अल्लाह के नाम से हम उसी की तारीफ़ करते हैं, उसी से मदद तलब करते हैं और माफ़ी के तलबगार हैं। अल्लाह जिसे सही मार्गदर्शन (सीधा रास्ता) करना चाहे उसे कोई भटका नहीं सकता और जिसे अल्लाह रास्ते से भटकाना चाहे उसे कोई सही राह पर नहीं ला सकता। हम गवाही देते हैं कि कोई माबूद (पूजा के लायक) नहीं है सिवाए अल्लाह के और गवाही देते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और अन्तिम रसूल हैं।
सबसे पहले मुसलिम शब्द का मतलब मालूम करते हैं । मुसलिम शब्द जिसका हम आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं, का असल मतलब क्या है? मुसलिम वह है जो अपनी इच्छा, मर्जी अल्लाह की मर्जी, ख्वाहिश के आगे त्याग दे। दूसरे शब्दों में अपने आपको अल्लाह के लिए समर्पित कर देना । अब सवाल है कि कौन मुसलिम है और कौन मोमिन? क्या कोई आदमी अपने जन्म के आधार (गुण) पर मुसलिम हो सकता है? क्या आदमी मुसलिम सिर्फ इसी वजह से हो सकता है कि वह किसी मुसलिम का बेटा या बेटे का बेटा (पौ़त्र) है? क्या कोई महज मुसलिम घर में पैदा होने मात्र से मुसलिम हो जाता है? जैसे कि हिन्दू का बेटा हिन्दू होता है या अंग्रेज का बेटा अं्रग्रेज होता है । क्या मुसलिम जाति है या राष्ट्र्ीयता है। क्या मुसलिम होना मुसलिम उम्मत से संबंध रखना है । जैसे आर्यन लोग आर्यन जाति से संबंधित थे। जैसे जापानी लोग जापनी होते हैं, क्योंकि वह जापान में जन्म लेते हैं । उसी तरह से क्या मुसलमान मुसलिम कहलाता है क्योंकि उसने मुसलिम मुल्क में या मुसलिम घर में जन्म लिया है ? आपका इन सवालों से संबंधित उत्तर ‘न’ में होगा। एक मुसलिम सही मायने में मुसलिम नहीं हो सकता, महज इस वजह से कि वह मुसलिम पैदा हुआ है। वह मुसलिम इसलिए है क्योंकि वह इस्लाम को मानता है। अगर वह इस्लाम को त्यागता है वब वह मुसलिम नहीं होता। कोई आदमी चाहे ब्राह्मण हो या राजपूत, अंग्रेज हो या जापानी, काला हो या गोरा वह शख्स इस्लाम ग्रहण करने पर मुसलिम समाज (कौ़म) का सदस्य बन जाता है। इसके विपरीत यदि कोई शख्स जो मुसलिम घर में पैदा हुआ है उसको मुसलिम उम्मत से निकाल दिया जाता है या उसने इस्लाम को अपनाने से छोड़ दिया चाहे वह नबी का उत्तराधिकारी ही क्यों न हो। वह मुसलिम नहीं हो सकता।
यह इस बात को स्थापित करता है कि अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत (उपहार) जिसका हम आनन्द उठाते हैं कि मुसलिम होना, यह कोई ऐसी बात नहीं कि वह अपने आप पैतृक रूप में हमें हमारे मां, बाप से मिलती है, जो जिन्दगी भर आधिकारिक रूप से हमारे नज़रिये और अख़लाक़ के बरखिलाफ़ हमारे पास रहती है। यह एक तोहफ़ा है जिसको पाने के लिए हमें लगातार लड़ना है।
हम सब इस बात पर राजी है कि इस्लाम ग्रहण करने पर हम मुसलिम बन जाते हैं । लेकिन इस्लाम ग्रहण करने का मतलब क्या है? क्या इसके मायने यह होते हैं कि जो केाई भी यह ज़बानी इक़रार करता है कि ‘‘मैं मुसलिम हूं’’ या मैंने इस्लाम कुबूल कर लिया है? वह यह कहने से सच्चा मुसलमान बन जाता है ? या इसका मतलब यह होता है कि जैसे एक हिन्दू धर्म को मानने वाला कुछ संस्कृत के लिखे शब्दों को पढ़ ले बिना उनके मतलब को समझे। इसी तरह से कोई शख्स कुछ अरबी शब्दों को बिना उनका मतलब जाने पढ़े और मुसलमान हो जाए? आप इस सवाल का क्या जवाब देंगे। हम इसका जवाब देंगे कि इसलाम कुबूल करने का मतलब होता है कि मुसलमान पूरे होश और समझ-बूझ के साथ स्वीकार करे कि जो कुछ भी कुरआन में उतारा गया है उसके हिसाब से चलें। जो लोग इसके मुताबिक अमल नहीं करते हकी़क़त में वह मुसलिम नहीं हैं।
इस्लाम में सबसे पहले ज्ञान (इस्लामी मालूमात) है और फिर उस ज्ञान को (व्यवहार में लाना )अमली जामा पहनाना है। कोई भी शख्स सच्चा मुसलिम नहीं हो सकता बिना इस्लाम का मतलब जाने,क्योंकि वह मुसलमान होता है तो न कि जन्म से बल्कि ज्ञान (इस्लामी मालूमात) हासिल कर उसे अपनी जिन्दगी में व्यवहारिक रूप से उतारे। यह बात स्पष्ट है कि कोई मालूमात न होने कि वजह से सच्चा मुसलिम बनना और रहना नामुमकिन है। मुसलमान घरों में जन्म लेना, मुसलमानी नाम रखना, मुसलमानी पहनावे (कपड़े) पहनना और अपने आपको मुसलिम पुकारना ही मुसलमान होने के लिए काफ़ी नहीं है ।
काफ़िर (नास्तिक) और मुसलिम के बीच अन्तर सिर्फ़ नाम का ही नहीं है, जैसे किसी का नाम स्मिथ या रामलाल और अब्दुल्लाह है। कोई आदमी सिर्फ़ नाम की वजह से काफ़िर और मुसलिम नहीं होता । इसमें सबसे बड़ा अन्तर इस्लामी मालूमात का और उसपर अमल का है । एक काफ़िर यह नहीं समझता कि उसका अल्लाह से क्या संबंध है और अल्लाह का उससे क्या ताल्लुक़ है । जिस तरह से वह अल्लाह की मर्जी को नहीं जानता उसी तरह से वह सीधा रास्ता नहीं जान सकता, जिसपर चलकर वह अपनी जिन्दगी गुजा़र सके। यदि एक मुसलिम अल्लाह की मर्जी को नज़रअन्दाज़ कर दे, तब किस आधार पर काफ़िर के बजाय मुसलमान कहा जायेगा?
यहांँ पर जजा़ (इनाम) और सजा़ में अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा फ़र्क़ है, जो रस्मी तौर पर (दावा करने वाले) कथित मुसलिम और एक सच्चे मुसलमान के बीच एक कथित तौर पर मुसलिम होने का दावा करने वाला मुसलमान कहलाया जा सकता है, जब वह मुसलिम नाम रखे और मुसलिम घर में पैदा हुआ हो। लेकिन अल्लाह के नज़दीक सच्चा मुसलमान वही हागा, जो इस्लामी मालूमात रखता हो और कुरआन व सुन्नत के मुताबिक अमल करे। ऐसे वह लेग हैं, जिनको अल्लाह ने कुरआन के अन्दर मोमिन का खिताब दिया है और इन मोमिनों के लिए अल्लाह ने आखिरत में अच्छे इनाम का वादा किया है।
अल्लाह हमंे उन लोगों में से बनाये जो निरन्तर अपने गुनाहों की बख्शिश मांगते रहते हैं और वह अपनी असीमित रहमत और अपनी हिफ़ाजत में रखे । आमीन.
सबसे पहले मुसलिम शब्द का मतलब मालूम करते हैं । मुसलिम शब्द जिसका हम आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं, का असल मतलब क्या है? मुसलिम वह है जो अपनी इच्छा, मर्जी अल्लाह की मर्जी, ख्वाहिश के आगे त्याग दे। दूसरे शब्दों में अपने आपको अल्लाह के लिए समर्पित कर देना । अब सवाल है कि कौन मुसलिम है और कौन मोमिन? क्या कोई आदमी अपने जन्म के आधार (गुण) पर मुसलिम हो सकता है? क्या आदमी मुसलिम सिर्फ इसी वजह से हो सकता है कि वह किसी मुसलिम का बेटा या बेटे का बेटा (पौ़त्र) है? क्या कोई महज मुसलिम घर में पैदा होने मात्र से मुसलिम हो जाता है? जैसे कि हिन्दू का बेटा हिन्दू होता है या अंग्रेज का बेटा अं्रग्रेज होता है । क्या मुसलिम जाति है या राष्ट्र्ीयता है। क्या मुसलिम होना मुसलिम उम्मत से संबंध रखना है । जैसे आर्यन लोग आर्यन जाति से संबंधित थे। जैसे जापानी लोग जापनी होते हैं, क्योंकि वह जापान में जन्म लेते हैं । उसी तरह से क्या मुसलमान मुसलिम कहलाता है क्योंकि उसने मुसलिम मुल्क में या मुसलिम घर में जन्म लिया है ? आपका इन सवालों से संबंधित उत्तर ‘न’ में होगा। एक मुसलिम सही मायने में मुसलिम नहीं हो सकता, महज इस वजह से कि वह मुसलिम पैदा हुआ है। वह मुसलिम इसलिए है क्योंकि वह इस्लाम को मानता है। अगर वह इस्लाम को त्यागता है वब वह मुसलिम नहीं होता। कोई आदमी चाहे ब्राह्मण हो या राजपूत, अंग्रेज हो या जापानी, काला हो या गोरा वह शख्स इस्लाम ग्रहण करने पर मुसलिम समाज (कौ़म) का सदस्य बन जाता है। इसके विपरीत यदि कोई शख्स जो मुसलिम घर में पैदा हुआ है उसको मुसलिम उम्मत से निकाल दिया जाता है या उसने इस्लाम को अपनाने से छोड़ दिया चाहे वह नबी का उत्तराधिकारी ही क्यों न हो। वह मुसलिम नहीं हो सकता।
यह इस बात को स्थापित करता है कि अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत (उपहार) जिसका हम आनन्द उठाते हैं कि मुसलिम होना, यह कोई ऐसी बात नहीं कि वह अपने आप पैतृक रूप में हमें हमारे मां, बाप से मिलती है, जो जिन्दगी भर आधिकारिक रूप से हमारे नज़रिये और अख़लाक़ के बरखिलाफ़ हमारे पास रहती है। यह एक तोहफ़ा है जिसको पाने के लिए हमें लगातार लड़ना है।
हम सब इस बात पर राजी है कि इस्लाम ग्रहण करने पर हम मुसलिम बन जाते हैं । लेकिन इस्लाम ग्रहण करने का मतलब क्या है? क्या इसके मायने यह होते हैं कि जो केाई भी यह ज़बानी इक़रार करता है कि ‘‘मैं मुसलिम हूं’’ या मैंने इस्लाम कुबूल कर लिया है? वह यह कहने से सच्चा मुसलमान बन जाता है ? या इसका मतलब यह होता है कि जैसे एक हिन्दू धर्म को मानने वाला कुछ संस्कृत के लिखे शब्दों को पढ़ ले बिना उनके मतलब को समझे। इसी तरह से कोई शख्स कुछ अरबी शब्दों को बिना उनका मतलब जाने पढ़े और मुसलमान हो जाए? आप इस सवाल का क्या जवाब देंगे। हम इसका जवाब देंगे कि इसलाम कुबूल करने का मतलब होता है कि मुसलमान पूरे होश और समझ-बूझ के साथ स्वीकार करे कि जो कुछ भी कुरआन में उतारा गया है उसके हिसाब से चलें। जो लोग इसके मुताबिक अमल नहीं करते हकी़क़त में वह मुसलिम नहीं हैं।
इस्लाम में सबसे पहले ज्ञान (इस्लामी मालूमात) है और फिर उस ज्ञान को (व्यवहार में लाना )अमली जामा पहनाना है। कोई भी शख्स सच्चा मुसलिम नहीं हो सकता बिना इस्लाम का मतलब जाने,क्योंकि वह मुसलमान होता है तो न कि जन्म से बल्कि ज्ञान (इस्लामी मालूमात) हासिल कर उसे अपनी जिन्दगी में व्यवहारिक रूप से उतारे। यह बात स्पष्ट है कि कोई मालूमात न होने कि वजह से सच्चा मुसलिम बनना और रहना नामुमकिन है। मुसलमान घरों में जन्म लेना, मुसलमानी नाम रखना, मुसलमानी पहनावे (कपड़े) पहनना और अपने आपको मुसलिम पुकारना ही मुसलमान होने के लिए काफ़ी नहीं है ।
काफ़िर (नास्तिक) और मुसलिम के बीच अन्तर सिर्फ़ नाम का ही नहीं है, जैसे किसी का नाम स्मिथ या रामलाल और अब्दुल्लाह है। कोई आदमी सिर्फ़ नाम की वजह से काफ़िर और मुसलिम नहीं होता । इसमें सबसे बड़ा अन्तर इस्लामी मालूमात का और उसपर अमल का है । एक काफ़िर यह नहीं समझता कि उसका अल्लाह से क्या संबंध है और अल्लाह का उससे क्या ताल्लुक़ है । जिस तरह से वह अल्लाह की मर्जी को नहीं जानता उसी तरह से वह सीधा रास्ता नहीं जान सकता, जिसपर चलकर वह अपनी जिन्दगी गुजा़र सके। यदि एक मुसलिम अल्लाह की मर्जी को नज़रअन्दाज़ कर दे, तब किस आधार पर काफ़िर के बजाय मुसलमान कहा जायेगा?
यहांँ पर जजा़ (इनाम) और सजा़ में अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा फ़र्क़ है, जो रस्मी तौर पर (दावा करने वाले) कथित मुसलिम और एक सच्चे मुसलमान के बीच एक कथित तौर पर मुसलिम होने का दावा करने वाला मुसलमान कहलाया जा सकता है, जब वह मुसलिम नाम रखे और मुसलिम घर में पैदा हुआ हो। लेकिन अल्लाह के नज़दीक सच्चा मुसलमान वही हागा, जो इस्लामी मालूमात रखता हो और कुरआन व सुन्नत के मुताबिक अमल करे। ऐसे वह लेग हैं, जिनको अल्लाह ने कुरआन के अन्दर मोमिन का खिताब दिया है और इन मोमिनों के लिए अल्लाह ने आखिरत में अच्छे इनाम का वादा किया है।
अल्लाह हमंे उन लोगों में से बनाये जो निरन्तर अपने गुनाहों की बख्शिश मांगते रहते हैं और वह अपनी असीमित रहमत और अपनी हिफ़ाजत में रखे । आमीन.
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