा
कहना और उसी को फि़त्नों की जगह क़रार देना जहालत और ज़लालत नहीं तो और क्या है
और पैगम्बरे इस्लाम की तौहीन है।
बाकी उछरवी साहब कर्न शैतान से मुराद मशरिक़
की जानिब शैतान का तसल्लुत और कुफ्र व शिर्क का ज़ोर मारना मुराद है। चुनांचे शरह
मुसलिम जि01, स053 में इमाम नोवी फ़रमाते हैं : والمراد بذالک اختصاص المشرق بمزید من تسلط الشیطان من
الکفر۔’’ इसी तरह मौलवी अहमद अली सहारनपुरी ने किरमानी से नक़ल
किया है कि हज़रत उमर (रजिअल्लाहो अन्हु) ने इराक़ जाने का क़स्द किया तो
कअबुलअहबार (रजिअल्लाहो अन्हु) ने कहा ऐ
अमीरूल मोमिनीन इराक़ जाने से मैं आपको अल्लाह तआला के साथ पनाह देता हूं। हज़रत
उमर (रजिअल्लाहो अन्हु) ने कहा क्यों, कहा इसमें नौ हिस्से शर है (रवाहो इब्ने
असाकर)। एक और रवायत कन्जुल अमाल जि07 स077 बाब اماکن ملمومہ العراق में है
कि हज़रत उमर (रजिअल्लाहो अन्हु) ने इरादा किया कि सब शहरों की सैर करें तो कअब
अहबार (रजिअल्लाहो अन्हु) ने अर्ज किया इराक़ न जायें क्योंकि वहां दस हिस्सों
में से नौ हिस्से शर है। (रवाहो इब्न अबी शैबा)
क्यों उछरवी याहब अब तो बिला शुब्ह दलाइल
क़बिया से साबित हो गया कि नज्द से मुराद नज्द इराक़ है। इसका नज्द सऊद से और
मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब से क़तअ़न कोई ताल्लुक़ नहीं। अब जबकि बरेल्वियों के
दलाइल की बुनियाद ही गलत है तो बाक़ी सारी शिर्क व बिदअ़त की दीवारें और छत खुद
बखुद गिर गयीं, इल्ज़ामात और तौहमतों की आंधियां फौरन दूर हो गईं।
बाक़ी मौलवी मुहम्मद उमर और रज़ाखानी टोला
को आले सऊद से जि़द (तअ़स्सुब) और इनाद तौहीद की वजह से है क्योंकि इन्होंने
कुफ्र व शिर्क के सब कुव्बे गिरा दिये और पूरे हजाज़ से शिर्कियात व बिदआत की खूब
बेखकनी की है। इसीलिए क़ब्र परस्त किरोह उनका दुशमन बन गया है यहां तक इन मौजूदा
मुशरिकों और बिदअ़तियों को इस बात की कोई परवाह नहीं कि आले सऊद बनी तममीम से हैं
और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने बनो तमीम के बारे में फ़रमाया है
कि यह दज्जाल पर सख्त होंगे (बुखारी जि02,स0626)।
उछरवी
साहब होश करो सहाब तो बनी तमीम से मुहब्बत रखें लेकिन तुम्हारी बद कि़स्मती कि
आप उनसे बजाय मुहब्बत के दुशमनी रखें और आले सऊद का सिर्फ जुर्म यह है कि उन्होंने
शिर्क व बिदअ़त को बन्द किया और तमाम बुरी रस्में मिटायीं जिनका
सलफ़ सालिहीन के ज़माने में नाम व निशान न था। कुरआन मजीद में है- "وما
نقموا منھم الا ان یومنوا باللہ العزیزاحمید"
नज्द इराक़ के फि़त्नों और इराकि़यों
की गद्दारी का तज़किरा :-
1- कौम नूह बुत इराक़ ही में थे, शिर्क
की शुरूआत यहीं से हुई।
2- हज़रत इबराहीम खुलीलुल्लाह को
इराक़ के बादशाह नमरूद ही ने आग में फेंका था। आखिरकार हजरत इबराहीम इराक़ से
हिजरत कर गये फिर सारी उम्र इधर का रूख न किया।
3- राफ़जियों का फि़त्ना सबसे ज्यादा
ख़तरनाक है, यह फि़त्ना इराक1 खुसूसन कूफ़ा व बसरा से निकला।
4- हजरत उमर (रजिअल्लाहो अन्हु) को
शहीद करने वाला अबू लूले मजूसी यह भी मशरिक़ की तरफ़ से आया था।
5- हजरत उसमान(रजिअल्लाहो अन्हु) के
क़त्ल का फि़त्ना भी इराक़ से ही उठा और मिस्र तक जा पहुंचा, फिर इसी के नतीजे
में वह शहीद हुए।
6- दामादे रसूल हजरत अली(रजिअल्लाहो
अन्हु) की शहादत कूफ़ा में हुई और यह कूफ़ा इराक़ में है।
7- खारिजी फि़त्ना जो इस्लाम का
पहला गुमराह फि़रक़ा है यहीं कूफ़ा से निकला।
8- जहमिया का फि़त्ना जिसका मवज्जिद
जहम बिन सफ़वान इराक़ी था, यह फि़त्ना भी इराक़ से निकला।
9- मौतजिल़ा का फि़त्ना जिसके नतीजे
में बेशुमकार फ़ुक़हा व मुहददिसीन को नाक़ाबिले बरदाश्त मुसीबतें सहनी पड़ीं इसका
बानी मबानी वासिल बिन अता और उमरो बिन उबैद भी इराक़ी था।
10- जंगे जमल व सफ़ेन जिसके नतीजले में
हजारों सहाबा किराम शहीद हो गये इराक़ ही में बरपा हुईं।
11- हजरत हसन(रजिअल्लाहो अन्हु) ने
जब अमीर मआविया(रजिअल्लाहो अन्हु) के हाथ पर बैअ़त की तो इराक़ के कूफि़यों ने
हजरत हसन(रजिअल्लाहो अन्हु) के नीचे से मुसल्ला खींच लिया।
12- हजरत मुसलिम बिन अ़कील की
मज़लूमाना शहादत इराकि़यों के हाथों हुई।
13- खानदान नबूवत की तबाही खुसूसन
नवासा रसूल हजरत हुसैन(रजिअल्लाहो अन्हु) की मज़लूमियत की हालतम में शहादत यह भी दरियाए फ़रात के किनारे इराक़ की
सरज़मीन में हुई।द
14- मुख्तार षक़फ़ी ने जाली नबूवत का
दावा सर जमीने इराक़ ही से किया जिसने कुव्वत पकड़ कर जुल्म व बरबरियत की
इन्तिहा कर दी।
15- हजाज बिन यूसुफ़ जो जुल्म व सितम
का निशान बन चुका था वह भी इराक़ का गवर्नर था।द्
16- हसन बिन सबाह शीई जिसने मसनूई जन्नत
बनाई और बेशुमार उलमा और सुलहा को जन्नत का लालच यदेकर अपनी फ़ौज से शहीद करवाया
यह इराक़ी था।
17- चंगेज़ और हलाकू खां के फि़त्ने
का बग़दाद में वज़ीर अलकमी शीई ने दावत दी जिसने अहले इराक़ के खून से दजला व फ़रात
को सुर्ख कर दिया।
18- बनो अबास व बनो इमय्या की बाहम
ररस्सा कशी जिसके नतीजे में इस्लाम दिन बदिन कमज़ोर होता गया, बिल आखिर
तातारियों के हाथों दुनिया की अजीम सल्तनत इस्लामिया ज़वाल का शिकार हुई उसकी
जौलान गाह इराक़ ही था।
19- माज़ी क़रीब में अब्दुल करीम
क़ासिम का फि़त्ना भी इराक़ से निकला था।
20- और आज इराक़ व ईरान की जंग जिसने
मिाम मुसलमानों को तबाही के किनारे पर खड़ा कर दिया जिसकी लपेट में सारा आलमे इस्लाम
आ गया है और अल्लाह ही जाने कल आगे क्या होगा।
21- आखिर में दज्जाल भी क़यामत के
क़रीब इसी सर ज़मीने इराक़ से निकलेगा जिसको हजरत ईसा (अलैहिस्सलाम) क़त्ल
करेंगे (सहीह मुसलिम)
22- अल्लामा शिब्ली नौमानी नामवर
हनफ़ी फ़कि़या व मुवररिख अपनीह तस्नीफ़ में लिखते हैं : कि ज्यादा तर फ़साद का
मरकज़ इराक़ और इराक़ में ख़ास कूफ़ा था। (सीरतुन्नौमान जि01, स044)
क्यों उछरवी
साहब, मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की यह पेशगोई कितनी सच्ची और मब्नी
बर हक़ीक़त है। इसके बर खिलाफ़ नज्द सउदिया से आज तक कोई फि़त्ना नहीं उठ बल्कि क़बीला बनो तमीम के एक मर्द
कामिल ने दज्जाली फि़त्नों, मुशरिकों, बिदअतियों और बातिल परस्तों की जि़न्दगी
तंग कर दी। मिल्लत फ़रोशों और दीन फ़रोशों को नंगा कर दिया। अदब व अहतराम के नाम
पर बुजुर्गाने दीन की क़ब्रों को माले तिजारत बनने से रोक दिया मगर दुनिया ने देख
लिया कि इसकी दावते तौहीद व सुन्नत नज्द से लेकर हजाज़ व तहामा, यमन व शाम में
आम हो गई और इसके नतीजे में हरमैन शरीफ़ैन को उसका असली वक़ार नसीब हुआ ।
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