शुक्रवार, 16 मार्च 2012

अ़दम रफ़उलयदेन (रफ़उलयदेन न करने) की एक हदीस दिखा दे उसको 50,000.00 पचास हजा़र नक़द इनाम


हाजी सैफुल्लाह तौहीदी
                        नहमदूहु वनु सल्लि अला रसूलिहिल करीम..........अम्मा बाद
 मैं अपने अहले हदीस होने के मुतअल्लिक़ ईमानदारी से तहरीर करूंगा क्योंकि बहैसियत मुसलमान झूट बोलना कबीरा गुनाह (महापाप) है।
 मेरा पूरा नाम डाक्टर व हाजी सैफुल्लाह तौहीदी वल्द चौधरी नूर मुहम्मद, जट बिरादरी से मेरा ताल्लुक़ है, मैं ज़िला गुजरांवाला में सन् 1957 को पैदा हुआ और मेरे खानदान में न तो कोई आलिमे दीन गुज़रा है न ही कोई अच्छी पोस्ट पर कोई मूलाज़िम है, हमारा पेषा शुरू से ज़मींदारी था।
 मैं जब पैदा हुआ तो दो साल की उम्र में था कि मेरी वालिदा मौहतरमा वफ़ात पा गईं, मेरे वालिद मौहतरम उस वक्त गांव में चौधरी टाइप के आदमी थे। वालिदा के फौ़त होते ही हमारे दिन बदल गये, निहायत ही ग़रीबी की चक्की में पिसने लगे तो इसलिए किसी खा़स उस्ताद से तालीम हासिल न कर सकता था। स्कूल की तालीम के साथ कुरआन मजीद अपने ही गांव के विभिन्न उस्तादों से पढ़ता रहा, स्कूल की तालीम से फ़ारिग़ होने के बाद आर्मी में मुलाज़िम हो गया।
 मैं मसलक अहले हदीस से इस तरह परिचित हुआ कि मेरी अहले हदीस लोगों दोस्ती और ताल्लुका़त काफी थे जो कभी-कभी मुनाजरे की ष्शकल में हम एक दूसरे से बहस बगैरह भी करते। सन् 1989 को मैं और एक साथी कोट सुब्हाना गये जो जिला गुजरांवाला का एक गांव है तो हमने नमाज़ जुहर अहले हदीस मस्जिद में अदा की तो मस्जिद में एक चैलेंज का पोस्टर लगा हुआ मैंने पढ़ा जिस पर मुबलिग़ 50,000/- लिखे हुये थे जो आदमी अ़दम रफ़उलयदेन (रफ़उलयदेन न करने) की एक हदीस दिखा दे उसको 50,000.00 पचास हजा़र नक़द इनाम दिया जायेगा, यह पोस्टर मुनाजर-ए-इस्लाम मुहक्क़िक आलिमे दीन मौलाना मुहम्मद अषरफ़ सलीम क़िला दीदार सिंह वाले की तरफ़ से था, इष्तहार पढ़ने के बाद मेरा दिल दहल गया और उस दिन से सोचों में डूब गया, क्योंकि यह मेरा ज़िन्दगी का पहला चांस था, बहरहाल मैं हाफ़िजाबाद शहर गया और मौलाना हबीबुर्रहमान यज़दानी शहीद मिल्लत की फिक्र आखिरत की तक़रीर जो गुजरांवाला शहर की ले आया और सुनता रहा, जब मैंने देखा कि अहले हदीस अल्लाह तआ़ला के मौहतरम नबी की इतनी इज्ज़त करते हैं तो फिर मैंने सोचा अब कोई  फैसला करना होगा लेकिन एक बात मुझे अहले हदीस होने से मना करती थी कि हजरत मौलाना गुलामुल्लाह खां रावलपिण्डी वाले और मौलाना सैयद इनायतुल्लाह शाह बुखा़री गुजरात वाले दोनों आ़लिमों से मैं बेपनाह मुहब्बत रखता था मेरे दिलमें यह वस्वसे पैदा होते कि अहले हदीस मसलक हक़ पर है तो इतने बड़े आ़लिमों ने क्यों न क़बूल किया।
  खैर बात लम्बी न हो जाय, जुलहन में हमारे प्यारे महरबान और मेरे दिल व जान से प्यारे साथी मुनाजरे इस्लाम बल्कि रईसुल मुनाजरीन फ़ातेह हनफ़ियत मौलाना अब्दुल रषीद अरषद जो कि अपनी मस्जिद अहले हदीस में ख़ुत्वा जुमा देते हैं उनके पीछे कुछ जुमे पढ़े तो मैं मुतज़लज़िल सा होने लगा तो फिर वही ख्याल आता कि मेरे दोनों कितने बड़े आलिमे दीन थे और हैं। इस फ़िक़रे की  वजा़हत ज़रूरी है। मौलाना गुलामुल्लाह खां तो सन् 1980 में वफा़त पा चुके थे। मगर मेरी उनसे तौहीद की निस्बत से वालिहाना मौहब्बत थी, जबकि मैंने उनको देखा भी नहीं था, तो शाह साहब जिन्दा थे, उनका मैं मुरीद भी था।
 मैंने अपना मसलक इसलिए वर्क (छोड़ा) किया कि हमसे जब अहले हदीसों की बहस होती तो हम अपने इमाम अबू हनीफ़ा की फ़िक्ह से दलाइल देते और अहले हदीस, हदीस से जवाब देते, बहस के बाद हम सोचते कि यह लोग हदीस के अलावा बात नहीं करते जो कि असल दीन है, और हम इमाम की बात करते हैं, यह चक्करबाजी़ क्या है।
 यूं तो मैं मसलक अहले हदीस के उलेमा की इज्ज़त करता था और अभी तो इंषा अल्लाह दिल व जान से हमारे अन्दर उलेमा परस्ती बहुत पाई जाती थी। देवबन्दियों में तो इस लिहाज़ से हर आलिम का ताबेदार था, लेकिन जिन शख्सियत से मैं मुतास्सिर हुआ उनमें अल्लामा अहसान इलाही ज़हीर और अल्लामा हबीबुर्रहमान यज़दानी और मुनाजिरे इस्लाम सुल्तानुल मुनाजिरीन हजरत मौलाना अब्दुल क़ादिर रोपड़ी साहब और हजरत मौलाना मुहम्मद अषरफ़ सलीम मरहूम और हजरत मौलाना प्यारे साथी मुनाजिरे इस्लाम क़ाजी़ अब्दुर्रषीद अरषद जिला गुजरांवाला वालों की शख्सियत से मैं बेहद मुतास्सिर हुआ, क्योंकि हम अहले हदीसों में कोई आलिम समझते ही नहीं थे, बस जो कुछ है देवबन्द में है, किताब मैंने अहले हदीसों की कोई नहीं पढ़ी अलबत्ता जब यह लोग हदीस की बात करते तो बुखारी व मुसलिम से बड़ी कौन सी है।
 तब्दीली मसलक के बाद मेरे गांव में दोस्तो यारों में से रिष्तेदारों में बहुत असर हुआ, मेरे तमाम रिष्तेदार मेरी वजह से अहले हदीस हो गये हैं और गांव में भी। हम वक़्त तक़रीबन दस के क़रीब अहले हदीस हो गये थे, मज़मून लम्बा न हो जाये, मेरी वजह से तक़रीबन अल्हम्दु लिल्लाह बस्ती के क़रीब क़रीब सब लोग अहले हदीस हो चुके हैं यह मेरे रब का फ़जल है, मेरी कोई  कारगर्दिगी नहीं।
 नये माहौल में आ कर जो तब्दीलियां मैंने महसूस की हैं वह मैं लिख नहीं सकता, बस यह समझ लें कि अहले हदीसों से देवबन्दियों में ज़मीन व आसमान का फ़र्क़ है, अहले हदीस के दो उसूल (अतीउल्लाह व अतीउर्ररसूल) हैं। जबकि देवबन्दी मुक़ल्लिद हैं, बात बात पर अपने अकाबिर की बातें करते हैं, जबकि अहले हदीस के सीने में मुहब्बते रसूल है वह दुनिया के किसी मज़हब, गिरोह, टोले में नहीं पाई जाती, हम जब भी देवबन्दियों के जलसे में जाते हैं तो खु़त्बे के बाद अकाबिरीन की बातें होतीं, और अल्लाह की क़सम उठा कर कहता हूं अहले हदीसों के स्टेज पर हमने जो मुहब्बते रसूल देखी है बयान से बाहर है।
 मेरे नज़दीक एक ही बात है कि साबिक़ा (पहले वाला) मसलक में फ़िक्ह हनफ़ी को खूब उछाला जाता है ताकि पूरी दुनिया पर फ़िक्ह हनफ़ी हो जाय जो कि सरासर बातिल पर मबनी (टिका) है, बुनियादी फ़र्क यह है कि देवबन्दी हजरात अपने उलेमा की बहुत तारीफ़ करते हैं जबकि अहले हदीस अपने उलेेमा की तारीफ़ और इज्ज़त व तौकी़र के साथ-साथ बात सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के नबी की मानते हैं, क्योंकि उनके नज़दीक हुज्जत (दलील) बात प्यारे नबी की है जो हमें अपनी जान से भी प्यारे हैं।
 मेरे नज़दीक मसलक अहले हदीस की तबलीग़ का बहतर तरीका़ यह है कि लोगों को सिर्फ़ कुरआन व सुन्नत से परिचित करवाया जाय, और सब्र व तहम्मुल से काम लिया जाय और दायी (दावत देने वाले) हजरात दावत देते वक्‍त सब्र का मुकम्मल मुजाहिरा करें, लोगों को फ़िक्ह हनफी के मसाइल से परिचित करवायें और ख़तीब हजरात दलाइल की रोशनी में बात किया करें और मस्जिदों को दावत के लिए बहतरीन तरीके़ से मका़म का दार्जा दें और दावत देते हुए कुरआन व हदीस के अलावा कोई बात न करें, मगर हस्बे ज़रूरत तो इनशा-अल्लाह यह दावत का कामयाब रहेगी।
पैदाइशी और नसली हामिलीन मसलक अहले हदीस के नाम पैगा़म और आखिरी बात मेरे ख्याल में और तजरबे से यह बात साबित है कि पैदाइशी अहले हदीस हैं वह सिर्फ नाम के अहले हदीस हैं तमाम रस्म व रिवाज में हिस्सा लेते हैं, दाढ़ी को खूब चट करवाते हैं और नमाज़ तक नहीं पढ़ते, हम जब छोटे-छोटे होते थे तो हम सुनते थे कि अहले हदीस नमाज़ नहीं छोड़ते, बड़े पक्के नमाजी़ होते हैं, मगर अब अफ़सोस से यह बात कहनी पड़ती है कि वह अहले हदीस ही नहीं जो नमाज़ न पढ़े।
 अपने बच्चों को मका़मी मदरसों में दाखि़ल करवायें ताकि घर में दीनी माहौल बन जाय। और आप जो नसली तौर पर अहले हदीस हैं आपमें लोगों से नुमायां फ़र्क़ होना चाहिये। क्योंकि आप अहले हदीस हैं।
जो उलेमा-ए-किराम तावीज़ धागा करते हैं उनके नाम पैगा़म है कि आप अल्लाह से डरें, जबकि कुरआन में ‘निस’ मौजूद नहीं तो आप क्यों यह काम करते हैं। मेरे सामने चार साथियों ने एक आलिमे दीन को तावीज़ के हवाले से लाजवाब कर दिया और मौलवी साहब एक औरत को छुरी से दम कर रहे थे तो मैं और मेरे साथी ने पूछा तो कहने लगे दलील तो कोई नहीं मगर अगर। तो बात यह है यह बातें हमें नहीं करनी चाहियें जो दूसरे मसलक में खिलाफे़ शरीयत पाई जाती हों। अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो अल्लाह माफ़ करे। अल्लाह हाफिज़।
उलेमा-ए-देवबन्दी से बहस व मुबाहिसा
 मैं डाक्टर सैफुल्लाह तौहीदी जो 1995 को अहले हदीस हुआ, उसकी वजह आप ऊपर वाले सफ़हात (पृष्ठों) में पढ़ चुके हैं अभी मैं आपको वह बातें बताऊंगा जो मेरी उलेमा ए देवबन्द से बहस और सवालों की शकल में हुई।
 तकरीबन 1990 का वाक्या है हम चूंकि देवबन्दी थे तो ज़ाहिर है कि हम नमाजें भी उधर ही पढ़नी थी, मैं जामा मस्जिद तौहीदिया देवबन्दी का खजांची भी था और जब मसलक अहले हदीस अख्तियार कर लिया तो फिर खजांची के तौर पर काम करता रहा, हम सब साथियों ने मिल कर प्रोग्राम बनाया कि हजरत मौलाना शहाबुद्दीन खालिद साहब का प्रोग्राम करवाया जाये जो कि देवबन्दियों की शाख ममाती के आलिमे दीन हैं और अभी हयात हैं। तो हमने प्रोग्राम की तारीख़ तय की और खाने का इन्तिजा़म भाई मुहम्मद यूनुस अन्सारी के घर में हुआ जो कि अहले हदीस हैं मैंने अपने ससुराल से कुछ आदमियों की दावत दी और वनी जो कि एक गांव है वहां से भी लोग आए। यह दोनों गांव वाले अहले हदीस थे तो मस्जिद में काफ़ी रौनक़ हो गई, जलसा कामयाब हो गया मगर हमारे लिए नुक़सानदह साबित हुआ, लेकिन बाद में फ़ायदेमंद साबित हो गया।
 जब हजरत साहब ने बयान शुरू किया तो कुछ मसाइल करने के बाद उन्होंने अहले हदीसों को कोसना शुरू कर दिया, तक़रीबन आधे घंटे उन्होंने मसलक अहले हदीस पर काफ़ी कीचड़ उछाला, जलसा खतम होते ही अहले हदीस साथी जो कि साथ वाले गावं से तषरीफ़ लाए थे, उन्होंने बहुत नाराज़गी का इज़हार किया और कुछ साथी इसरार करने लगे कि मौलाना से मसअला पूछना चाहते हैं तो मैंने अर्ज की आओ पूछ लेते हैं। यह कौन सी बात है। तो ज़्यादा नाराज़ होकर चले गये तो कुछ साथी रह गये मौलाना हुजरे के बरआमदे में चले गये उनके साथ का़री मुहम्मद अब्बासा देवबन्दी भी थे, याद रहे मस्जिद हाजा़ के ख़तीब जो बड़े भाई मौलाना लियाक़त अली साहब थे, जिन्होंने मौलाना मुहम्मद अषरफ़ सलीम साहब की तबलीग़ से मुतास्सिर होकर जिला गुजरात में खुतवा जुमा पर अहले हदीस होने का ऐलान किया था, मगर देवबन्दियों ने मेरे भाई को मजबूर करके दोबारा हनफ़ी बना लिया, अभी आपके दिल में एक सवाल पैदा होगा कि आपने लिखा है कि मेरे ख़ानदान में कोई आलिम नहीं है तो बात यह है कि मेरे भाई जान जो कि मेरे बड़े भाई भी हैं वह भी मेरी तरह ही थे, बाका़यदा मदरसे से फ़ारिग़ नहीं थे।
 तो हम साथी मसअला पूछने के लिए अल्लाम साहब की खिदमत में हाजिर हो गये, और जो सवाल व जवाब उनसे हुए उनकी मैं किसी किस्म की कोई गलत बयानी नहीं वह भी ज़िन्दा हैं, हम इनषा-अल्लाह अब भी बात करने को तैयार हैं।
 डाक्टर सैफः- मौहतरम अल्लामा साहब मैं एक अनपढ़ और जाहिल आदमी हूं, कुछ सवाल करना चाहता हूं आपसे आप महसूस तो न करेंगे। अगर कोई गलती हो गयई तो पेषगी माज़िरत चाहता हूं।
 मौलाना साहबः- हां आप सवाल करें, हम उलेमा किस लिए होते हैं।
 डा0 सैफ़:- मेरा सवाल यह है कि अल्लाह के नबी हदीस पाक है कि यहूदी व नसारा के 72 फ़िर्के़ बने हैं, मेरी उम्मत के 73 फ़िर्के़ होंगे और जन्नत में सिर्फ एक फ़िर्का़ जायेगा, क्या यह हदीस ठीक है?
  मौलाना साहबः- हां यह हदीस पाक ठीक है।
 डा0 सैफ़ः- तो फिर आप फ़रमायें जन्नत में मुक़ल्लिद जायेंगे या गै़र मुक़ल्लिद?
 मौलानाः- मुक़ल्लिद।
 डा0 सैफ़ः-  मुक़ल्लिदों में हनफ़ी, मालिकी, शाफ़िई, हंबली कौन से मुक़ल्लिद जन्नत में जायेंगे।
 मौलानाः- हनफ़ी मुक़ल्लिद।
 डा0 सैफ़ः- हनफ़ी मुक़ल्लिदों में से बरेल्बी या देवबन्दी?
 मौलानाः- हनफ़ी मुक़ल्लिद देवबन्दी।
 डा0 सैफ़ः- देवबन्दियों से हयाती या ममाती?
 मौलानाः- देखो मैं कोई प्रोफ़ेसर हूं कि आप कह रहे थे कि मैं अनपढ़ जाहिल हूं, आप तो ठीक ठाक किसी के चांडे हुए नज़र आते हैं, यह कोई बात है।
 डा0 सैफ़ः- मौहतरम मैंने कौन सी बात पूछी है आप गरम होने लगे हैं, आप पर यह लाज़िम आता है कि आप हदीस नबवी
से दिखायें कि जन्नत में हनफ़ी मुक़ल्लिद देवबन्दी जायेगा और साथ-साथ यह भी बताना होगा कि सहाबा मुक़ल्लिद थे या गै़र मुक़ल्लिद?
 मौलानाः- सहाबा मुक़ल्लिद थे।
 डा0सैफ़ः- किसके मुक़ल्लिद?
 मौलानाः- एक-दूसरे के।
 डा0 सैफ़ः- तो फिर फ़िक्ह सिद्दीकी़, फ़िक्ह फ़ारूकी, फ़िक्ह हैदरी क्यों न चल सकीं वह फ़िक्ह हनफ़ी से कमजो़र थीं क्या?
 मौलाना
ः- आप नमाज़ में सूरह फ़ातिहा इमाम के पीछे क्यों पढ़ते हैं?
 डा0 सैफ़ः- आप पहले मेरे सवालों का जवाब दें, फिर सूरह फ़ातिहा पर बहस होगी।
 क़ारी अब्बासः- डाक्टर साहब आप हजरत साहब को क्यों तंग कर रहे हैं, बहस खतम करें और घर जायें।
 डा0 सैफ़ः- क़ारी साहब आप हमारे महमान गिरामी क़दर हैं, गरम न हों मसअला पूछने में मौलाना पसीना साफ़ कर रहे हैं।
 मौलानाः- लाओ कुरआन यह सूरह फ़ातिहा पढ़ते हैं।
 डा0 सैफ़ः- देखो कुरआन मजीद अल्हम्दु लिल्लाह लाओ, हम कुरआन को इनशा-अल्लाह सुनने आये हैं, मगर मेरी बातों का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं। 
 इतने में एक आदमी कुरआन मजीद लेकर आ गया।
 मौलानाः-देखो यह कुरआन की आयत है-‘‘व इजा कुरीअल कुरआ-न फस तमिऊ लहु वनसितू ल अल्लकुम तुर हमून‘‘ (सूरह ऐराफ़-203) जो कि इमाम के पीछे पढ़ने से रोक रही है, अहले हदीस इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा पढ़ते हैं उनके पास कोई जवाब नहीं, फ़ातिहा कुरआ़न नहीं।
 डा0 सैफ़ः- मौहतरम जनाब मौलाना साहब मेरे सवालों का जवाब आपने बयान फ़रमाया, और चल दिये अगले मसअले की तरफ़ तो चलो पहले
यह मसअला हल कर लेते हैं, आपने जो कुरआन की आयते मुबारका तिलावत फ़रमाई है उसके आगे वाली आयत पढ़ कर सुनायें। मौलाना साहब, आगे वाली आयत क्या कहती है उसका मतलब और है।
 मौलाना- सैफुल्लाह साहब मौहतरम आप आयत तिलावत तो करें मैं उसका मतलब बयान करूंगा।
 डा0 सैफ़ः- मौलाना साहब आप वह आयत नहीं पढ़ते तो मैं पढ़ देता हूं ‘‘वज कुर रब्बि-क फी नफ सिक ...
 मौलानाः- क्या यह आयत कहती है कि इमाम के पीछे पढ़ो?
 डा0 सैफ़ः- हॉं यह आयत कह रही है, गा़फ़िलों में न हो जाओ अपने दिल में आजिज़ी से याद करो। यह आयत कह रही है पढ़ो, पिछली कहती है चुप रहो। जनाव मौलाना साहब आपका किस पर अ़मल होगा। न पिछली सूरत सूरह फ़ातिहा से रोकती है न अगली पढ़ने का हुकुम देती है। इसका शान-ए-नुजू़ल इस आयत का जवाब है जो सूरह हा मीम सजदा की आयत नम्बर 26 है
तो मौहतरम काफ़िरों लिए जवाब है, जब दोनों सूरतें मक्की हैं उनका ताल्लुक़ फ़ातिहा से नहीं है।
 मौलानाः- तौबा तौबा, अल्लाह काफ़िरों को कह रहे हैं, कुरआन सुनो और ख़ामोश रहो। डाक्टर साहब तौबा करें, आपने बहुत ग़लती की है।
 डा0 सैफ़ः- मौहतरम मैंने ग़लती नहीं की, मैंने तो आयत का शाने नुजूल बताया है, जब फा़तिहा मदीना में फर्ज़ हुई ये दोनों सूरतें मक्की हैं।
 अल्लाह के रसूल की हदीसे पाक है-
‘‘ ला सला-त बिफातिहतिल किताब‘‘ (बुखारी) उसकी नमाज़ नहीं होती जो सूरह फ़ातिहा न पढ़े।
 मौलानाः- इस हदीस पाक में मुक्तदी का लफ़्ज़ नहीं। और डाक्टर कहता था कि अनपढ़ हूं, देखो यह अनपढ़ है यह किसी उस्ताद का सिखाया पढ़ाया हुआ है।
 डा0 सैफ़ः- मौलाना साहब अगर हदीस पाक में मुक्तदी का
लफ़्ज़ नहीं तो इमाम का लफ़्ज़ भी तो नहीं ‘’ आम खि़ताब है वह कौनसा लफ़्ज है जो हदीस को खा़स करता है आप बतायें ‘‘ला नबी बअ़दी’’ मेरे बाद नबी कोई नहीं होगा। ‘ला’ नफ़ी का सीगा़ है। अल्लाह के नबी की हदीस पाक बुख़ारी शरीफ़ की है। चाहिये तो था कि मेरे सवालों का जवाब देते मगर आप मुनाज़िरे पर उतर आये हैं।
 मौलानाः- भाई मुनाज़िरे की बातें तो आपने की हैं, हम तो तक़रीर के लिए आये थे।
 डा0 सैफ़ः- आप अगर तक़रीर के लिए आये थे तो तक़रीर की हद तक रहते, आपने बे-उसूल बात की है। यहां पर मौलाना लियाक़त अ़ली बोल पड़े कि आप लोग सहाबा को हुज्जत (दलील) नहीं मानते।
 डा0 सैफ़ः- आप देवबन्दी मानते हैं तो फिर हजरत उमर रजिअल्लाहो अन्हु ने ग्यारह रकात रमजा़न में पढ़ाई हैं, आप लोग क्यों बीस रकात और तीन वित्र पढ़ते हैं, जबकि आपके उलेमा ने भी इक़रार किया है ग्यारह रकात का। इस जगह पर एक आदमी ने बाहर से आवाज़ लगा दी कि डाक्टर साहब मरीज़ तंग है, बराए महरबानी जल्दी करें। तो बात ख़तम हो गई। तक़रीबन डेढ़ बजे रात को हम चले गये।
 क़ारिईन किराम! आप खुद सोचें इस मजमून से मौलाना शहाबुद्दीन के इल्म को दाद दें उनके पास क्या है। अल्लाह समझ की तौफ़ीक अता फ़रमाये।

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

मौलाना अशरफ़ अली थान्‍वी साहब की किताब बहिश्‍ती जेवर के चटपटे कियासी मसाइल जो फिक्‍ह हनफिया का नमूना हैं-

1.    छोटी लड़की से अगर किसी मर्द ने सोहबत की जो अभी जवान नहीं हुई है तो उस पर गुस्‍ल वाजिब नहीं है, लेकिन आदत डालने के लिए गुस्‍ल कराना चाहिये. (हिस्‍सा अव्‍वल मसला नं0 5)

2.    मुर्दार की खाल को जब धूप में सुखा डालें या कुछ दवा बगैरह लगा कर दुरूस्‍त कर लें कि पानी मर जाय और रखने से खराब न हो तो पाक हो जाती है.

3.    इस पर नमाज पढ़ना दुरूस्‍त है.


4.    और मशक बगैरह बनाकर इसमें पानी रखना भी दुरूस्‍त है लेकिन सुअर की खाल पाक नहीं होती.


5.    और सब खालें पाक हो जाती हैं मगर आदमी की खाल से कोई काम लेना और बरतना गुनाह है. (!?!?!)  (हिस्‍सा अव्‍वल मसला नं0)


6.    कुत्‍ता, बिल्‍ली, बन्‍दर, शेर बगैरह जिनकी खाल बनाने से पाक होती है बिसमिल्‍लाह कह कर जिब्‍ह करने से भी खाल पाक हो जाती है चाहे बनाई हो या बे-बनाई हो, अल्‍बत्‍ता जिब्‍ह करने से इनका गोश्‍त पाक नहीं होता और इनका खाना दुरूस्‍त नहीं. (हिस्‍सा अव्‍वल मसला नं023)


7.    मुर्दार के बाल और सींग और हडडी और दांत यह सब चीजें पाक है.


8.    अगर पानी में पड़ जाय तो नजिस न होगा, अल्‍बत्‍ता अगर हडडी और दांत बगैरह पर उस मुर्दार जानवर की कुछ चिकनाई बगैरह लगी हो तो वह नजिस है और पानी भी नजिस हो जायेगा. (हिस्‍सा अव्‍वल मसला नं0 24)


9.    अगर पेशाब की छींटें सुई की नोक के बराबर पड़ जावें कि देखने से दिखाई न दें तो इसका कुछ हर्ज नहीं धोना वाजिब नहीं (हिस्‍सा दोयम मसला नं0 11)


10.           हाथ में कोई नजिस चीज़ लगी थी इसको किसी ने ज़बान से तीन दफ़ा चाट लिया तो भी पाक हो जायेगा मगर चाटना मना. ( हिस्‍सा दोयम मसला नं0 26)


11.            किसी मर्द ने किसी औरत से जि़ना किया तो अब उसकी औरत की मां और उस औरत की औलाद को उस मर्द से निकाह करना दुरूस्‍त नहीं. (हिस्‍सा चहारम मसला नं0 17)


12.           किसी औरत ने जवानी की ख्‍वाहिश के साथ किसी मर्द को बद नियती से हाथ लगाया तो अब उस औरत की मां और औलाद को उस मर्द से निकाह करना जाइज़ नहीं, इसी तरह अगर किसी मर्द ने किसी औरत पर हाथ डाला तो वह मर्द उसकी मां और औलाद पर हराम हो गया. (हिस्‍सा चहारम मसला नं0 18)

13.           अगर किसी औरत के बच्‍चा पैदा हुआ और खून बिल्‍कुल न निकले तो उस पर गुस्‍ल फ़र्ज न होगा. (कुछ समझे नाम निहाद ‘हकीमुल उम्‍मत’ थान्‍वी की इस ‘हिकमत’ को हिस्‍सा 11 मसला नं0 4)

14.           अगर कोई लड़का इशा की नमाज़ पढ़ कर सोए और बाद तुलू फज्र के बेदार होकर मनी का असर देखे जिससे यह मालूम हो कि उसको अहतलाम हो गया है तो उसका चाहिए कि इशा की नमाज़ का इआदा करले यानी दोहरा ले. (आखिर क्‍यों भई? हिस्‍सा 11 मसला नं0 2)


15.           मैयत के कफ़न पर बगैर रोशनाई के वैसे ही अंगुली की हरकत से कोई दुआ मिस्‍ल अहद नामा बगैरह लिखना या उसके सीने पर बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्हरहीम और पेशानी पर कलिमा ला इलाह इल्‍लल्‍लाह मुहम्‍मदुर्रसूलुल्‍लाह लिखना  जाइज़ है मगर किसी हदीस से इसका सबूत नहीं. (हिस्‍सा 11 मसला नं0 14)

पाठको! यह है मौलाना अशरफ़ अली थान्‍वी साहब की किताब तथाकथित बहिश्‍ती जेवर (असल में इसका नाम ‘दोज़खी जेवर होना चाहिए था) के कुछ मसाइल जो फिक्‍ह हनफी के बतौर नमूना आपके सामने पेश हैं, इससे भी ज्‍यादा हयासोज़ मसाइल इस किताब में भरे पड़े हैं कि यहां पर इतने पर ही इक्तिफ़ा करना बहतर समझा गया. क्‍या यह किसी भले और शरीफ आदमी को अपील करते हैं? हरगिज़ नहीं. और यह वह मसाइल हैं जो मौजूदा तकलीदे शख्‍सी की वजह से मुकल्लिदों में पैदा हो गये हैं और जिन पर अमल करना आज तक़लीद कहा जाता है और जिनके न मानने की वजह से हमें गैर मुकल्ल्दि कहा जाता है, जिन मसाइल को तहक़ीक़ और कुरआन व हदीस से कोई दूर का भी सरोकार नहीं बल्कि उमूमन यह मसाइल कुरआन व हदीस और इंसानी फि़तरत के भी खिलाफ़ हैं. और उस पर यह कमाल व ताज्‍जुब की बात यह कि यह किताब औरतों के लिए हुक्‍मे हक़ की रहबर है और मर्दों के लिए शोर व शर से मुहाफि़ज़ है. क्‍या अजब जिस तक़लीद ने ऐसे मसाइल मनवाए हैं जब इन मसाइल की बुराई ज़हन नशीं हो जाय तो इस तक़लीद को खैर बाद कह दी जाय.

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अल्लाह पर विश्‍वास के साथ घालमेल


शिर्क - सबसे महान जुर्म व गुनाह है, हजरत अबू बक्र रजिअल्लाहो अन्हु से मर्वी है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने तीन मर्तबा फ़रमायाः क्या मैं तुम्हें सबसे बड़ा गुनाह न बताऊं. लोगों ने कहा- जरूर ए अल्लाह के रसूल, आपने फ़रमाया अल्लाह के साथ शिर्क करना। (हदीस बुखारी व मुसलिम)
अल्लाह रब्बुल आलमीन हर गुनाह को माफ़ कर सकता है लेकिन शिर्क की मगफ़िरत के लिए तौबा जरूरी है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया -
‘‘अल्लाह तआला शिर्क बिल्कुल न बख्शेगा इसके अलावा दीगर गुनाह जिसके चाहे माफ़ कर देता है।’’( कुरआन-सूरह निसाः116)
 शिर्क का अनुगामी इस्लाम से खारिज और अगर इसी पर मौत आ जाये तो हमेशा के लिए जहन्न्मी हो जाता है, शिर्क के चन्द नमूने जो मुसलिम मुल्कों में कसरत से पाये जाते हैं निम्नांकित पंक्तियों में वर्णित हैंः-
1- क़ब्र परस्ती और पीरों फ़की़रों को को पुकारना इसके अक़ीदे के साथ कि वह हाजतें (जरूरतें) पूरी करते हैं, जबकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ‘‘ और तेरे रब ने फ़ैसला किया है कि तुम उसके सिवा किसी की इबादत हरगिज़ न करो। (कुरआन-सूरह इसराः23)  इसी तरह अंबिया व सालिहीन को शफा़अत और परेशानी से निजात के लिए पुकारना यह सब शिर्क में दाखिल है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया‘‘ कौन बे-कस की पुकार सुनता है और परेशानी दूर करता है और तुम्हें ज़मीन का खलीफ़ा बनाता है, क्या अल्लाह के सिवा कोई और माबूद (पूज्य) है? (कुरआन-सूरह नमलः62)
 कुछ मुसलमानों का हाल यह है कि उठते-बैठते, सोते-जागते और मुसीबत व परेशानी में हमेशा किसी वली या बुजु़र्ग का नाम लेते हैं, कोई या अली मुश्किल कुशा, तो कोई या हुसैन, कोई या ख्वाजा बगैरह को पुकारता है, जबकि जबकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया तुम अल्लाह को छोड़ कर जिन्हें पुकारते हो वह भी तुम्हारे जैसे बन्दे हैं। ( कुरआन-सूरह ऐराफ़ः196)
 और कुछ लोग क़ब्रों का तवाफ़ (परिक्रमा) करते हैं, इसकी चोखट चूमते हैं, छूकर जिस्म पर मलते हैं, उसको सजदा करते हैं और उसके सामने सिर झुकाकर बड़े ही अदब और अहतराम के साथ खड़े होकर फ़रियाद करते हैं, मरीज़ की शिफ़ायाबी और औलाद तलब करते हैं, यह सब शिर्क हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है ‘‘ और उससे बढ़कर कौन गुमराह होगा? जो अल्लाह के सिवा ऐसे लोगों को पुकारता हे जो क़यामत तक उसकी दुका कुबूल नहीं कर सकते,बल्कि वह उनकी दुआ से बेखबर हैं।’’ ( कुरआन-सूरह अहकाफः5)
  और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लमस का इर्शाद है ‘‘ जिसकी मौत शिर्क की हालत में हुई वह जहन्नम में दाखिल होगा। (हदीस बुखारी) 
कुछ लोग क़ब्रों पर जाकर अपना सिर मुंडाते हैं और यह विश्वास रखते हैं कि यह क़ब्र वाले पीर-फ़की़र क़ायनात (सृष्टि) में तब्दीली करते हैं और फ़ायदा व नुक़सान के मालिक है, अल्लाह तआला फ़रमाता है कि- ''और तुमको अल्लाह कोई तकलीफ़ पहुंचाए तो उसके सिवा कोई दूर करने वाला नहीं है और अगर वह तुम्हें कोई खै़र (भलाई) पहुंचाना चाहे तो उसके फ़जल को कोई रोकने वाला नहीं है।( कुरआन-सूरह यूनुसः107)


 वह चीजें जिनमें फ़ायदे का विश्वास रखा जाये शिर्क-ए-असगर है, लेकिन अगर यह विश्वास हो कि वह फ़ायदा व नुक़सान की मालिक हैं तो शिर्क-ए-अकबर( बड़ा शिर्क) हो जाता है। जैसे बहुत सारे लोग तावीज़ गन्डों, कड़ों और छल्लों को अपनी गर्दनों हाथों या गाड़ियों पर लटकाते हैं या बच्चों को पहनाते हैं, जबकि कुछ मुखतलिफ़ नगीनों की अंगूठियां पहनते हैं, जिनसे नज़रे बद या आफ़त व मुसीबत टालने का मक़सद होता है, कुछ माऐं अपने बच्चों को नज़रे बद से हिफ़ाजत की खातिर उनकी पेशानियों की एक ओर काजल लगाती हैं यह सारे काम नाजायज और हराम हैं, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ‘‘ जिसने तावीज़ लटकाया उसने शिर्क किया। (हदीस मुसनद अहमद)

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

अहले हदीस और मुसलिम


अहले हदीस दो शब्‍दों के मिश्रण से बना शब्‍द है, अहल और हदीस׀  हदीस का शाब्दिक अर्थ है बात, लेकिन जम्‍हूर मुहद्दिसीन की इस्तिलाह में नबी करीम सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम के कौल व फ़ैल (कथन व कर्म) और उस अम्र (आदेश) को जो आप सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम के सामने हुआ और आपने उसे मना न किया बल्कि उस पर खामोशी अख्तियार कर उसे जाइज़ रखा हदीस कहा जाता है׀
कुरआन मजीद में भी नबी करीम सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम की पाक बातों को हदीस कहा गया है׀ चनांचे अल्‍लाह तआला का इर्शाद है- और जब नबी करीम सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम ने अपनी बाज़ बीवियों से एक पोशीदा बात कही(तर्जुमा सूरह अल तहरीम 3)
हज़रत ज़ैद बिन साबित अन्‍सारी रजिअल्‍लाहु अन्‍हु से रवायत है कि रूसल सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम ने इर्शाद फ़रमाया- अल्‍लाह तआला उस शख्‍स को (हमेशा) तरोताज़ा रखे जिसने मेरी हदीस को सुनकर याद रखा (और) यहां तक कि उसे आगे (दूसरों) तक पहुंचाया׀ (हदीस अबू दाउद, तिर्मिजी, इब्‍न माज़ा)

कुरआन मजीद भी हदीस है
हज़रत जाबिर रजिअल्‍लाहु अन्‍हु से रवायत है कि रसूलुल्‍लाह सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम जुमा के खुत्‍बा में जबकि हज़ारों का मजमा होता था पुरज़ोर और बुलन्‍द आवाज़ में इर्शाद फ़रमाया करते थे- ‘’फ-इन्‍-न ख़ैरल हदीसि किताबुल्‍लाहि’’ (हदीस मुसलिम व मिश्‍कात) यानी बिला शुब्‍ह बहतरीन हदीस अल्‍लाह तआला की किताब (कुरआन मजीद) है׀
खुद कुरआन मजीद में अल्‍लाह तआला का इर्शाद है- अल्‍लाहु नज़-ज़ला अहसनल हदीसि (सूरह जु-म-र 23) यानी अल्‍लाह तआला ने बहतरीन हदीस नाजिल फरमाई है׀
और अल्‍लाह तआला ने फरमाया- ‘’वमन अस्‍द-कु मिनल्‍लाहि हदीसा’’ (सूरह निसा 87) यानी और अल्‍लाह ताआला की बात से बढ़ कर सच्‍ची बात किसकी हो सकती है׀
नेज़ फ़रमाया- ‘’फ़-ल-अल्‍ल–क़ बाखिउन नफ़-स-क अला आसारिहिम इंलम यूमिनू बिहाज़ल हदीसि अ-स-फ़’’ (सूरह कहफ़ 6) यानी ऐ मुहम्‍मद सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम, शायद आप इन लोगों के पीछे ग़म के मारे अपनी जान खो देने वाले हैं׀ अगर यह इस हदीस पर ईमान न लाये׀

निष्‍कर्ष -
उपर्युक्‍त आयाते करीमा और हदीसे नबवी सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम से यह बात रोज़े रोशन की तरह स्‍पष्‍ट हो जाती है कि कुरआन मजीद अल्‍लाह तआला की हदीस है और रसूलुल्‍लाह सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम का क़ौल व फ़ैल और तक़रीर आप सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम की हदीस है׀ इस प्रकार शब्‍द अहल का अर्थ बहुत खुला और स्‍पष्‍ट है यानी वाला׀
इस प्रकार साबित हुआ कि अहले हदीस का अर्थ है अल्‍लाह तआला की हदीस (कुरआन मजीद)और रसूलुल्‍लाह सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम की हदीस (क़ौल व फ़ैल और तक़रीर) को मानने वाला इन दोनों हदीसों पर कामिल  (पूर्णतः) तौर पर बगैर किसी उम्‍मती की इजाज़त और तक़लीद के एतिक़ाद (विश्‍वास) रखने वाला और अमल करने वाला׀
लक़ब  अहले हदीस का कुरआन मजीद से सबूत-
इसमें कोई शक नहीं कि अल्‍लाह तआला ने हमारा नाम कुरआन मजीद में मुसलिम रखा है जैसा कि अल्‍लाह ताआला का इर्शाद है- ‘’हु-व सम्‍माकुमुल मुसलिमी-न मिन क़ब्‍ल’’ (सूरह हज्‍ज 78) यानी अल्‍लाह तआला ने पहले ही से तुम्‍हारा नाम मुसलिम रखा है׀
जिस तरह हमें कुरआन मजीद ने मुसलिम कहा है उसी तरह अहले किताब को भी मुसलिम के खिताब से नवाज़ा गया है׀ चुनांचे अल्‍लाह तआला का इर्शाद है- ‘’और जब हमने (हजरत ईसा अलैहिस्‍सलाम के) हवारियों की तरफ़ वहीय भेजी कि मुझ पर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ, तब उन्‍होंने कहा हम ईमान लाए (ऐ ईसा अलैहिस्‍सलाम) तू गवाह रह साथ इसके कि हम मुसलमान हैं׀ (तरजुमा सूरह माइदा 111)
लेकिन इन मुसलमानों को फिर कुरआन मजीद इन शब्‍दों में हिदायत फ़रमाता है- ‘’वल यहकुम अहलुल इन्‍जीलि बिमा अन्‍ज़लल्‍लाहु फ़ीहि’’ (सूरह माइदा 47) यानी अहले इन्‍जील को अल्‍लाह तआला की नाजि़ल की हुई वहीय के मुताबिक़ ही फ़ैसला करना चाहिये׀

इससे यह बात रोज़े रोशन की तरह एकदम स्‍पष्‍ट हो गई है कि मुसलमान अपनी किताब की तरफ़ मन्‍सूब हो सकते हैं, जैसे ईसाइयों को मुसलमान होने के बावजूद अल्‍लाह तआला ने इन्‍हें अहले इन्‍जील के लक़ब से नवाजा है और इसी लक़ब से इन्‍हें खिताब किया गया है׀ इनकी किताब का नाम इन्‍जील था׀ हमारी किताब का नाम खुद किताब में ही हदीस रखा गया है और रसूलुल्‍लाह सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम का क़ौल व फ़ैल और तक़रीर भी हदीस है, जैसा कि पहले गुज़र चुका है׀
शब्‍द अहले हदीस कुरआन मजीद और तरीक़ा-ए-नबवी सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम दोनों को शामिल है׀ गोया कि अहले हदीस कहलाना मुसलिम होने के खि़लाफ़ नहीं है׀ हम मुसलिम भी है और अहले हदीस भी׀ जैसे ईसाई मुसलिम भी है और अहले इन्‍जील भी׀
...और मुसलिम का अर्थ है फ़रमांबरदार और अहले हदीस का अर्थ भी यही है यानी कुरआन मजीद और तरीक़ा-ए-नबवी सल्‍लल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम की ताबेदारी करने वाला׀
इस प्रकार अहले हदीस कहलवाने में किसी किस्‍म की क़बाहत नहीं है बल्कि सबूत कुरआन मजीद से बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट हो गया है׀

माखूज-‘’हम अहले हदीस क्‍यों हैं’’ मुअल्लिफ- मौलाना अब्‍दुल गफूर असरी, ‘अल किताब इन्‍टर नेशनल, जामिआ नगर, नई दिल्‍ली.

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

तलाशे हक- साबिक देवबन्‍दी आलिम की आपबीती (‘’मैं कैसे और क्‍यों अहले हदीस हुआ’’ मौलाना अब्‍दुर्रहमान, फा़जि़ल दारूल उलूम, देवबन्‍द )


तलाशे हक-  साबिक देवबन्‍दी आलिम की आपबीती (‘’मैं कैसे और क्‍यों अहले हदीस हुआ’’ मौलाना अब्‍दुर्रहमान, फा़जि़ल दारूल उलूम, देवबन्‍द )

मेरी जिन्‍दगी का पहला दौर
मैं एक किसान घरने में पैदा हुआ, जबसे होश संभाला वालिदेन और माहौल से यह तीन अकी़दे सीखे- नं0 1 हमारा खा़लिक़ अल्‍लाह तआला है और उसका कोई शरीक नहीं, नं0 2 हमारे पैग़म्‍बर हजरत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  है और हम आपके (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  के उम्‍मती हैं , नं0 3 मरने के बाद दौबारा अल्‍लाह तआला जि़न्‍दा करके हमारे अमलों का हिसाब किताब लेगा और फिर बहिश्‍त या दोज़ख़ में भेज देगा. इसी तरह मैंने उनसे यह अकी़दा भी हासिल किया कि हम हनफ़ी है और मज़हब हनफ़ी है यानी हम इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्‍लाह अलैहि  के मुक़ल्लिद हैं. कम उम्री के वक्‍त ज़हन में न किसी तन्‍की़द की क़ाबिलियत होती है और न ही कोई इन्‍सान मौरोसी अका़इद पर तन्‍की़द करना पसन्‍द करता है सो मैं भी इन्‍ही अका़इद को मौरोसी तौर पर अख्तियार करने के लिए तैयार  रहा  और उनसे दिली वाबस्‍तगी पैदा कर ली
और यही वह अकी़दा है जिनकी बिना पर एक आदमी अपने आपको मुसलमान समझता है. कलमा तैयबा तो तो हम लोग सिर्फ पढ़ते हैं अल्‍फा़ज़ का मतलब कुछ नहीं समझते. मैंने भी तबर्रकन ही यह कलिमा पढ़ना अपने माहौल से सीख लिया और माने व मतलब से कोई ग़रज़ न रखी. इसके बाद मैं इस्‍लामी तालीम हासिल करने के लिए घर से रूख़सत हो गया और मुख‍तलिफ़ असात्‍जा किराम से बेशुमार उलूम व फुनून पढ़ता रहा. सर्फ-नहव, मन्तिक़, फ़लसफ़ा, फलकियात, फि़क्‍ह, उसूल फि़क्‍ह बगैरह और जब इन उलूम के बारे में असात्‍जा से पूछा जाता कि हम यह उलूम क्‍यों पढ़ रहे हैं तो वह यह बताते कि इन उलूम के ज़रिये कुरआन व हदीस को इन्‍सान अच्‍छी तरह समझ सकता है. गौया इन उलूम की तालीम कुरआन व हदीस समझने के लिए दी जा रही थी. इस पर मुझे बारहा अपने असात्‍जा से यह अर्ज करना पड़ता कि आप इन उलूम के साथ साथ कुरआन व हदीस भी पढ़ाएं तो जवाब यह मिलता कि इनसे फ़ारिग़ होकर तुम आखि़री साल दौरा हदीस पढ़ोगे तो उस वक्‍त आपको कुरआन व हदीस का इल्‍म हासिल हो सकेगा.

यह पहला मौका था कि मेरे दिल को इस तर्जे अमल से एक धचका सा लगा मगर यह वक्‍़ती हादसा था जो दिल में आया और गुज़र गया और मेरे असात्‍जा़ का इसमें कोई क़सूर भी न था. इसलिए कि सारे मुआशिरे में वह निसाबे तालीम पढ़ा और पढ़ाया जा रहा था जो शाहजहां के दौर में एक सरकारी आलिम मुल्‍ला निजा़मुददीन ने मुरत्तिब किया था और इसी इस निसाब का नाम भी दर्से निजामी है और अहले हदीस के अलावा सब शीआ, सुन्‍नी, बरेल्‍वी और देव बन्‍दी यही निसाब आज तक पढ़ते पढ़ाते आ रहे हैं तो मेरे असात्‍जा भी इसी मुआशिरे में रहते थे. इसलिए उन्‍होंने भी यही निसाब पढ़ाना था और पढ़ाया. मेरे इन असात्‍जा़ में से बाज तो बुलन्‍द दर्जा के आलिम थे कि उनके फ़ैज़ से रब ने मुझे दौलते इल्‍म से नवाज़ा और मेरे दिल से हमेशा उनके लिए दुआएं निकलती हैं और इन उलामाए किरा ने ही मेरा यह ज़हन बनाया कि जो इल्‍म तुझे पढ़ाया जा रहा है यह खुदा की तरु़ से अमानत है जो हम तेरे सुपुर्द किये जा रहे हैं अब तेरा फ़र्ज है कि यह अमानत इस तरह दूसरे लोगों तक पहुंचा दो. इसी तल्‍क़ीन से मुतास्सिर होकर मैंने जिन्‍दगी के इब्तिदाई दस साल तालीम हासिल करने के लिए वक्‍फ किये और फ़राग़त के बाद भी बीस साल तालीम व तदरीस का काम करता रहा. अल्‍हम्‍दु लिल्‍लाह यह काम मैंने खा़लिसतन रजा़ए इलाही के लिए किया. अल्‍लाह तआला कुबूल फ़रमाए. (आमीन)
मेरा दूसरा दौर
बहर-हाल जब दौरे तालिब इल्‍मी का वह आखि़री साल आया जब मुझे दौरा हदीस पढ़ना था तो मैं इल्‍मे हदीस हासिल करने के लिए हिन्‍दुस्‍तान गया और देवबन्‍दी  मस्‍लक के मशहूर मदरसा दारूल उलूम में चोटी के उलमा से दौरा हदीस पढ़ा जिनमें मौलाना शब्‍बीर अहमद उसमानी रहमतुल्‍लाह अलैहि भी शा‍मिल थे जो मम्लिकते पाकिस्‍तान में शैखुल इस्‍लाम के मन्‍सब पर फ़ाइज़ रहे हैं. इन तमाम असात्‍जा किराम का इल्‍म हर कि़स्‍म के शक व शिब्‍ह से बालातर था. उनका तक़वा और दयानतदारी मुसल्‍लम थी मगर तरीक तालीम तो वही था जो तमाम हनफ़ी उलमा में मरव्‍वज था, चुनांचे दौरा हदीस के दौरान मरे दिल को दो बातों से ज़बरदस्‍त धचका लगा अव्‍वल यह कि दौरा हदीस में हदीस की छः किताबेपढ़ाई जा रही थीं जिनको सिहाह सित्‍ता कहते हैं यानी सहीह बुखारी, सहीह मुसलिम, सुनन अबू दाऊद, सुनन तिर्मिजी, सुनन निसाई, और सुनन इब्‍न माजा. इन सब किताबों के मुसन्निफ़ों में से कोई एक भी किसी इमाम का मुक़ल्लिद नहीं था और मेरे दिल पर यह बात भी बहुत गिरां गुज़री कि हदीसें जमा करने वाले मुहददिस उलमा में से कोई भी हनफ़ी नहीं था और न हनफ़ी उलमा की कोई हदीस की किताब हमारे दर्स में शामिल थी क्‍योंकि अहनाफ़ के हां ऐसी किताब है ही नहीं. दूसरी बात जिससे मेरे दिल को जबरदस्‍त चोट लगी वह हमारे असात्‍जा़ का साल भर उन हदीसों की तावीलों पर तवील तक़रीरें करना था जो हनफ़ी फि़क्‍़ह के खि़लाफ़ थीं. हत्‍ता कि बाज हदीसों पर तो दस दस दिन और महीना महीना तक़रीरें होती रहतीं जिनको हम तलबा याद भी करते और लखिते भी थे मगर इन तक़रीरों की हैसियत महज ग़लत तावीलों के सिवा कुछ भी नहीं था. मुझे याद है कि हमारे साथ दौरा हदीस में जज़ाइर मालाबार का एक शाफ़ई तालिब इल्‍मभी शरीक था वह कहा करता था हमारे असात्‍जा अपने मज़जब के मसाइल को दलाइल के बजाए मुक्‍कों के जो़र से साबित करते हैं और बाज असात्‍जा तो दौराने तदरीस जोश में तिपाई पर जो़र जो़र से मुक्‍के भी मारा करते थे. इस सूरते हाल से मेरा ज़हन मुतास्सिर हुए बगैर न रह सकामगर इसके बावजूद बीस साल में सिर्फ इस क़दर फि़क्ह की तर्दीद किया करता था कि जो मसाइल फि़क्ह में गरवही नहीं बल्कि शहनशाहों और जागीरदारों को खुश करने के लिए लिखे गये हैं वह गलत हैं. तो मेरी उस तर्दीद से हनफी़ उलमा नाराज़ हो जाया करते थे मगर इन्‍साफ़ पसन्‍द और तालीम याफ़्ता हजरात इसको पसन्‍द करते थ. खु़लासा यह कि मेरे ज़हनी इन्कि़लाब का यह दूसरा वाक़्या था.
मेरा तीसरा दौर
तीसरा वाक़्या यह हुआ कि मैं अपने बीस साला दौरे तदरीस में तलबा को तर्जुमा कुरआन और हदीस की इब्तिदाई किताब मिश्‍कात शरीफ़ को दर्स लाज़मी दिया करता था और यह दोनों मज़मून हनफ़ी निसाब में दाखिल नहीं थे. इब्तिदा में तालिब इल्‍म मुख़लिस होते थे और वह मेरे इस काम की क़दर करते थे मगर तक़सीम मुल्‍क के बाद तालिब इल्‍म मेरे इन जबरी असबाक़ को बेकार समझने लगे और मुल्‍क को तूल व अरज़ में मुझे इस काम पर मतऊन किया जाने लगा कि वह सख्‍त तबियत का मालिक है और तालिब इल्‍मों से जबरन बेगार लेता है. इनको जबरन तर्जुमा कुरआन और मिश्‍कात शरीफ़ नहीं पढ़ाना चाहिए. मैं अपने खि़लाफ़ इस कि़स्‍म के ताने और इल्‍जा़मात सुनता तो मेरी तबियम ऐसे तालिब इल्‍मों से बेजा़र हो जाती कि इन्‍सानों के लिखे हुए उलूम को शौक से पढ़ते हैं मगर अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम)  के अता कर्दा उलूम को पढ़ना बेकार समझते हैं. ऐसे लोगों को पढ़ाकर आलिम बनाकर मुझे खुदा के हां क्‍या अज्र मिलेगा, क्‍योंकि मैं उनको दुनिया के माल व मता के लिए तो नहीं पढ़ा रहा था मैं तो सिर्फ रजा़ए इलाही के लिए पढ़ा रहा था तो जब खुदा की किताब और पैग़म्‍बर (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) की हदीस के साथ उनका यह बर्ताव है तो उनको पढ़ाने से न पढ़ाना ही बहतर है.

मेरा चौथा दौर

चौथा वाक़्या यह हुआ कि आज कल दीनी मदरसे भी दुकानदारी बन कर रह गये हैं. और दीनी इल्‍म पढ़ने पढ़ाने वालों ने भी अपना मक़सद दुनिया हासिल करना ही बना लिया है. सदाकत और अमानतदारी से यह कोसों दूर हैं जैसा कि 1963ई0 की बात है कि लायलपुर (फैसलाबाद) शहर में नमाज़ तरावीह का इख्तिलाफी़ मसअला छिड़ गया. मुझे अच्‍छी तरह याद है कि बाजा़र की मसजिद अहले हदीस में एक आम जसले में इमामुल मनाजिरीन हज़रत मौलाना अहमद दीन साहब और रईसुल मुनाजि़रीन हज़रत मौलाना अब्‍दुल का़दिर रौपड़ी ने यह चैलेंज करके कहा कि अगर बीस रकात नमाज़ तरावीह कोई हनफ़ी आलिम साबित करना चाहे तो हम मुनाजरे के लिए तैयार हैं. मेरे मदरसे के दो तालिब इल्‍मों ने रूक्‍का लिखा कि हम इसके लिए तैयार हैं इन्‍होंने वापिस आकर मुझसे मुना‍ज़रे के लिए कहा तो मैंने कहा मुनाज़रों से मसाइल साबित नहीं हुआ करते. मैं जल्‍द ही नमाज़ तरावीह पर एक रिसाला लिखने वाला हूं. फिर जब मैंने रिसाला लिखने का अज्म किया तो चूंकि मैं भी दूसरे हनफ़ी उलेमा की तरह दीगर उलूम व फुनून का तो माहिर था, मगर हदीस चूंकि हमारे हां कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए हदीस में मुझे भी कोई महारत न थी, चुनांचे मैं रिसाले का मवाद हासिल करने के लिए मौलाना सरफ़राज़ खान सफ़दर के पास गया क्‍योंकि वह अहले हदीस मस्‍लक के खि़लाफ़ इख्तिलाफ़ी मसाइल पर किताबें लिखते रहते थे तो उन्‍होंने मुझे बीस रकात तरावीह के हक़ में दो दलीलें पेश कीं, एक मौत्‍ता इमाम मालिक (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  की रवायत थी जिसमें रावी बयान करता है कि हज़रत उमर (रजि़अल्‍लाहो अन्‍हो)के ज़माने में लोग रमजा़न की रातों में बीस रकात तरावीह के साथ क़याम किया करते थे. मौलाना सरफ़राज़ सफ़दर ने कहा चूंकि यह मौत्‍ता की रवायत है इसलिए यह मुसतनद है और दूसरी दलील यह पेश की कि सुनन बेहिकी में रवायत है कि नबी करीम (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने तीन दिन बा जमात जो नमाज़ तरावीह पढ़ाई थी वह बीस रकात थी. मौलाना सरफ़राज़ खान सफ़दर ने फ़रमाया कि इस रवायत में अबू शीबा नामक एक रावी है जिसको अहले हदीस ज़ईफ़ क़रार देते हैं मगर अस्‍माए रिजाल की किताब ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ में लिखा है कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी को ज़ईफ़ क़रार नहीं दिया और मुझे ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ की यह इबारत निकाल कर दखिई और लिखवाई. इबारत यूं है कि अबू शीबा का जिक्र करते हुए मुसन्निफ़ लिखता है कि ‘’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ यानी इस रावी के बारे में इमाम बुख़ारी (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने खा़मोशी इख्तियार फ़रमाई. मौलान साहब ने फ़रमाया कि इसका मतलब यह है कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी पर कोई तन्‍की़द नहीं की और जब इमाम बुखारी (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  तनकी़द नहीं करते तो दूसरे मुहददिसीन की तन्‍की़द की क्‍या अहमियत है. मैंने वापिस आकर रिसाला लिखकर शाए करा दिया और यह इबारत भी लिख दी. इस पर एक अहले हदीस आलिम की तरफ़ से इश्तिहार शाए हुआ कि अगर मौलाना अब्‍दुर्रहमान यह साबित करदें कि बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि) ने अबू शीबा को ज़ईफ़़ क़रार दिया तो मैं मौलाना साहब को एक हजा़र रूपये का इनाम दूंगा. जब मुझे यह इश्तिहार पहुंचा तो बड़ी हैरत हुई कि मीजा़ऩुल ऐतदाल में यह इबारत मैंने खुद देखी है तो फिर यह चैलेंज कैसा? फिर मैंने सोचा शायद जो जुमला मैंने नकुल किया है उसके सियाक़ व सिबाक में कोई इबारत रह न गई हो जो मैंने न देखी हो. चुनांचे मैंने बहालते रोजा़ लाहौर का सफ़र किया और किताब ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ दो सौ रूपये में जाकर ख़रीदी और जब उस किताब का मुतालआ किया तो इबारत बिल्‍कुल दूरूस्‍त थी और उसके सियाक़ व सिबाक़ में भी कोई ऐसा लफ़्ज़ न था जिसमें इस जुम्‍ले की नफी़ होती हो मेरी हैरत और बढ़ गई और वापिस लायलपुर (फैसलाबाद) आ गया. यहां आकर ‘मीजा़नुल ऐतदाल’ का मुक़द्दमा पढ़ा तो वहां यह का़यदा लिखा हुआ था कि जब अस्‍नादे हदीस की बहस में यह जुम्‍ला आये कि ’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ तो इसका मतलब यह होगा कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  या दूसरे मुहददिसीन (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इस रावी को हद से ज्‍यादा ज़ईफ़ क़रार दिया और इसको इस इस का़बिल ही न समझा कि इसके मुताल्लिक़ कोई बहस की जाय. यानी वह नाका़बिले ऐतिमाद है और उसके मुताल्लिक़ कहा करते थे कि छोड़ो इस रावी को यह भी कोई मुहददिस है कि इस पर तवज्‍जो दी जाय यानी सिरे से यह इस का़बिल ही नहीं कि इसका मुहददिसीन की लिस्‍ट में नाम लिया जाय तो ’सकता अन्‍हुल बुख़ारी’’ का मतलब इस का़यदे के मुताबिक यह हुआ कि इमाम बुखा़री (रहमतुल्‍लाह अलैहि)  ने इसके मुताल्लिक कोई बात करना ही गवारा नहीं किा. जब यह हकी़क़त मुझ पर मुन्‍कसिफ़ हुई तो मैंने मौलाना सरफ़राज़ खान साहब को लिखा कि मज़हबी तअस्‍सुब में आकर दियानतदारी छोड़ देना एक आलिम के शायाने शान नहीं तो उन्‍होंने मुझे इसका कोई जवाब ही नहीं दिया. अर्से के बाद जब उनसे मुलाका़त हुई तो सिर्फ ज़बानी फ़रमाया कि मौलवी साहब ऐसे इख्तिलाफ़ी मसाइल में हकी़क़त यह है कि अहादीस हनफियों के खि़लाफ़ हैं बस ऐसे ज़ईफ़ सहारों से ही काम लेना पड़ता है. इससे मेरा ज़हन पर ज़बरदस्‍त चोट लगी और अफ़सोस हुआ कि दीन के मामले में यह तर्ज़े अमल तो खा़लिसतन यहूदी उलेमा का है चुनांचे इन वजूहात की बिना पर मैंने एक तरफ़ मदरसा चलाने से माजि़रत कर ली और दूसरी तरफ़ तक़लीदी ज़हनियत को बिल्‍कुल तरक कर दिया और गैर जानिबदार होकर आलमी मजाहिब का मुतालआ शुरू किया और मुसलमानों के मुख़तलिफ़ फि़र्कों का भी गै़र जानिबदारी से मुतालआ किया. कुरआन व हदीस को गै़र जानिबदार होकर समझना अपना नसबुल ऐन बना लिया. चुनांचे चन्‍द बरसों के मुतालआ के बाद मैं इस नतीजा पर पहुंचा कि मुसलमानों के इखतिलाफ़ी मसाइल में हक़ यह है कि जो कुछ कुरआन व हदीस में मिले उसको कुबूल किया जाय. और वह बातें जो कुरआन व हदीस के खि़लाफ़ हों उनको रद्द किया जाय, क्‍योंकि पैगम्‍बर (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के सिवा कोई इन्‍सान मासूम नहीं तो फिर हम गै़र मासूम इन्‍सानों की तक़लीद क्‍यों करें?  तरके तक़लीद न सिर्फ यह कि मैंने अपना मसलक बना लिया बल्कि मेरे नज़दीक किसी भी आलिम के लिए तक़लीद जाइज़ नहीं और ग़रीब अवाम तो उलेमा के ताबे होते हैं वह माज़ूर हैं, मगर उलेमा के लिए तक़लीद करना क़तअन हराम है जब एक मुसलमान कलमा ‘’लाइलाह इल्‍लल्‍लाह मुहम्‍मदुर्रसूलुल्‍लाह’’ पढ़ता है तो इसके पहले जुज़ का मतलब है कि इन्‍सान दिल से यह अहद करे कि मैंने अपना मालिक व हाकिम सिर्फ अल्‍लाह को बनाया है और उसी के हुक्‍मों पर मैंने चलना है और दूसरे जुज़ का मतलब है कि यह दौर है हज़रत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की नुबूवत का. लिहाजा़ अल्‍लाह का वही हुकुम मैने मानना है जो हज़रत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के ज़रिये मुझ तक पहुंचा है. हर मुसलमान जब दिल से सिर्फ़ अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की बातों को मानने का अहद करता है तो फिर किसी मुसलमान के लिए यह क़तअन जाइज़ नहीं कि वह कुरआन व हदीस के सिवा किसी दूसरे इन्‍सान की तक़लीद करे और तअस्‍सुब में आकर आंखें बन्‍द करले. याद रखिये जिस तरह अल्‍लाह के सिवा किसी दूसरे का हुकुम मानना उलूहियत में शिर्क है उसी तरह हजरत मुहम्‍मद मुस्‍तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के सिवा किसी दूसरे का हुकुम मानना भी शिर्क फि़र्रिसालत है. तक़लीद तो अवाम के लिए भी हराम है और उलेमा के लिए तो इससे भी ज़यादा हराम है. मगर उलेमा इस जुर्म में अवाम की तरफ़ से भी जि़म्‍मेदार हैं क्‍योंकि वह अवाम को गिरोह बन्‍दी में बांट कर तक़लीद करने पर मजबूर करते हैं हालांकि ईमान का तका़जा़ यह है कि कुरआन व हदीस के मका़बले में किसी बड़े से बड़े शख्‍स की बात को भी ठुकरा दें. हज़रत अब्‍दुल्‍लाह बिन उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) का यह वाक्‍़या तारीख़े इस्‍लाम में मज़कूर है कि हज के मौके़ पर उनसे किसी ने मसअला पूछा तो आपने फ़रमाया इस मसअले में रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का फ़रमान यह है तो साइल ने कहा आपके वालिद मोहतरम हज़रत उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) तो इसके खिलाफ़ बयान करते थे. हज़रत अब्‍दुल्‍लाह बिन उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो)   गुस्‍से में आ गये और फ़रमाया क्‍या मुहम्‍मद रसूलुल्‍लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) इत्तिबा किये जाने के ज्‍़यादा हक़दार हैं या हज़रत उमर (रजिअल्ला्हो अन्हो) ((‘अहकामुल अहकाम’ जिल्‍द-2बहस रदे तक़लीद)) यह है सच्‍चे ईमान की निशानी कि अल्‍लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के फ़रमान के खिलाफ़ ख्‍वाह किसी जलीलुल क़दर सहाबी की बात ही क्‍यों न हो उसको रद्द कर दिया जाय. यही दावत जमात अहले हदीस की है.

बिल आखि़र मैं अहले हदीस हो गया
अब मेरे सामने दो ही रास्‍ते थे एक तक़लीदी मज़हब का जिसका मतलब यह था कि जो मसाइल हनफ़ी फि़क्‍ह की किताबों में दर्ज हैं उनको मैं दिल से रब्‍बानी अहकाम मान कर उनके मुताबिक अमल करूं. दूसरा रास्‍ता रास्‍ता तहकी़की़ मज़हब का था कि मैं किताबुल्‍लाह और सुन्‍नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के मुताबिक़ अमल करने का अहद करता तो मैंने दियानतदारी से दूसरा रास्‍ता इख्तियार किया और पहले रास्‍ता को रद्द कर दिया यही दूसरा रास्‍ता मस्‍लक अहले हदीस है. जिसका मतलब किसी खा़स तबके़ की तक़लीद करना नहीं बल्कि कुरआन व हदीस पर ईमान लाकर उनके मुताबिक़ अमल करना है. लिहाजा़ मैंने मज़कूरा बाला मुख़तलिफ़ अदवार से गुज़रने के बाद मसलक अहले हदीस को इख्तियार किया और इसका ऐलान भी कर दिया. इसके बाद नमाज़ तरावीह, फा़तिहा ख़लफ़ुल इमाम, अहकाम नमाजे जनाजा़ बगै़रह जैसे मसाइल पर छोटे छोटे रसाइल भी तस्‍नीफ़ करके शाए करा चुका हूं ताकि दूसरे मुसलमानों को भी अल्‍लाह तबारक व तआ़ला हिदायत नसीब फ़रमा दे. और वह तक़लीद तरक करके सुन्‍नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) पर अमल पैरा होकर अपनी आकि़बत संवारें. इस मुख्‍़तसिर सी तहरीर का मतलब यही है कि अल्‍लाह तआला इसके मुतालआ से मुसलमानों को इत्तिबाए रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की तौफी़क अ़ता फ़रमाए (आमीन)
वमा अलैना इल्‍लल बलागुल मुबीन.