बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम की जगह 786 लिखने की बिदअ़त एक अर्से से मुसलिम हलकों में मक़बूलियत व शरई हैसियत हासिल कर चुकी है. रिसालों, किताबों एवं खुतूत तक ही महदूद (सीमित) नहीं है, बल्कि लोग गाडि़यों और दुकानों में लिखा करते हैं और अपने हर काम का आगा़ज (शुभारम्भ) इसी से करते हैं.
बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम को 786 लिखना यह दर असल नाम-निहाद उलमाए किराम का तर्जे-अम़ल है, यह हज़रात 786 को बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम का नेमुल बदल (प्रतिस्थानीय) क़रार देते हुए बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम की बेहुरमती से बचने के लिए अपने खुतूत व रसाइल (पत्र-पत्रिकाओं) में 786 का इस्तेमाल करते हैं और इसे रिवाज देते हैं और बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम लिखने में आ़र (शर्म) महसूस करते हुए परहेज़ करते है और कहते हैं कि यह तालीमाते नबवी के खिलाफ़ है.
हालांकि यह हकी़क़त में सिराते मुस्तकी़म (सत्मार्ग) से इन्हिराफ (इंकार) और दीन-ए-इस्लाम व कुरआने मुक़ददस के साथ खुला हुआ मजा़क है. क्योंकि कुरआ़न मजीद के अन्दर अल्लाह तआ़ला ने हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के एक ख़त का तज़किरा (उल्लेख) किया है, जिसकी इब्तिदा बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम से की गई है.
सन 6 हिजरी में सुलह हुदैबिया के मौके़ पर पैग़म्बरे इस्लाम और मुसलमानों का मुशरिकों से जिन 6 शर्तों पर मुआहिदा (समझौता) हुआ था, इस अहद नामे की तहरीर का आगा़ज भी हज़रत अ़ली (रजि़अल्लाहु अन्हु) ने बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम से किया था. सन 7 हिजरी के आखि़र में नबी करीम (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने अमीरों व सुल्तानों के नाम पर जितने भी खुतूत (पत्र) रवाना किये थे, सबके शुरू में बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम लिखा गया था.
हालांकि प्यारे नबी (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) यकी़नी तौर पर जानते थे कि यह खुतूत कुफ्फार और मुशरिकी़न के नापाक हाथों में जायेंगे और मुखा़तिब (संबोधित) भी वही लोग थे. मगर क्या शान-ए-इलाही कि इब्तिदा अल्लाह पाक के मुकददस नाम से और इख्तिमाम भी इस पर.
हम 786 के पैरोकारों से पूछना चाहते हैं कि क्या हमारे असलाफ़ को ताजीम-ए-इलाही से कोई सरोकार नहीं था. क्या कुरआने मुकददस की ताजी़म हमसे कम किया करते थे या उनको शरीयत की समझ हमसे कम थी, जो हम इस कमी को पूरा कर रहे हैं. यह मुसल्लम (खुली) हकी़क़त है कि हमारे असलाफ़ कुरआने मजीद की ताजी़म व तकरीम हमसे ज़्यादा किया करते थे और उनका फ़हम व इदराक भी हमसे कहीं ज़्यादा था. दर असल 786 हिन्दुओं के भगवान हरीक़ष्णा के हुरूफ़ (अक्षरों) का मजमूई योग है. हुरूफ़ को आदाद (अंकों) में तब्दील (परिवर्तितत्र) करना, यह एक यहूदी मंसूबा साजी़ और इस्लाम के खि़लाफ़ प्रोपैगेण्डा है और दुश्मनाने इस्लाम की एक साजि़श के तहत यह काम अमल में आया है, जिसका मक़सद दीने इस्लाम की असली शक्ल व सूरत को मसख़ (बिगाड़ना) करना है.
ज़रा सोचिये ! जब हम बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम के बजाय अपने खुतूत बगैरह की इब्तिदा में 786 लिखते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि हम एक अल्लाह के बजाय हरीक्रष्णा और अल्लाह दोनों को मानते हैं तो ऐसी सूरत में कलिमा तौहीद के मुन्कर क़रार पाते हैं. जब हमारा अकीद-ए-तौहीद ही नहीं रहा तो फिर मुसलमानियत कहां रही. हालांकि हमारे अकी़दे के मुताबिक़ हमारा सिर्फ़ एक अकेला रब अल्लाह है.
अगर तुम्हारे नाम का अदद 420 या 92 आ जाय और नाम के बजाय यूं पुकारा जाय, ऐ 420 ! इधर आओ. तो क्या तुम इस बात को गवारा करोगे, हरगिज़ नहीं. क्योंकि बुरे अल्का़ब (सम्बोधन) से किसी को पुकराना इस्लामी आदाब के खि़लाफ़ है. और इसकी कुरआन में मज़म्मत (निंदा) की गई है, जबकि तुम्हारी ईमानी गै़रत इस बात को कुबूल करने के लिए तैयार नहीं है तो फिर तुम अल्लाह और मुहम्मद जैसे प्यारे नाम को गिनती व अदद में तब्दील करके बाअसे-अहतराम (आदरणीय) कैसे तसव्वुर करते हो? यह अल्लाह और मुहम्मद के नाम की तौहीन नहीं है तो और क्या है?
ऐसे तहरीफ़ (परिवर्तन) करने वाले जा़लिम हैं और बिसमिल्लाहिर्रमानिर्रहीम को 786 या मुहम्मद के बजाय 92 और अल्लाह के बजाय 66 लिखना और बोलना आदाबे इस्लामी के खि़लाफ़ और शिर्क व बिदअ़त का काम है. लिहाजा़ अब भी वक्त है अल्लाह तआ़ला से खा़लिस तौबा कर लो और यहूदी सिफ्त मफा़द परस्त हज़रात के मकरो-फ़रेब में आकर अपने ईमान को गदला मत बनाओ. (अल्लाह तआ़ला हमें इसकी तौफ़ीक दे, आमीन)
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