मंगलवार, 29 नवंबर 2011

दस मुहर्रम और मुसलमान


मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म में निहायत महत्व व फ़जीलत रखता है। तमाम मुसलमानों के निकट इसका मुका़म व अहतराम रखना अनिवार्य है। इस्लामी साल की शुरूआत भी इसी महीने से होती है। इसी तरह इस्लामी साल के बारह महीनों में रजब, जुलका़दह, जुलहिज्जह के महीने भी ताजीम (सम्मान) के लायक हैं। अल्लाह तआला का फ़रमान है कि- अल्लाह के यहांँ ज़मीन व आसमान के पैदा किये जाने के दिन ही से महीनों की गिनती बारह है। इसलिए तुम अपने आप पर अत्याचार न करो। (सूरहःतौबह-36)
आशूरा का रोजा़- आशूरा मुहर्रम की दसवीं तारीख को कहा जाता है। इस दिन की बड़ी फ़जीलत है व अहमियत है। अल्लाह तआला ने इस दिन हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को और उनकी कौ़म बनी इस्राईल को फ़िरऔन के अत्याचार से छुटकारा दिलाया था। इस दिन रोजा़ रखना सुन्नत है और इसकी बड़ी अहमियत और फ़जीलत आई है। इससे पिछले एक साल के सगी़रा गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं। हजरत क़तादा रजिअल्लाहों अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से आशूरा के रोजे़ के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया यह पिछले एक साल के पापों (गुनाहों) का कफ्फ़ारा बन जाता है। (मुसलिम) मुूहर्रम की दसवीं तारीख को रोजा़ रखने के साथ उसके आगे या पीछे एक दिन को रोजे़ को मिला लेना होगा (अहमद)
मुहर्रम की बिदअतें- मुहर्रम में मसनून काम सिर्फ़ रोजा़ है, मगर आजकल के मुसलमान इसमें रोजा़ रखने के बजाय खुराफा़त में उलझ गये हैं। हजरत हुसैन (रजिअल्लाहों अन्हु) की शहदत के कारण मुहर्रम के दिन को ग़म व मातम का दिन बना लिया गया है। जबकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के ज़माने में रोजा़ के सिवाय कुछ नहीं था।
ताज़िया बनाना- ताज़िया बनाना महापाप है। काग़जों व लकड़ियों से ताज़िया बनाते हैं। हजारों स्त्री-पुरूष सजदा करते हैं, उससे मुरादें मांगते हैं। यह लोग ख्याल करते हैं कि इसमें हजरत हुसैन (रजिअल्लाहों अन्हु) की आत्मा आ ती है। अपने बच्चों को ताज़िया के नीचे से गुज़रवाते हैं, ताकि वह तमाम मुसीबतों व नज़रे   बद (कुदृष्टि) से महफ़ूज रहें। यह सब शिर्क का काम है और ऐसा करना हराम है। अल्लाह तआला  का फ़रमान है- क्या तुम उस चीज़ को पूजते हो, जिसको खुद बनाते हो। जबकि अल्लाह तआला ने तुमको और तुम्हारे काम को पैदा किया है। (सूरहःसाफ़फ़ात)
नौहा व मातम - इस्लाम ने मुसीबतों पर सब्र करने का आदेश दिये है और मातम करने वाले पर लानत भेजी गई है। हदीस में है कि अल्लाह तआला की लानत हो उस पर जिसने मुसीबत पर बाल मुंड लिये, जो़र से चिल्लाया और कपड़े फाड़े। (मुसलिम) इसी तरह ढोल, ताशा, नगाड़ा बजाना हराम है। हदीस में आया है कि रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि अल्लाह ने मुझे सारी दुनिया के लिये रहमत व हिदायत बनाकर भेजा है और मुझे हुक्म दिया है कि मैं तमाम बाजों, ढोलों, ताशों, नगाड़ों आदि को मिटादूं।

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