रविवार, 5 फ़रवरी 2012

तलाशे हक- साबिक देवबन्‍दी आलिम की आपबीती (‘’मैं कैसे और क्‍यों अहले हदीस हुआ’’ मौलाना अब्‍दुर्रहमान, फा़जि़ल दारूल उलूम, देवबन्‍द )


तलाशे हक-  साबिक देवबन्‍दी आलिम की आपबीती (‘’मैं कैसे और क्‍यों अहले हदीस हुआ’’ मौलाना अब्‍दुर्रहमान, फा़जि़ल दारूल उलूम, देवबन्‍द )

मेरी जिन्‍दगी का पहला दौर
मैं एक किसान घरने में पैदा हुआ, जबसे होश संभाला वालिदेन और माहौल से यह तीन अकी़दे सीखे- नं0 1 हमारा खा़लिक़ अल्‍लाह तआला है और उसका कोई शरीक नहीं, नं0 2 हमारे पैग़म्‍बर हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  है और हम आपके (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  के उम्‍मती हैं , नं0 3 मरने के बाद दौबारा अल्‍लाह तआला जि़न्‍दा करके हमारे अमलों का हिसाब किताब लेगा और फिर बहिश्‍त या दोज़ख़ में भेज देगा. इसी तरह मैंने उनसे यह अकी़दा भी हासिल किया कि हम हनफ़ी है और मज़हब हनफ़ी है यानी हम इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्‍लाह अलैहि  के मुक़ल्लिद हैं. कम उम्री के वक्‍त ज़हन में न किसी तन्‍की़द की क़ाबिलियत होती है और न ही कोई इन्‍सान मौरोसी अका़इद पर तन्‍की़द करना पसन्‍द करता है सो मैं भी इन्‍ही अका़इद को मौरोसी तौर पर अख्तियार करने के लिए तैयार  रहा  और उनसे दिली वाबस्‍तगी पैदा कर ली
और यही वह अकी़दा है जिनकी बिना पर एक आदमी अपने आपको मुसलमान समझता है. कलमा तैयबा तो तो हम लोग सिर्फ पढ़ते हैं अल्‍फा़ज़ का मतलब कुछ नहीं समझते. मैंने भी तबर्रकन ही यह कलिमा पढ़ना अपने माहौल से सीख लिया और माने व मतलब से कोई ग़रज़ न रखी. इसके बाद मैं इस्‍लामी तालीम हासिल करने के लिए घर से रूख़सत हो गया और मुख‍तलिफ़ असात्‍जा किराम से बेशुमार उलूम व फुनून पढ़ता रहा. सर्फ-नहव, मन्तिक़, फ़लसफ़ा, फलकियात, फि़क्‍ह, उसूल फि़क्‍ह बगैरह और जब इन उलूम के बारे में असात्‍जा से पूछा जाता कि हम यह उलूम क्‍यों पढ़ रहे हैं तो वह यह बताते कि इन उलूम के ज़रिये कुरआन व हदीस को इन्‍सान अच्‍छी तरह समझ सकता है. गौया इन उलूम की तालीम कुरआन व हदीस समझने के लिए दी जा रही थी. इस पर मुझे बारहा अपने असात्‍जा से यह अर्ज करना पड़ता कि आप इन उलूम के साथ साथ कुरआन व हदीस भी पढ़ाएं तो जवाब यह मिलता कि इनसे फ़ारिग़ होकर तुम आखि़री साल दौरा हदीस पढ़ोगे तो उस वक्‍त आपको कुरआन व हदीस का इल्‍म हासिल हो सकेगा.

यह पहला मौका था कि मेरे दिल को इस तर्जे अमल से एक धचका सा लगा मगर यह वक्‍़ती हादसा था जो दिल में आया और गुज़र गया और मेरे असात्‍जा़ का इसमें कोई क़सूर भी न था. इसलिए कि सारे मुआशिरे में वह निसाबे तालीम पढ़ा और पढ़ाया जा रहा था जो शाहजहां के दौर में एक सरकारी आलिम मुल्‍ला निजा़मुददीन ने मुरत्तिब किया था और इसी इस निसाब का नाम भी दर्से निजामी है और अहले हदीस के अलावा सब शीआ, सुन्‍नी, बरेल्‍वी और देव बन्‍दी यही निसाब आज तक पढ़ते पढ़ाते आ रहे हैं तो मेरे असात्‍जा भी इसी मुआशिरे में रहते थे. इसलिए उन्‍होंने भी यही निसाब पढ़ाना था और पढ़ाया. मेरे इन असात्‍जा़ में से बाज तो बुलन्‍द दर्जा के आलिम थे कि उनके फ़ैज़ से रब ने मुझे दौलते इल्‍म से नवाज़ा और मेरे दिल से हमेशा उनके लिए दुआएं निकलती हैं और इन उलामाए किरा ने ही मेरा यह ज़हन बनाया कि जो इल्‍म तुझे पढ़ाया जा रहा है यह खुदा की तरु़ से अमानत है जो हम तेरे सुपुर्द किये जा रहे हैं अब तेरा फ़र्ज है कि यह अमानत इस तरह दूसरे लोगों तक पहुंचा दो. इसी तल्‍क़ीन से मुतास्सिर होकर मैंने जिन्‍दगी के इब्तिदाई दस साल तालीम हासिल करने के लिए वक्‍फ किये और फ़राग़त के बाद भी बीस साल तालीम व तदरीस का काम करता रहा. अल्‍हम्‍दु लिल्‍लाह यह काम मैंने खा़लिसतन रजा़ए इलाही के लिए किया. अल्‍लाह तआला कुबूल फ़रमाए. (आमीन)
मेरा दूसरा दौर
बहर-हाल जब दौरे तालिब इल्‍मी का वह आखि़री साल आया जब मुझे दौरा हदीस पढ़ना था तो मैं इल्‍मे हदीस हासिल करने के लिए हिन्‍दुस्‍तान गया और देवबन्‍दी  मस्‍लक के मशहूर मदरसा दारूल उलूम में चोटी के उलमा से दौरा हदीस पढ़ा जिनमें मौलाना शब्‍बीर अहमद उसमानी रहमतुल्‍लाह अलैहि भी शा‍मिल थे जो मम्लिकते पाकिस्‍तान में शैखुल इस्‍लाम के मन्‍सब पर फ़ाइज़ रहे हैं. इन तमाम असात्‍जा किराम का इल्‍म हर कि़स्‍म के शक व शिब्‍ह से बालातर था. उनका तक़वा और दयानतदारी मुसल्‍लम थी मगर तरीक तालीम तो वही था जो तमाम हनफ़ी उलमा में मरव्‍वज था, चुनांचे दौरा हदीस के दौरान मरे दिल को दो बातों से ज़बरदस्‍त धचका लगा अव्‍वल यह कि दौरा हदीस में हदीस की छः किताबेपढ़ाई जा रही थीं जिनको सिहाह सित्‍ता कहते हैं यानी सहीह बुखारी, सहीह मुसलिम, सुनन अबू दाऊद, सुनन तिर्मिजी, सुनन निसाई, और सुनन इब्‍न माजा. इन सब किताबों के मुसन्निफ़ों में से कोई एक भी किसी इमाम का मुक़ल्लिद नहीं था और मेरे दिल पर यह बात भी बहुत गिरां गुज़री कि हदीसें जमा करने वाले मुहददिस उलमा में से कोई भी हनफ़ी नहीं था और न हनफ़ी उलमा की कोई हदीस की किताब हमारे दर्स में शामिल थी क्‍योंकि अहनाफ़ के हां ऐसी किताब है ही नहीं. दूसरी बात जिससे मेरे दिल को जबरदस्‍त चोट लगी वह हमारे असात्‍जा़ का साल भर उन हदीसों की तावीलों पर तवील तक़रीरें करना था जो हनफ़ी फि़क्‍़ह के खि़लाफ़ थीं. हत्‍ता कि बाज हदीसों पर तो दस दस दिन और महीना महीना तक़रीरें होती रहतीं जिनको हम तलबा याद भी करते और लखिते भी थे मगर इन तक़रीरों की हैसियत महज ग़लत तावीलों के सिवा कुछ भी नहीं था. मुझे याद है कि हमारे साथ दौरा हदीस में जज़ाइर मालाबार का एक शाफ़ई तालिब इल्‍मभी शरीक था वह कहा करता था हमारे असात्‍जा अपने मज़जब के मसाइल को दलाइल के बजाए मुक्‍कों के जो़र से साबित करते हैं और बाज असात्‍जा तो दौराने तदरीस जोश में तिपाई पर जो़र जो़र से मुक्‍के भी मारा करते थे. इस सूरते हाल से मेरा ज़हन मुतास्सिर हुए बगैर न रह सकामगर इसके बावजूद बीस साल में सिर्फ इस क़दर फि़क्ह की तर्दीद किया करता था कि जो मसाइल फि़क्ह में गरवही नहीं बल्कि शहनशाहों और जागीरदारों को खुश करने के लिए लिखे गये हैं वह गलत हैं. तो मेरी उस तर्दीद से हनफी़ उलमा नाराज़ हो जाया करते थे मगर इन्‍साफ़ पसन्‍द और तालीम याफ़्ता हजरात इसको पसन्‍द करते थ. खु़लासा यह कि मेरे ज़हनी इन्कि़लाब का यह दूसरा वाक़्या था.
मेरा तीसरा दौर
तीसरा वाक़्या यह हुआ कि मैं अपने बीस साला दौरे तदरीस में तलबा को तर्जुमा कुरआन और हदीस की इब्तिदाई किताब मिश्‍कात शरीफ़ को दर्स लाज़मी दिया करता था और यह दोनों मज़मून हनफ़ी निसाब में दाखिल नहीं थे. इब्तिदा में तालिब इल्‍म मुख़लिस होते थे और वह मेरे इस काम की क़दर करते थे मगर तक़सीम मुल्‍क के बाद तालिब इल्‍म मेरे इन जबरी असबाक़ को बेकार समझने लगे और मुल्‍क को तूल व अरज़ में मुझे इस काम पर मतऊन किया जाने लगा कि वह सख्‍त तबियत का मालिक है और तालिब इल्‍मों से जबरन बेगार लेता है. इनको जबरन तर्जुमा कुरआन और मिश्‍कात शरीफ़ नहीं पढ़ाना चाहिए. मैं अपने खि़लाफ़ इस कि़स्‍म के ताने और इल्‍जा़मात सुनता तो मेरी तबियम ऐसे तालिब इल्‍मों से बेजा़र हो जाती कि इन्‍सानों के लिखे हुए उलूम को शौक से पढ़ते हैं मगर अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  के अता कर्दा उलूम को पढ़ना बेकार समझते हैं. ऐसे लोगों को पढ़ाकर आलिम बनाकर मुझे खुदा के हां क्‍या अज्र मिलेगा, क्‍योंकि मैं उनको दुनिया के माल व मता के लिए तो नहीं पढ़ा रहा था मैं तो सिर्फ रजा़ए इलाही के लिए पढ़ा रहा था तो जब खुदा की किताब और पैग़म्‍बर (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) की हदीस के साथ उनका यह बर्ताव है तो उनको पढ़ाने से न पढ़ाना ही बहतर है.

मेरा चौथा दौर

चौथा वाक़्या यह हुआ कि आज कल दीनी मदरसे भी दुकानदारी बन कर रह गये हैं. और दीनी इल्‍म पढ़ने पढ़ाने वालों ने भी अपना मक़सद दुनिया हासिल करना ही बना लिया है. सदाकत और अमानतदारी से यह कोसों दूर हैं जैसा कि 1963ई0 की बात है कि लायलपुर (फैसलाबाद) शहर में नमाज़ तरावीह का इख्तिलाफी़ मसअला छिड़ गया. मुझे अच्‍छी तरह याद है कि बाजा़र की मसजिद अहले हदीस में एक आम जसले में इमामुल मनाजिरीन हज़रत मौलाना अहमद दीन साहब और रईसुल मुनाजि़रीन हज़रत मौलाना अब्‍दुल का़दिर रौपड़ी ने यह चैलेंज करके कहा कि अगर बीस रकात नमाज़ तरावीह कोई हनफ़ी आलिम साबित करना चाहे तो हम मुनाजरे के लिए तैयार हैं. मेरे मदरसे के दो तालिब इल्‍मों ने रूक्‍का लिखा कि हम इसके लिए तैयार हैं इन्‍होंने वापिस आकर मुझसे मुना‍ज़रे के लिए कहा तो मैंने कहा मुनाज़रों से मसाइल साबित नहीं हुआ करते. मैं जल्‍द ही नमाज़ तरावीह पर एक रिसाला लिखने वाला हूं. फिर जब मैंने रिसाला लिखने का अज्म किया तो चूंकि मैं भी दूसरे हनफ़ी उलेमा की तरह दीगर उलूम व फुनून का तो माहिर था, मगर हदीस चूंकि हमारे हां कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए हदीस में मुझे भी कोई महारत न थी, चुनांचे मैं रिसाले का मवाद हासिल करने के लिए मौलाना सरफ़राज़ खान सफ़दर के पास गया क्‍योंकि वह अहले हदीस मस्‍लक के खि़लाफ़ इख्तिलाफ़ी मसाइल पर किताबें लिखते रहते थे तो उन्‍होंने मुझे बीस रकात तरावीह के हक़ में दो दलीलें पेश कीं, एक मौत्‍ता इमाम मालिक (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  की रवायत थी जिसमें रावी बयान करता है कि हज़रत उमर (रजि़अल्‍लाहो अन्‍हो)के ज़माने में लोग रमजा़न की रातों में बीस रकात तरावीह के साथ क़याम किया करते थे. मौलाना सरफ़राज़ सफ़दर ने कहा चूंकि यह मौत्‍ता की रवायत है इसलिए यह मुसतनद है और दूसरी दलील यह पेश की कि सुनन बेहिकी में रवायत है कि नबी करीम (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने तीन दिन बा जमात जो नमाज़ तरावीह पढ़ाई थी वह बीस रकात थी. मौलाना सरफ़राज़ खान सफ़दर ने फ़रमाया कि इस रवायत में अबू शीबा नामक एक रावी है जिसको अहले हदीस ज़ईफ़ क़रार देते हैं मगर अस्‍माए रिजाल की किताब ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ में लिखा है कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी को ज़ईफ़ क़रार नहीं दिया और मुझे ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ की यह इबारत निकाल कर दखिई और लिखवाई. इबारत यूं है कि अबू शीबा का जिक्र करते हुए मुसन्निफ़ लिखता है कि ‘’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ यानी इस रावी के बारे में इमाम बुख़ारी (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने खा़मोशी इख्तियार फ़रमाई. मौलान साहब ने फ़रमाया कि इसका मतलब यह है कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी पर कोई तन्‍की़द नहीं की और जब इमाम बुखारी (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  तनकी़द नहीं करते तो दूसरे मुहददिसीन की तन्‍की़द की क्‍या अहमियत है. मैंने वापिस आकर रिसाला लिखकर शाए करा दिया और यह इबारत भी लिख दी. इस पर एक अहले हदीस आलिम की तरफ़ से इश्तिहार शाए हुआ कि अगर मौलाना अब्‍दुर्रहमान यह साबित करदें कि बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि) ने अबू शीबा को ज़ईफ़़ क़रार दिया तो मैं मौलाना साहब को एक हजा़र रूपये का इनाम दूंगा. जब मुझे यह इश्तिहार पहुंचा तो बड़ी हैरत हुई कि मीजा़ऩुल ऐतदाल में यह इबारत मैंने खुद देखी है तो फिर यह चैलेंज कैसा? फिर मैंने सोचा शायद जो जुमला मैंने नकुल किया है उसके सियाक़ व सिबाक में कोई इबारत रह न गई हो जो मैंने न देखी हो. चुनांचे मैंने बहालते रोजा़ लाहौर का सफ़र किया और किताब ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ दो सौ रूपये में जाकर ख़रीदी और जब उस किताब का मुतालआ किया तो इबारत बिल्‍कुल दूरूस्‍त थी और उसके सियाक़ व सिबाक़ में भी कोई ऐसा लफ़्ज़ न था जिसमें इस जुम्‍ले की नफी़ होती हो मेरी हैरत और बढ़ गई और वापिस लायलपुर (फैसलाबाद) आ गया. यहां आकर ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ का मुक़द्दमा पढ़ा तो वहां यह का़यदा लिखा हुआ था कि जब अस्‍नादे हदीस की बहस में यह जुम्‍ला आये कि ’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ तो इसका मतलब यह होगा कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  या दूसरे मुहददिसीन (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी को हद से ज्‍यादा ज़ईफ़ क़रार दिया और इसको इस इस का़बिल ही न समझा कि इसके मुताल्लिक़ कोई बहस की जाय. यानी वह नाका़बिले ऐतिमाद है और उसके मुताल्लिक़ कहा करते थे कि छोड़ो इस रावी को यह भी कोई मुहददिस है कि इस पर तवज्‍जो दी जाय यानी सिरे से यह इस का़बिल ही नहीं कि इसका मुहददिसीन की लिस्‍ट में नाम लिया जाय तो ’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ का मतलब इस का़यदे के मुताबिक यह हुआ कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इसके मुताल्लिक कोई बात करना ही गवारा नहीं किा. जब यह हकी़क़त मुझ पर मुन्‍कसिफ़ हुई तो मैंने मौलाना सरफ़राज़ खान साहब को लिखा कि मज़हबी तअस्‍सुब में आकर दियानतदारी छोड़ देना एक आलिम के शायाने शान नहीं तो उन्‍होंने मुझे इसका कोई जवाब ही नहीं दिया. अर्से के बाद जब उनसे मुलाका़त हुई तो सिर्फ ज़बानी फ़रमाया कि मौलवी साहब ऐसे इख्तिलाफ़ी मसाइल में हकी़क़त यह है कि अहादीस हनफियों के खि़लाफ़ हैं बस ऐसे ज़ईफ़ सहारों से ही काम लेना पड़ता है. इससे मेरा ज़हन पर ज़बरदस्‍त चोट लगी और अफ़सोस हुआ कि दीन के मामले में यह तर्ज़े अमल तो खा़लिसतन यहूदी उलेमा का है चुनांचे इन वजूहात की बिना पर मैंने एक तरफ़ मदरसा चलाने से माजि़रत कर ली और दूसरी तरफ़ तक़लीदी ज़हनियत को बिल्‍कुल तरक कर दिया और गैर जानिबदार होकर आलमी मजाहिब का मुतालआ शुरू किया और मुसलमानों के मुख़तलिफ़ फि़र्कों का भी गै़र जानिबदारी से मुतालआ किया. कुरआन व हदीस को गै़र जानिबदार होकर समझना अपना नसबुल ऐन बना लिया. चुनांचे चन्‍द बरसों के मुतालआ के बाद मैं इस नतीजा पर पहुंचा कि मुसलमानों के इखतिलाफ़ी मसाइल में हक़ यह है कि जो कुछ कुरआन व हदीस में मिले उसको कुबूल किया जाय. और वह बातें जो कुरआन व हदीस के खि़लाफ़ हों उनको रद्द किया जाय, क्‍योंकि पैगम्‍बर (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के सिवा कोई इन्‍सान मासूम नहीं तो फिर हम गै़र मासूम इन्‍सानों की तक़लीद क्‍यों करें?  तरके तक़लीद न सिर्फ यह कि मैंने अपना मसलक बना लिया बल्कि मेरे नज़दीक किसी भी आलिम के लिए तक़लीद जाइज़ नहीं और ग़रीब अवाम तो उलेमा के ताबे होते हैं वह माज़ूर हैं, मगर उलेमा के लिए तक़लीद करना क़तअन हराम है जब एक मुसलमान कलमा ‘’लाइलाह इल्‍लल्‍लाह मुहम्‍मदुर्रसूलुल्‍लाह’’ पढ़ता है तो इसके पहले जुज़ का मतलब है कि इन्‍सान दिल से यह अहद करे कि मैंने अपना मालिक व हाकिम सिर्फ अल्‍लाह को बनाया है और उसी के हुक्‍मों पर मैंने चलना है और दूसरे जुज़ का मतलब है कि यह दौर है हज़रत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की नुबूवत का. लिहाजा़ अल्‍लाह का वही हुकुम मैने मानना है जो हज़रत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के ज़रिये मुझ तक पहुंचा है. हर मुसलमान जब दिल से सिर्फ़ अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की बातों को मानने का अहद करता है तो फिर किसी मुसलमान के लिए यह क़तअन जाइज़ नहीं कि वह कुरआन व हदीस के सिवा किसी दूसरे इन्‍सान की तक़लीद करे और तअस्‍सुब में आकर आंखें बन्‍द करले. याद रखिये जिस तरह अल्‍लाह के सिवा किसी दूसरे का हुकुम मानना उलूहियत में शिर्क है उसी तरह हजरत मुहम्‍मद मुस्‍तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के सिवा किसी दूसरे का हुकुम मानना भी शिर्क फि़र्रिसालत है. तक़लीद तो अवाम के लिए भी हराम है और उलेमा के लिए तो इससे भी ज़यादा हराम है. मगर उलेमा इस जुर्म में अवाम की तरफ़ से भी जि़म्‍मेदार हैं क्‍योंकि वह अवाम को गिरोह बन्‍दी में बांट कर तक़लीद करने पर मजबूर करते हैं हालांकि ईमान का तका़जा़ यह है कि कुरआन व हदीस के मका़बले में किसी बड़े से बड़े शख्‍स की बात को भी ठुकरा दें. हज़रत अब्‍दुल्‍लाह बिन उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) का यह वाक्‍़या तारीख़े इस्‍लाम में मज़कूर है कि हज के मौके़ पर उनसे किसी ने मसअला पूछा तो आपने फ़रमाया इस मसअले में रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का फ़रमान यह है तो साइल ने कहा आपके वालिद मोहतरम हज़रत उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) तो इसके खिलाफ़ बयान करते थे. हज़रत अब्‍दुल्‍लाह बिन उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो)   गुस्‍से में आ गये और फ़रमाया क्‍या मुहम्‍मद रसूलुल्‍लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) इत्तिबा किये जाने के ज्‍़यादा हक़दार हैं या हज़रत उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) ((‘अहकामुल अहकाम’ जिल्‍द-2बहस रदे तक़लीद)) यह है सच्‍चे ईमान की निशानी कि अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के फ़रमान के खिलाफ़ ख्‍वाह किसी जलीलुल क़दर सहाबी की बात ही क्‍यों न हो उसको रद्द कर दिया जाय. यही दावत जमात अहले हदीस की है.

बिल आखि़र मैं अहले हदीस हो गया
अब मेरे सामने दो ही रास्‍ते थे एक तक़लीदी मज़हब का जिसका मतलब यह था कि जो मसाइल हनफ़ी फि़क्‍ह की किताबों में दर्ज हैं उनको मैं दिल से रब्‍बानी अहकाम मान कर उनके मुताबिक अमल करूं. दूसरा रास्‍ता रास्‍ता तहकी़की़ मज़हब का था कि मैं किताबुल्‍लाह और सुन्‍नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के मुताबिक़ अमल करने का अहद करता तो मैंने दियानतदारी से दूसरा रास्‍ता इख्तियार किया और पहले रास्‍ता को रद्द कर दिया यही दूसरा रास्‍ता मस्‍लक अहले हदीस है. जिसका मतलब किसी खा़स तबके़ की तक़लीद करना नहीं बल्कि कुरआन व हदीस पर ईमान लाकर उनके मुताबिक़ अमल करना है. लिहाजा़ मैंने मज़कूरा बाला मुख़तलिफ़ अदवार से गुज़रने के बाद मसलक अहले हदीस को इख्तियार किया और इसका ऐलान भी कर दिया. इसके बाद नमाज़ तरावीह, फा़तिहा ख़लफ़ुल इमाम, अहकाम नमाजे जनाजा़ बगै़रह जैसे मसाइल पर छोटे छोटे रसाइल भी तस्‍नीफ़ करके शाए करा चुका हूं ताकि दूसरे मुसलमानों को भी अल्‍लाह तबारक व तआ़ला हिदायत नसीब फ़रमा दे. और वह तक़लीद तरक करके सुन्‍नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) पर अमल पैरा होकर अपनी आकि़बत संवारें. इस मुख्‍़तसिर सी तहरीर का मतलब यही है कि अल्‍लाह तआला इसके मुतालआ से मुसलमानों को इत्तिबाए रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की तौफी़क अ़ता फ़रमाए (आमीन)
वमा अलैना इल्‍लल बलागुल मुबीन.

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) और भारतीय धार्मिक ग्रन्‍थ

      सत्‍य हमेशा स्‍पष्‍ट होता है. उसके लिए किसी तरह की दलील की ज़रूरत नहीं होती. यह बात और है कि हम उदसे न समझ पायें या कुछ लोग हमें इससे दूर रखने का कुप्रयास करें. अब यह बात छिपी नहीं रही कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इस सृष्टि‍ के अन्तिम पैग़म्‍बर (संदेष्‍टा) हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के आगमन की भविष्‍यवाणियां की गयी हैं. मानवतावादी सत्‍य गवेषी विद्वानों ने ऐसे अकाट्रय प्रमाण पेश करा दिये, जिससे सत्‍य खुलकर सामने आ गया है.

     वेदों में जिस उष्‍ट्रारोही (उंट की सवारी करने वाले) महापुरूष के आने की भविष्‍यवाणी की गयी है, वे हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ही हैं. वेदों के अनुसार उष्‍ट्रारोहीका नाम नराशंस होगा. नराशंस का अरबी अनुवाद मुहम्‍मद होता है. नराश्‍शंस के बारे में वार्णित समस्‍त क्रियाकलाप हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के आचरणों और व्‍यवहारों से चमत्‍कारिक साम्‍यता रखते हैं. पुराणों और उपनिषदों में कल्कि अवतार की चर्चा है, जो हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ही सिद्ध होते हैं. कल्ज्कि का व्‍यक्तित्‍व और चारित्रिक विशेषताऐं अन्तिम पैग़म्‍बर हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के जीवन-चरित्र को पूरी तरह निरूपित करती हैं. यही नहीं उपनिषदों में साफ़ तौर से हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) का नाम आया है और उन्‍हें अल्‍लाह का रसूल (संदेशवाहक) बताया गया है. पुराण और उपनिषदों में यह भी वर्णित है कि ईश्‍वर एक है. उसका कोई भागीदार नहीं है. इनमें अल्‍लाह शब्‍द का उल्‍लेख कई बार किया गया है.
     इन सच्‍चाइयों के आलोक में मानवमात्र को एक सूत्र में बांधने और मानव एकता एवं आखण्‍डता को मजबूत करने के लिए सार्थक प्रयास हो सकते हैं. यह समय की मांग भी है. वैमनस्‍यता और साम्‍प्रदायिक्‍ता के इस आत्‍मघाती दौर में ये सच्‍चाइयां मील का पत्‍थर साबित हो सकती हैं. भाई-भाई को गले मिलवा सकती हैं और एक ऐसे नैतिक और सद् समाज का निर्माण कर सकती है, जहां हिंसा, शोषण, दमन और नफ़रत लेशमात्र भी न हो. इन्‍हीं उददेश्‍यों को लेकर सभी सच्‍चाइयों को एक साथ आपके समक्ष संक्षेप में प्रस्‍तुत किया जा रहा है. (विस्‍तृत अध्‍ययन के लिए सन्‍दर्भित पुस्‍तकों का अध्‍ययन किया जा सकता है) उम्‍मीद है कि ये सच्‍चाइयां दिल की गहराइयों में उतर कर हम सभी को मानव कल्‍याण के लिए प्रेरित करेंगी. प्रस्‍तुत‍ आलेख में डा0 वेद प्रकाश उपाध्‍याय के शोध ग्रन्‍थों नराशंस और अन्तिम ऋषि और कल्कि अवतार और मुहम्‍मद साहब के अलावा अन्‍य स्रोतों से प्राप्‍त तथ्‍यों का समावेश किया गया है.

          नराशंस या मुहम्‍मद ः-
 
वेदों में नराशंस या मुहम्‍मद के अ.ने की भविष्‍यवाणी कोई आश्‍चर्यजनक बात नहीं है बल्कि ग्रन्‍थों में ईशदूतों (पैग़म्‍बरों) के आगमन की पूर्व सूचना मिलती रही है. यह ज़रूर चमत्‍कारिक बात है कि हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के आने की भविष्‍यवाणी जितनी अधिक धार्मिक ग्रन्‍थों में की गई है उतनी किसी अन्‍य पैग़म्‍बर के बारे में नहीं की गई. ईसाइयों, यहूदियों और बौद्धों के धार्मिक ग्रन्‍थों में हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के अन्तिम ईशदूत के रूप में आगमन की भविष्‍यवाणियां की गई हैं.
     वेदों का नराशंस शब्‍द नर औरन आशंस दो शब्‍दों से मिलकर बना है. नर का अर्थ मनुष्‍य होता है और आशंस का अर्थ मनुष्‍यों द्वारा प्रशंसित है. सायण ने नराशंस का अर्थ मनुष्‍यों द्वारा प्रशंसित बताया है. (सायण भाष्‍य, ऋग्‍वेद संहिता, 5/5/2). वेदों में ऋग्‍वेद सबसे पुराना है. उसमें नराशंस शब्‍द से शुरू होने वाले आठ मंत्र हैं. ऋग्‍वेद के प्रथम मंडल तेरहवें सुक्‍त तीसरे मंत्र और अठारहवें सूक्‍त, नवें मंत्र तथा 106वें सूक्‍त चौथे मंत्र में नराशंस का वर्णन आया है. ऋग्‍वेद के द्वितीय मंडल के तीसरे सूक्‍त, दूसरे मंत्र, सातवें मंडल के दूसरे सूक्‍त, दूसरे मंत्र, दसवें, 64वें सूक्‍त, तीसरें मंत्र और 142वें सूक्‍त दूसरें मंत्र में भी नराशंस वषियक वर्णन आये है. सामवेद संहिता के 1319वें मंत्र में और वजासनेयी संहिता के 28वें अध्‍याय के 27वें मंत्र में भी नरशंस के बारे में जिक्र आया है.
     भविष्‍य पुराण के अध्‍याय 323 के श्‍लोक 5 में स्‍पष्‍ट तौर पर कहा गया है कि एक दूसरे देश में एक आचार्य अपने मित्रों के साथ आयेंगे. उनका नाम महामद होगा. वे रेगिस्‍तानी क्षेत्र में आयेंगे. इस अध्‍याय का श्‍लोक 6,7,8 भी मुहम्‍मद साहब के वषिय में है. पैग़ग्‍बरे इस्‍लाम हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के जन्‍म स्‍थान सहित अन्‍य साम्‍यताएं कल्कि अवतार से भी मिलती हैं, जिनका वर्णन कल्कि पुराण में है.
 
कल्कि अवतार के आने का लक्षण ः-
 
     कल्कि के अवतरित होने का समय उस माहौल में बताया गया है जब कि बर्बरता का साम्राज्‍य होगा. लोगों में हिंसा व अराजकता का बोल-बाला होगा. दूसरों को मार कर उनका धन लूट लेना और लड़कियों को पैदा होते ही पृथ्‍वी में गाड़ देना. एक ईश्‍वर को छोड़कर कई देवियों-देवताओं की पूजा. पेड़-पौधों एवं पत्‍थरों को भगवान मानने की प्रवृत्ति, असमानता आदि ऐसे ही नाजुक दौर में हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) भेजे गये थे.
     दूसरी बात ध्‍यान देने की यह है कि अन्तिम अवतार उस समय होगा जबकि युद्धों में तलवार का इस्‍तेमाल होगा और घोड़ों की सवारी की जाती हो. आज से लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व तलवारों और घोड़ों का प्रयोग होता था. उसके लगभग सौ वर्ष बाद से बारूद का निर्माण सोडा और कोयला मिलाकर होने लगा था. वर्तमान समय में तो घोड़ों और तलवारों का स्‍थान टैंकों और मिसाइलों आदि ने ले लिया है.
 
कल्कि के अवतार का स्‍थान -
 
     कल्कि के अवतार का स्‍थान शम्‍भल ग्राम में होने का उल्‍लेख कल्कि पुराण में किया गया है. यहां पहले यह यह निश्‍चय करना आवश्‍यक है कि शम्‍भल ग्राम का नाम है या किसी ग्राम का विशेषणा डा0 वेद प्रकाश उपाध्‍याय के मतानुसार शम्‍भल किसी ग्राम का नाम नहीं हो सकता, क्‍योंकि यदि किसी ग्राम विशेष को शम्‍भल नाम दिया गया होता तो उसकी स्थिति भी बताई गई होती. भारत में खोजने पर यदि कोई शम्‍भल नाम का ग्राम मिलता है तो वहां आज से लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व कोई पुरूष ऐसा नहीं पैदा हुआ जोलोगों का उद्धारक हो. फिर अन्तिम अवतार कोई खेल तो नहीं है कि अवतार हो जाय और समाज में ज़रा सा परिवर्तन भी न हो, अतः शम्‍भल शब्‍द को विशेषण मानकर उसकी व्‍युत्‍पत्ति पर विचार करना आवश्‍यक है.
1-   शम्‍भल शब्‍द शम (शान्‍त करना) धातु से बना है अर्थात् जिस स्‍था में शान्ति मिले.
2-   सम् उपसर्गपूर्वक वृ धातु में अप् प्रत्‍यय के संयोग से निष्‍पन्‍न शब्‍द संवर हुआ वबयोरभेदः और रलयोरभेदः के सिद्धांत से शम्‍भल शब्‍द की निष्‍पत्ति हुई, जिसका अर्थ हुआ जो अपनी ओर लोगों को खींचता है या जिसके द्वारा किसी को चुना होता है.
3-   शम्‍वर शब्‍द का नघिण्‍टु (1/12/88) में उदकनामों के पाठ है. और में अभेद होने के कारण शम्‍भल का अर्थ होगा जल का समीपवर्ती स्‍थाना (कल्कि अवतार और मुहम्‍मद साहब पृ0 28,30)
     इस प्रकार वह स्‍थान जिसके आसपास जल हो और वह स्‍थान अत्‍यन्‍त आकर्षक एवं शान्तिदायक हो, वहीं शम्‍भल होगा. अवतार की भूमि पवित्र होती है. शम्‍भल का शाब्दिक अर्थ है( शान्ति का स्‍थाना मक्‍का को अरबी में दारूल अमन कहा जाता है, जिसका अर्थ शान्ति का घर होता है. मक्‍का मुहम्‍मद साहब का कार्यस्‍थल रहा है.
     इसके अलावा जन्‍म तिथि तथा अन्तिम अवतार की विशेषताएं- अश्‍वारोही व खडगधारी, दुश्‍मनों का दमन, चार भाईयों (सहाबा, खुलफाए राशिदीन) के सहयोग से युक्‍त, आठ सिद्धियों  व गुणों से युक्‍त आदि का अध्‍ययन करें तो यह मुहम्‍मद साहब पर बिल्‍कुल सटीक पड़ती हैं.
 
उपनिषदों में भी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) की चर्चा
     उपनिषदों में भी हज़रत मुहम्‍मद साहब और इस्‍लाम के बारे में जहां तहां उल्‍लेख मिलता है. नागेन्‍द्र नाथ बसु द्वारा सम्‍पादित विश्‍वकोष के द्वितीय खण्‍ड में उपनिषदों के श्‍लोक के वे श्‍लोक दिये गये हैं जो इस्‍लाम और पैग़म्‍बर हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) से ताल्‍लुक़ रखते हैं. इनमें से कुछ प्रमुख श्‍लोक और उनके अर्थ प्रस्‍तुत किये जा रहे हैं ताकि पाठकों को वास्‍तविकता का पता चल सके. ‘’हरि ओउम वरूण ........ अलावृकं निखातकम  (अल्‍लोपनिषद- 1,2,3) अर्थात् इस देवता का नाम अल्‍लाह है. वह एक है. मित्रा वरूण आदि इसकी विशेषताएं हैं. वास्‍तव में अल्‍लाह वरूण है जो तमाम सृष्टि का बादशाह है. मित्रो! उस अल्‍लाह को अपना पूज्‍य समझो. वह वरूण है और एक दोस्‍त की तरह वह तमाम लोगों के काम संवारता है. वह इन्‍द्र है, श्रेष्‍ठ इंसान इन्‍द्रा अल्‍लह सबसे बड़ा सबसे बहतर, सबसे ज्‍़यादा पूर्ण और सबसे ज्‍़यादा पवित्र है. मुहम्‍म्‍द अल्‍लाह के श्रेष्‍ठतर रसूल हैं. अल्‍लह आदि अन्‍त और सारे संसार का पालनहार है. तमाम अच्‍छे काम अल्‍लाह केलिए ही हैं. वास्‍तव में अल्‍लह ही ने सूरज, चांद और सितारे पैदा किये हैं.
     इस उपनिषद के अन्‍य श्‍लोकों में भी इस्‍लाम और हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के साम्‍यगत बातें आयीं हैं इस उपनिषद में आगे कहा गया है- ‘’अल्‍ले यज्ञेन हुत्‍वा अल्‍ल सूर्य....... हां अल्‍लो रसूल मुहमद रकवसय अल्‍ले अल्‍लो इलल्‍लेति इलल्‍ला (5,6,7)
     अर्थात् अल्‍लाह ने सब ऋषि भेजे और चन्‍द्रमा, सूर्य एवं तारों को पैदा किया. उसी ने तमाम ऋषि भेजे और आकाश को पैदा किया. अल्‍लाह ने ब्राह्माण्‍ड (पृथ्‍वी और आकाश) को बनाया. अल्‍लाह श्रेष्‍ठ है, उसके सिवा कोई पूज्‍य नहीं. अल्‍लाह अनादि से है. वह सारे विश्‍व का पालनहार है. वह तमाम बुराइयों और मुसीबतों को दूर करने वाला है. मुहम्‍मद अल्‍लाह के रसूल (संदेष्‍ठा) हैं, जो इस संसार का पालनहार है. अतः घोषणा करो कि अल्‍लाह एक और उसके सिवा कोई पूज्‍य नहीं.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

हमारा ख़ानदानी मस्‍लक बरेल्वी था - अरशद इक़बाल

 रोहड़ी के एक इलाके लोकोशेड में मेरा जन्म स्थान है, वालिद का नाम जुमा खान है। वालिद और वालिदा दोनों तरफ़ से हमारा खा़नदानी मसलक बरेल्वी था और बरेल्वी होने की वाहिद वजह (एकमात्र कारण) जहालत थी। तालीम का कोई खा़स रिवाज नहीं था, अल्बत्ता हमारे वालिदेन ने हम बहन भाइयों को मैट्रिक तक तालीम ज़रूर दिलवाई थी। नज़र व नियाज़ का हमारे हॉं खा़स अहतमाम होता था, हमारे नाना नियाज़ की किसी तारीख़ को नजर अन्दाज़ नहीं करते थे और कुछ न कुछ नियाज़ ज़रूर करते। हमारे वालिद साहब बिलखुसूस (विशेषतः) ग्यारहवी शरीफ़ की नियाज़ बड़ी धूम-धाम से करते, देगें चढ़ती थीं लोग जमा होते  और बड़ी रौनक हो जाती। हमारे घर में मजा़रों पर चादरें और नज़र बगै़रह  भी चढ़ाई जाती थी। मजा़रों और बुजुर्गों के मुताल्लिक़ बचपन से ही हमें यह अ़की़दा दिया गया था कि यह अल्लाह के हां हमारा वसीला हैं। हम तो गुनाहगार लोग है।, बराहे रास्त हमारी बात अल्लाह के नज़दीक वह मुका़म हासलि नहीं करती जो बुजुर्गों की करती है। इसलिए बुजुर्गों के वसीले से ही जो हाजात (ज़रूरतें) अल्लाह के सामने पहुंचती हैं वह जल्दी पूरी हो जाती हैं।
 अगर्चे मैं चादरें बगैरह चढ़ाने वालों को और मजा़रों पर जाकर नज़र व नियाज़ करने वालों को बुरा नहीं समझता था लेकिन कुदरती तौर पर बचपन से आज तक कभी भी मेरा झुकाव इस ओर नहीं हुआ था, घर वाले मजा़रों पर जाते लेकिन मैं कभी नहीं गया, मुझे याद है एक मर्तबा तमाम घर वाले लाल शहबाज़ क़लन्द के मजा़र उनके उर्स में षिर्कत के लिये जा रहे थे, हालांकि एक तफ़रीह का मौका़ भी था लेकिन उस वक्त भी मैंने मजा़र पर जाने के बजाय घर में रहने को तरजीह दी।
 अगर्चे हमारे घर में नमाज़ बगै़रह की पाबन्दी नही थी लेकिन बचपन से ही मज़हब की जानिब मेरा झुकाव था, अगर्चे मुस्तक़िल मिजाजी़ नहीं थी, ईमान घटता और बढ़ता रहता था, कभी बाका़यदी से पांच वक्त की नमाज़ें शुरू हो जाती थीं और कभी कई कई दिन हो जाते नमाज़ पढ़े हुए, नमाज़ के मामले में मुस्तक़िल मिजाजी़ तक़रीबन नौ दस साल पहले हासिल हुई जब मैंने यह अ़हद किया कि या अल्लाह मुझे सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर कोई नमाज़ नहीं छोडूंगा और ऐसा ही हुआ, अल्हम्दु लिल्लाह जब से सरकारी मुलाज़िमत मिली उसके बाद से आज तक मुस्तक़िल मिजाजी से नमाजें पढ़ रहा हूं .

वहाबियों से मुताल्लिक़ मेरे नज़रियात

 वहाबियों से मुताल्लिक़ मुझे कोई खा़स मालूमात नहीं थीं, बस इतना सुन रखा था कि यह काफ़िर होते हैं, नज़र व नियाज़ को नहीं मानते, औलिया-अल्लाह के गुस्ताख़ हैं, रसूलुल्लाह पर दरूद व सलाम नहीं पढ़ते, यह सब गुस्ताख़े रसूल हैं। बस जो कुछ सुना उस पर यक़ीन कर लिया था, कभी तहकी़क की ज़हमत गवारा नहीं की थी। अगर्चे इलाके़ में अहले हदीस की मस्जिद मौजूद थी लेकिन मेरा कभी किसी अहले हदीस से वास्ता नहीं पड़ा था।
 आ़मिर भाई हमारे क़रीबी दोस्तों से थे, क्रिकेट के अ़लावा भी हमारे दरमियान काफ़ी हम-आहंगी थी। मज़हबी सरगर्मियों में भी वह हमारे साथ ही होते थे। बल्कि वह मस्जिद के मामलात में मुझसे ज़्यादा सरगर्म रहते थे। एक रोज़ में अहले हदीस मसिजद के सामने से गुज़र रहा था, मस्जिद के साथ ही मुहम्मदी लाइब्रेरी थी, जिसमें किताबों के अलावा अहले हदीस उलेमा की तक़रीरों की कैसिटें भी मिलती थीं। मेरी नज़र अचानक उसमें बैठे हुए एक नौजवान पर पड़ी शकल तो बहूत मानूस (जानी-पहचानी) है। आ़मिर भाई हैं? नहीं वह यहां कैसे हो सकते हैं, मैं मुंह ही मुंह में बड़बड़ाया, जबक मैंने थोड़ा सा क़रीब होकर गौ़र किया तो मालूम हुआ कि वह वाक़ई आ़मिर भाई हैं। मैं बड़ा हैरान हुआ कि वह वहाबियों की लाइब्रेरी में कैसे पहुंच गये? मुझे फ़िक्र ने आ घेरा। कहीं यह वहाबियों के चंगुल में तो नहीं फंस गये? वैसे भी सुन रखा था कि वहाबी आदमी को बहुत जल्द अपना लेते हैं। उनकी दलीलों को कोई जवाब नहीं होता। हमें आ़मिर भाई को वहां बैठे देखने पर तशवीश हुई कि हम यह भी सुनते आये थे कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान ख़राब हो जाता है। दोस्त से हमारी मुहब्बत जागी दोस्ती का तका़जा़ यह ठहरा कि आ़मिर भाई को वहाबियों के चंगुल से फंसने से बचाया जाय। मैंने सोचा यह ज़रा बाहर आ जाय फिर मामले की तहकी़क करके उसे समझाते हैं। हर रोज़ शाम को मग़रिब और इषा के बाद आ़मिर भाई के घर के सामने हमारी बैठक होती थी। उस रोज़ जब वह वहां आये तो मैंने झट सवालात की झड़ी लगा दी। वहाबियों की लाइब्रेरी में क्यों गये थे? क्या काम था? क्या ज़रूरत पेश आ गई थी? तुम्हें मालूम नहीं है कि वहाबियों की सोहबत में बैठने से ईमान कमजो़र हो जाता है, यह जानते-बूझते उनकी मस्जिद में क्यों गये? मेरे इन तमाम सवालों का आ़मिर भाई ने एक ही जवाब दिया जो चंद लम्हों  के लिये मुझ पर बड़ा गिरां गुज़रा। कहने लगे अरशद भाई मैं वहाबी हो गया हूं। वहाबी.......मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, ऐसा लगा कि गोया मेरे सामने  दुनिया का आठवां अजूबा पेश कर दिया गया है और मैं उसे देख कर हैरान हो रहा हूं। मैं अभी हैरानगी की के आलम में ही था कि मुझ पर अल्लाह का करम हुआ और अल्लाह तआ़ला ने मेरे ज़हन में मसबत नुक्ता नजर (सकारात्मक दृष्टिकोण) डाला। मैंने सोचा कि आ़मिर भाई पढ़े लिखे ज़हीन और बा-शऊर  नौजवान हैं यह अगर वहाबी हुए हैं तो ज़रूर कोई न कोई बात है। मसलक अहले हदीस में ज़रूर कोई ऐसी सच्चाई है जो पढ़े लिखे और बा-शऊर लोगों को अपनी जानिब खींच लेती है। मैंने आ़मिर भाई को समझाने की नीयत कर रखी थी लेकिन हाल यह हो गया कि उल्टा वह मुझे समझा रहे थे और सहर ज़दा शख़्स की तरह बिला चूं व चिरां उनकी गुफ़्तगू सुन रहा था। इस गुफ़्तगू में उनकी एक बात ज़हन में बैठी, उन्होंने कहा कि किसी की न मानो न वहाबियों की मानों और न अपने मौलवियों की खुद कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ कर देख लो कि किसका मसलक सही है और कुरआन के मुताबिक़ है। दूसरी बात जो उन्होंने मेरे ज़हन में बिठाने की कोशिश की वह हदीस और फ़िक्ह का फ़र्क़ था। और शायद बाद में मैं इसी बुनियाद पर अहले हदीस हुआ, उन्होंने कहा कि हमने मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का कलिमा पढ़ा है किसी इमाम का कलिमा नहीं पढ़ा। हम सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल की इता़अ़त के पाबन्द हैं किसी इमाम की फ़िक्ह के मुता़बिक़ नहीं। उन्होंने बताया कि हम हनफी़ कहलाते हैं, क्योंकि हम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करते हैं और हमारे मौलवी कहते हैं कि हम हक़ पर हैं, अगर सिर्फ़ हम यानी इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की तक़लीद करने वाले ही हक़ पर हैं तो इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) से पहले जो मुसलमान गुज़रे जिनमें खुद सहाबा किराम जैसी मुक़द्दस हस्तियां भी षामिल थीं, क्या वह सब नाहक पर थे? उन्होंने किस इमाम की पैरवी की थी। उन्होंने किसी की फ़िक्ह पर नहीं बल्कि सिर्फ़ उन ही बातों पर अ़मल किया था जो अल्लाह और रसूल की बातें थीं, यानी कुरआन व हदीस पर। यह सारे दलाइल (दलीलें) ऐसे थे जिन पर गै़र जानिबदाराना (निष्पक्ष रूप से) गौ़र किया जाय तो हर बा-शऊर आदमी को अपील करते हैं। मैं भी इन दलाइल से काफ़ी मुतास्सिर हुआ। लेकिन इतनी आसानी से वहाबी हो जाना तो हमारी शान के खि़लाफ़ था।

 तर्जुमा पढ़ते हुए वहाबियों के खि़लाफ़ तो कोई दलील न मिली अल्बत्ता अपने मसलक के खिलाफ़ दलाइल मिलते रहे
 कई रोज़ तक इसी तरह उनके साथ गुफ़्तगू चलती रही और मेरा ज़हन तैयार होता रहा, लेकिन बाप दादा का मसलक छोड़ना इतना आसान नहीं होता, इसके लिये अपनी अनाकी कुरबानी देनी पड़ती है और अपने बाप दादा को ग़लत कहना पड़ता है और यह सब कुछ उसी वक्त होता है जब हक़ पूरी तरह दिल व दिमाग़ को मुसख्ख़र कर ले। इसके लिए बहरहाल कुछ न कुछ वक्त लगता ही है। आ़मिर भई की तरगी़ब पर मैंने कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ने की ठानी और इस नीयत के साथ तर्जुमा पढ़ना षुरू किया कि इसमें से वहाबियों के खि़लाफ़ दलाइल मिलते रहे बल्कि ऐसा लग रहा था कि पूरा कुरआन ही हमारे मसलक के खि़लाफ़ है। कुरआन के तो हर सफ़्हे पर तौहीद के दलाइल हैं जबकि हम जिस मस्‍लक पर कारबन्द थे वह तो शिर्क से आलूदा था।

मेरा ज़मीर मुझे मलामत करने लगा कि हक़ समझने के बाद भी क्या हक़ कुबूल नहीं करेगा
 कुरआन के तर्जुमे ने मेरा दिल व दिमाग़ में बसी अ़का़इद की दुनिया को तहस नहस करके रख दिया था। तौहीद मेरी समझ में आ रही थी और जब तौहीद समझ में आ जाय तो शिर्क कैसे बरक़रार रह सकता है। एक जानिब कुरआन मजीद के तर्जुमे के असरात दूसरी तरफ़ आ़मिर भाई से फ़िक्ह और हदीस और नमाज़ व दीगर मसाइल पर मुसलसल गुफ़्तगू, यूं मैं चारों तरफ़ से जकड़ा गया, मेरा ज़मीर मुझे मलामत करने लगा, हक़ समझने के बाद भी क्या हक़ कुबूल नहीं करेगा? अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं अपनी शिकस्त तस्लीम कर लूं और हक़ को अपने पर फ़तह दे दूं। नहीं........ अगर मैं वहाबी हो गया तो घर वाले क्या सोचेंगे। वालिद साहब सख़्त आदमी हैं वह  तो मुझे घर से बाहर निकाल देंगे.......खा़नदान वाले मुझे बदनाम कर देंगे दोस्त अहबाब क्या सोचेंगे। अरशद वहाबी हो गया........इस तरह के वस्वसे मेरे मन में सिर उठा रहे थे और कुबूल हक़ की राह में मुजा़हिम (रोक) बन रहे थे। लेकिन आखि़र मैंने इन तमाम षैतानी वस्वसों को शिकस्त दी और मसलक हक्क्हू-मसलक अहले हदीस कुबूल करने का पुख़्ता अ़ज़म (इरादा) कर लिया। घर और बाहर हर एक को बता दिया कि मैं वहाबी हो गया हूं।
अहले हदीस होने के बाद क्या गुज़री ?


घर और खा़नदान में हर जगह मुझे मुखा़लिफ़त का सामना करना पड़ा। वालिद साहब तो कट्टर बरेल्वी अ़की़दा रखते थे और हर साल बड़े अहतमाम के साथ ग्यारहबी शरीफ़ की नियाज़ दिलाते थे उन्हें मेरा मसलक अहले हदीस कुबूल करना सख़्त नागवार गुज़रा, पहले पहल तो उन्होंने मुझे आराम से समझाने की कोशिश की, कहने लगे कि ‘‘बेटा! अभी तुमने दुनिया नहीं देखी तुम्हारा इल्म महदूद (सीमित) है। अभी तुम मज़हबी मामलात को नहीं समझ सकते, इसलिए वापिस अपने मस्‍लक पर आ जाओ जबकि मैं उनसे कहता कि आप कोई दलील तो दें कि जी यह बात वहाबियों की कुरआ़न व हदीस के ख़िलाफ़ है इसलिए ग़लत है।’’ वालिद साहब दलाइल दिये बगै़र मिन्नत समाजत करते बल्कि यहां तक भी कहने लगे कि तुम अपने मस्‍लक पर वापिस आ जाओ अगर तुम्हारे गुनाह होंगे तो आखि़रत के दिन मैं उन गुनाहों को अपने सिर ले लूंगा।
 जैसे-जैसे खा़नदान वालों ने वालिद साहब को ता़ने देना शुरू किये, वैसे-वैसे उनकी मुखा़लिफ़त में इजा़फ़ा होता गया। यहां तक कि एक रोज़ उन्होंने मुझे घर से निकालने की धमकी दे डाली इस पर भी मैं साबित क़दम रहा और कह दिया जो दिल चाहे कर लो जिस मस्‍लक को मैंने कुरआन व हदीस के दलाइल से दुरूस्त समझा है उसे नहीं छोड़ सकता। वालिद साहब को मुझसे नफ़रत हो गयी थी, घर में मेरा वजूद उन्हें बर्दाष्त नहीं होता था वह समझते थे कि मैंने पूरे खा़नदान में उनकी नाक कटा दी।

वालिद साहब बरेल्वी मस्जिद के मौलवी साहब के पास ले गये
इब्तिदाई दिनों में जब वालिद साहब मुझसे ना उम्मीद नहीं हुए थे और अपने तईं मेरी इस्लाह की कोषिषों में मसरूफ़ थे तो एक रोज़ नाना के साथ मिल कर इलाक़े की बरेल्वी मस्जिद के मौलवी साहब के पास भी ले कर गये कि शायद वह इसे समझा देंगे मौलवी साहब से कहा, यह वहाबी हो गया है कहता है ग्यारहवीं शरीफ़ करना जाइज़ नहीं है। मौलवी साहब मेरी तरफ़ मुखा़तिब होकर कहने लगे किस तरह जाइज़ नहीं है, मैंने कहा कि कुरआन ने गैर-अल्लाह की नज़र व नियाज़ हराम कर दी है। कुरआन में अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया है किः ‘‘ ‘‘ ‘‘कि बेशक तुम पर हराम कर दिया गया है मुर्दार (बहता लहू, खिंजी़र का गोश्‍त और वह नियाज़ जिसे गैर-अल्लाह के साथ मंसूब कर दिया जाय।’’
 मौलवी साहब कहने लगे कि हम ग्यारहवीं शरीफ़ के लिए जो जानवर ज़िब्ह करते हैं उस पर अल्लाह का नाम लेते हैं। ज़िब्ह करते वक्त या गौस या  गौस थोड़ी कहते हैं, तकबीर ही पढ़ते हैं। मैंने कहा कि अगर खिंजी़र को अल्लाहु-अकबर कह कर ज़िब्ह किया जाय तो क्या वह हलाल हो जायेगा? इसी तरह जब एक जानवर को गै़र-अल्लाह की तरफ़ मंसूब कर दिया गया है कि शैख अब्दुल का़दिर जीलानी (रहमतुल्लाह अलैहि) के नाम की नियाज़  है तो उस पर लाख अल्लाहु-अकबर पढ़ लिया जाय तब भी वह कुरआन की आयत की रू से जाइज़ नहीं होगा। मौलवी साहब मेरे ऐतराजात का कोई इत्मीनान बख्श जवाब नहीं दे सके और वालिद साहब की यह कोशिश भी नाकाम हो गई।


मैंने गै़र शरई नज़र व नियाज़ की मुखा़लिफ़त की
 मैंने वालिद साहब की सख्ती के बावजूद घर में गै़र-शरई नज़र व नियाज़ की मुखा़लिफ़त की और घर वालों को समझाया कि अगर कुछ पकाना है, लोगों को खिलाना है तो मुक़र्ररह तारीखों के अलावा किसी भी दिन अल्लाह के नाम का पका लिया करें। हमारी वालिदा निस्बतन सुलझे हुए ज़हन की थीं और थोड़ी बहुत पढ़ी हुई थीं, मैं उन्हें कुरआन मजीद का तर्जुमा पढ़ने की तरगी़ब देता और खुद भी उन्हें पढ़ कर सुनाता जिससे बहुत जल्द उनकी समझ में आई और उनके अकी़दे की इस्लाह हो गई। आज भी अगर्चे वह रफे-यदैन के साथ नमाज़ नहीं पढ़तीं लेकिन अकी़दतन अहले हदीस ही हैं।
नबी के कहने पर भी तुम कह रहे हो कि अल्लाह को नहीं जानते, बताओ नबी की बात का तुम पर क्या असर  उन्हीं दिनों एक साहब से बात हुई वह मुका़मे मुस्तफ़ा बयान करते हुए कहने लगे कि हम तो अल्लाह को नहीं जानते, हमने अल्लाह को देखा ही नहीं। हम तो सिर्फ़ मुहम्मद रसूलुल्लाह को ही जानते हैं। मैंने कहा, मौहतरम अगर तुम मका़मे मुस्तफ़ा हम अहले हदीसों से पूछो, तो हम तो यह कहते हैं किः ‘‘बाद अज़ खुदा बुजुर्ग तो मैं क़िस्सा मुख़्तसर‘‘()
 लेकिन यह जो आप बयान कर रहे हैं, यह मका़मे मुस्तफ़ा नहीं बल्कि नबी की गुस्ताख़ी है, ठीक है हम पहले अल्लाह को नहीं जानते थे, लेकिन नबी ने हमें बताया कि अल्लाह, उसे जानो। नबी के कहने पर भी तुम कह रहे हो कि अल्लाह को नहीं जानते। बताओ नबी की बात का तुम पर क्या असर हुआ?
 एक मर्तबा षया से मेरी गुफ़्तगु हुई वह कहने लगा कि इसका क्या सबूत है कि जो हदीसें आप पढ़ते हैं और उस पर अमल करते हैं वह सही हैं, सच्ची हैं। मैंने जवाब देने के बजाय उल्टा उनसे सवाल कर दिया। मैंने कहा कि कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि हदीसें ग़लत हैं लेकिन जिन किताबों पर आपने अकी़दे और मसलक की बुनियाद रखी है उसकी क्या गारंटी है कि वह सही हैं। फिर मैंने उन्हें बात समझाते हुए कहा कि अगर्चे कुरआन से साबित है कि जिस तरह अल्लाह ने कुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली है उसी तरह हदीस की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी भी ली है। क्योंकि अगर नबी मुकर्रमकी ज़िन्दगी के हालात महफ़ूज़ नहीं होंगे तो कुरआन से इस्तिफ़ादा नहीं किया जा सकता, कुरआन कहता है नमाज़ पढ़ो लेकिन नमाज़ किस तरह पढ़नी है कितनी पढ़नी है? इन सवालों के जवाबात तो हदीस से मिलेंगे लेकिन अगर कुछ देर के लिए फ़र्ज़ कर लें कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि हदीसें सही हैं तो फ़िक्ह से मुताल्लिक तो और भी शक किया जा सकता है कि वह सही नहीं हैं, इस नुक्ता-नज़र (दृष्टिकोण) से सोचें कि हदीस का मसलक भी ग़लत है, इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी  इमाम जाफ़र सादिक़ (रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत, इमाम मालिक (रहमतुल्लाह अलैहि) और इमाम अहमद बिन हंबल(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक़्ह भी ग़लत, इमाम शाफ़ई(रहमतुल्लाह अलैहि) की फ़िक्ह भी ग़लत है। ऐसी सूरत में एक अक़लमंद आदमी का झुकाव यकी़नन हदीस ही की तरफ़ होगा, मेरा इन्तिखा़ब भी हदीस है। कल अगर रोज़-ए-क़यामत अल्लाह तआला ने कहा कि फ़लां फ़िक्ह सही थी तो तुमने उसे छोड़ कर हदीस की तरफ़ क्यों आये? तो मैं यह कह सकूंगा कि या अल्लाह दुनिया के बाजा़र में कोई मुझे अबू हनीफ़ा लिल्लाहकी तरफ़ बुला रहा था, कोई अहमद बिन हंबल लिल्लाहकी तरफ़, कोई शाफ़ई लिल्लाहऔर मालिकी और जाफ़र सादिक़ की तरफ़ और कोई हदीस की तरफ़, मेरे ईमान ने गवारा नहीं किया कि मैं तेरे नबी की हदीसों को छोड़ कर किसी की फ़िक्ह की तरफ़ आऊं  क्योंकि कोई भी मुझे सही होने की गारंटी नहीं दे रहा था। वैसे भी अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में अत़ीउल्लाह व अती़उर्रसूलका हुकुम दिया है अगर हदीसें ग़लत हैं तो फिर रसूल की इता़अत कैसे करें? मेरे ख़्याल में यह एक ऐसी आम सी बात है जिसे हर शख़्स आसानी से समझ सकता है। नबी को छोड़ कर किसी इमाम की फ़िक्ह की तरफ़ जाने की क्या ज़रूरत है जबकि इस बात की किसी के पास कोई जमानत नहीं कि फ़लां फ़िक्ह दुरूस्त है।
   इसी तरह मुख़तलिफ़ जगहों पर मुख़तलिफ़ मसाइल पर बहसें होती रहीं और यह बहसें मुझे पुख़्ता अहले हदीस करने का सबब बनती रहीं। आज अल्हम्दु लिल्लाह मेरे छोटे भाई और एक कज़िन भी अहले हदीस हो गये हैं। वालिद साहब में भी बड़ी तब्दीली आई है और उनका अकी़दा बहतर हो गया है। खा़नदान के दीगर घरानों पर भी असरात मुरत्तब हुए हैं और उनकी षिद्दत में कमी आई है। आखि़र में अल्लाह तआला से दुआ़ है कि अल्लाह तआला जितने भी नये अहले हदीस हैं सबकों इस्तिका़मत अ़ता़ फ़रमाये और इस मसलक हक्क़हू के फुरोग के लिए अपना भरपुर किरदार अदा करने की तौफ़ीक़ अता़ फ़रमाये।...(आमीन)


स्रोत - http://www.ahlehadith.org/  (उर्दू से रूपान्‍तरित)


शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मुहर्रम और मौजूदा मुसलमान (कुछ हैरतअंगेज और कड़बी हक़ीक़तें)


माह मुहर्रम की नवीं व दसवीं तारीख़ जबर्दस्त अहमियत और इबादत का दिन है। इस दिन हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने नफ़ली रोजे़ रखने का हुक्म दिया है। मातम व मौजूदा रस्म -रिवाज और खुराफ़ात का इस्लाम धर्म से कोई वास्ता (सम्बन्ध) नहीं है। पवित्र कुरआन में है-‘‘इस्लाम वह धर्म है जो सबसे अच्छा और सीधा रास्ता दिखाता है।‘‘
लेकिन अत्यन्त खेद व दुःख के साथ यह हक़ीक़त सुपुर्दे क़लम की जा रही है कि हिजरी सन् के इक्कीवीं वर्ष के प्रारम्भ में कर्बला में जो दर्दनाक हादसा पेश आया बाद के अमीरों (शासकों) ने सियासी रंग देकर अपनी हुकूमत क़ायम रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसकी वजह से मुहर्रम की हुर्मत (मर्यादा) खत्म होती गई। और योम-ए-आशूरा (दसवीं मुहर्रम) जो इबादत का एक ख़ास दिन है, को शहादते हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु को नज़र कर दिया और इस तरह से मुसलिम कौ़म को एक इन्तिहाई रहमत व इबादत के दिन से महरूम (वंचित) करके ग़म व मातम और अनेक खुराफ़ातों के जाल में जकड़ दिया।
     हदीस शरीफ़ में है कि- दीन (इस्लाम) में अपनी तरफ से कोई नया काम निकाला जाय वह बिदअ़त है और बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है।^^ (बुखारी)
     उपर्युक्त हदीस की रू (संदर्भ) में अगर आज हम मुसलिम कौ़म को देखें तो मुसलमानों की एक बड़ी तादाद (संख्या) बिदअ़त में फंसी नजर आयेगी। इसका एक बड़ा कारण मुसलमानों में जाहिलियत के सिवाय और क्या हो सकता है।
     सुन्नी मुसलमानों की एक बड़ी तादाद मौलाना रजा खां बरेल्वी से अकी़दत रखती है लेकिन आश्‍चर्य है इसके बावजूद वह मुहर्रम की खुराफात में खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैaA हालांकि मौलाना रजा खां बरेल्वी ने भी ऐसी खुराफातों से मना किया है और इन्हें बिदअत और नाजायज व हराम लिखा है और ताजिये देखने से भी मना किया है। चुनांचे उनका फ़तवा है-’’ताजिया आता देखकर एराज व रूगर्दानी कर (मुंह फेर) लें उसकी ओर देखना ही न चाहिए।^^ (इरफाने शरियत भाग1 पृ015)
और पृष्ठ 16 पर एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि ‘‘मुहर्रम पर मर्सिया पढ़ना नाजायज है वह मनाही और मुनकरात (नास्तिकता) से पुर होते हैं।‘‘
     इनका एक रिसाला (पत्रिका) ‘‘ताजियेदारी‘‘ है। इसके पृ0 11 पर लिखते हैं-‘‘ताजिये पर चढ़ाया हुआ खाना न खाना चाहिए अगर नियाज़ देकर चढ़ायें या चढ़ाकर नियाज़ दें इस पर भी ऐतराज करें।‘‘
     फिर यह सब सिर्फ बिदअत ही नहीं बल्कि इससे भी बढ़कर यह षिर्क (अनेकेश्‍वरवाद) व बुत परस्ती क अन्तर्गत आ जाती है क्योंकि प्रथम तो हुसैन (रजिअल्लाहो अन्हु) की रूह आत्मा को मौजूद समझा जाता है। इसी प्रकार मज़ारों में पीरों-फक़ीरों के बारे में भी ऐसा ही समझा जाता है तभी तो उनको काबिले ताज़ीम समझते हैं और उनसे मदद मांगते हैं। हालांकि किसी बुजुर्ग की रूह (आत्मा) को हाज़िर व नाज़िर (विद्यमान) जानना और आलिमुल गै़ब (छुपी बातों को जानने वाला) समझना शिर्क और कुफ्र है। चुनांचे हनफ़ी मजहब की विश्‍वसनीय किताब -फताबा बजाजिया‘‘ में लिखा है, जो शख्स यह विश्‍वास रखे कि बुजुर्गों की रूहें हर जगह हाजिर व नाजिर है। और ज्ञान रखती हैं, वह काफिर (नास्तिक) है।
     द्वितीय, ताजिया परस्त ताजियों के सामने सिर झुकाते हैं जो सजदे के अन्तर्गत ही आता है और कई लोग तो खुल्लम-खुल्ला सजदा बजा लाते हैं और गैर अल्लाह (अल्लाह के अतिरिक्त) को सजदा करते हैं, चाहे वह इबादत के तौर पर हो या ताजीम (आदर) के लिए, खुला शिर्क है। चुनांचे अल्लाम क़हसतानी हनफी फरमाते हैं कि-''गैर अल्लाह को सजदा करने वाला बिल्कुल काफिर है, सजदा इबादतन हो या ताजीमन।''‘‘ (रद्दुल मुख़्तार)
    
मातम व ताजियेदारी की ईजाद:-

सन् 352 हिजरी के प्रारम्भ में इब्ने बूसिया ने हुक्म दिया कि 10 मुहर्रम को हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत के गम में तमाम दुकानें बन्द कर दी जायें। शहर व देहात के लोग मातमी लिबास पहनें और मातम करें।‘‘ ....
     शीओं ने इस हुक्म का पालन खुशी से किया मगर सुन्नी दम-बखुद और खामोश रहे, क्योंकि शीओं की हुकूमत थी। ...... इसके बाद शीओं ने हर साल इस रस्म को अमल में लाना शुरू कर दिया और आज तक इसका रिवाज हिन्दुस्तान में हम देख रहे हैं। अजीब बात यह है कि हिन्दुस्तान में अक्सर सुन्नी लोग भी ताजिया बनाते हैं।(तारीखे इस्लाम अकबर नजीबाबादी पृ0 66 जिल्द 2 प्रकाशित कराची)

     मुख्य बातें:-

     शहादत मनाने का हुक्म होता तो नबियों से बढ़कर हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत नहीं हो सकती। बनी इस्राईल में कई नबियों को शहीद किया गया। आखिरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चाचा हजरत हमजा रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत बड़ी दर्दनाक और यातना भरी है। शहादत मनाई जाती तो मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अपने चाचा की शहादत मनाते और हुक्म भी देते लेकिन ऐसा नहीं किया। हजरत उसमान रजिअल्लाहो अन्हु जो मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दामाद थे उनकी भी दर्दनाक शहादत कुरआन पढ़ते में हुई। एक और मुख्य बात हजरत अली रजिअल्लाहो अन्हु, जो हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु के पिता और मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दामाद थे, की भी दर्दनाक शहादत हुई। अब गौ़र तलब बात है कि इनके बेटे हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु ने शहादत क्यों नहीं मनाई तो फिर हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत क्यों मनाई जाती है?