शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

आवागमनीय पुनर्जन्‍म

 
      आर्यों की मान्‍यता है कि दुनिया में जो बन्‍दे गुनाह करते हैं उनकी सजा के लिए हैवानों के शरीर में उन्‍हें जाना पड़ता है. मगर किस तरह ? बैठे-बैठे हैवान नहीं बन जाते बल्कि बाकायदा अण्‍डे के अन्‍दर या हैवानों के पेट में शरीर तैयार होता है इसमें गुनाहगार (पापी) आदमी की रूह (आत्‍मा)डाली जाती है अर्थात् दुनिया का इन्तिजाम जिस कदर खुदा ने इंसानों और हैवानों में मिलाप का रखा है यह सब प्रबन्‍ध बन्‍दों के गुनाहों पर निर्भर करता है. चुनांचि आर्य धर्म मे एक समर्थक (पण्डित लेखराम) अपने रिसाले (पत्रिका) ‘’सबूत तनासुख’’ में यूं कलमबन्‍द हैं
      ‘’मसअला आवागमन (तनासुख) की रू से दो किस्‍म के शरीर माने गये हैं एक कर्मयोनि (आमाल खाना), दूसरा भोग योनि (सजा़ख़ाना. शरीर में समझने की ताक़त और अच्‍छा बुरा समझने की तमीज़ दी गई है वह कर्म योनि और जिस शरीर में नहीं दी गई है वह भोग योनि है. इस लिहाज से इंसान कर्म योनि और बाकी भोग योनि है. चूंकि हैवान भोग योनि है वह नेक या बद काम कर नहीं सकते जिस तरह जेल खा़ना के कै़दी सजा़ की अबधि गुज़र जाने के बाद जेल से रिहाई होती है न कि किसी अच्‍छे कर्म से. इसी प्रकार सजा़ की अबधि गुजरने के बाद हैवानी शरीर से रिहाई होनी चाहिए और फिर जिस दर्जा शरीर से पतन हुआ या उसी स्थिति में परिवर्तन किया जाता है हैवानी शरीर के पुन्‍य कर्मों से नहीं.’’ (सबूत तनावसुख पेज 197-198)
      उल्‍लेखनीय है कि तनासुख जिसे हिन्‍दी में पुनर्जन्‍म और आवागम भी कहते हैं यह है कि आत्‍मा छोड़ने इस शरीर के जिसमें वह अब है किसी ऐसे शरीर में चली जाय जो हस्‍बे दस्‍तूर मां के पेट या अण्‍डे के अन्‍दर तैयार हुआ हो, जिसको दूसरो शब्‍दों में तनासुख तवालुद भी कहते हैं यह है आर्यों का दावा.

      आर्यों का दावा जो हमने उनकी किताब से नकल किया है अपने अर्थ बतलाने में बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है है किसी व्‍याख्‍या और टिप्‍पणी का मुहताज नहीं. मजमून स्‍पष्‍ट है कि मनुष्‍य शरीर आत्‍मा के लिए असल है और बाकी हैवानी शरीर बतौर सजा़ पाप के अनुसार मिलते हैं. इसी तरह अगर यही आर्यों की मान्‍यता है और निस्‍संदेह यही है तो हमारी तरफ से इस पर संक्षिप्‍त सी द़्रष्टि है.

1.                  जब मनुष्‍य शरीर भोग योनि (कै़दखाना) नहीं तो फिर प्रश्‍न कि जिससे बजान आकर आप लोगों ने तनासुख तराशा था इसी तरह बहाल रहा. इस प्रश्‍न से बचने की गरज से आप लोगों ने पुनर्जन्‍म (पूर्व कर्म) का बदला माना था जिस मनुष्‍य ने जो कुछ पहली योनि में किया वहीं इसको वहां मिलता है और जो कुछ यहां करता है वह किसी दूसरी योनि में मिलेगा लेकिन आर्य मुसाफिर का उक्‍त कथन कहा रहा है कि मनुष्‍य शरीर भोग योनि नहीं जिसको दूसरे शब्‍दों में यूं कहें कि मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए प्रस्‍तावित नहीं हुआ बल्कि आत्‍माओं की असल मंजिल है. जब ही तो आपकी मिसाल कै़दी वाली सही होगी तो अब बतलाइये लंगड़ा लंगड़ा क्‍यों हुआ और कोढ़ी कोढ़ी क्‍यों हुआ और अन्‍धा अन्‍धा क्‍यों हुआ. अगर घबराकर कहें कि पिछले कर्मों का बदला है तो गलत, जबकि मनुष्‍य योनि भोग योनि नहीं तो इस योनि में पहले जुर्मों की सजा़ कैसी. अरबी मिसल (कहावत) निःसंदेह सच है (अर्थ)- ‘’मेंह से भाग कर परनाले के नीचे आ खडा़ हुआ.’’
2.                  सही बात तो यह है कि जिस मुजरिम को सजा़ देकर उसकी असली हालत की तरफ़ फैरना हो उसको सजा़ का ज्ञान भी होना चाहिए कि यह सजा़ म़ुझको अमुक पाप के बदले में मिली है ताकि भविष्‍य में इस पाप से बचे. इसी प्रकार अगर मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए है तो हैवानों (पशुओं) को भी उस जुर्म की ख़बर होनी चाहिए कि अमुक जुर्म की के कारण मुझे सजा़ मिली है ताकि इस सजा़ के पूरी करने के बाद मनुष्‍य शरीर में आकर वैसे जुर्म न करे. लेकिन इसकी विपरीत हम देखते हैं कि किसी आर्य को खबर नहीं कि पहले वह किस हैवान (कुत्‍ते, बिल्‍ले, घोड़े, बैल) की योनि में था और किस जुर्म की सजा़ का बदला था.


3.                  अगर मनुष्‍य दुष्‍कर्म की सजा़ भुगत कर अपनी वास्‍तविक हालत की तरफ ही आता है तो बेचारे अन्‍धे, कोढ़ी, भिक्षु, गरीब, फाके पर फाके उठाने वाले क्‍या हमेशा उसी हालत में रहेंगे और हमेशा से उसी हालत में हैं क्‍योंकि आपके कथनानुसार जिस दर्जा जिस्‍मानी (शरीर के रूप) से पतन हुआ था उसी रूप में इन्‍तका़ल (स्‍थानान्‍तरण) किया जाता है तो क्‍या उन असहायों की आत्‍मा ने कोई शपथ पत्र लिख दिया हुआ है कि हमें यही हालत पसन्‍द है.
4.                  अगर मनुष्‍य शरीर भोग योनि और जुर्मों के लिए सजा़खाना है तो आप लोगों को मुसलमानों और अन्‍य मांसाहारी कौ़मों का शुक्रगुजा़र होना चाहिए जो जानवरों को जिब्‍ह करके बहुतेरे आर्यों के भाई-बन्‍दों की निजात(मोक्ष)कराते हैं या कराने के सबब हैं.


5.                  अगर इस मनुष्‍य शरीर में आत्‍मा अपने असली तका़जा़ को पूरा न करेगी तो कौन से शरीर में करेगी, हालांकि हम देखते हैं कि बहुत से लोगों को सांसारिक निषिद्वों के अतिरिक्‍त प्राक्रतिक निषिद्व भी होते हैं. उदाहरणस्‍वरूप- आंख से अन्‍धा होना या कान से बहरा होना या किसी ऐसे निर्धन के घर में पैदा होना जहां वह सिवाय पेट पालने के (वह भी भीख मांगने और पाखा़ना उठाने से) कुछ कर ही नहीं सकते.


6.                  अगर मनुष्‍य का शरीर वास्‍तविक है और जिस शरीर से स्‍थानान्‍तरण होता है उसी शरीर में आत्‍मा आती है तो अवयस्‍क बच्‍चे क्‍या इसी तरह मरते रहेंगे और उनकी आत्‍माऐं हमेशा से इसी तरह छोटी उम्र में बल्कि कुछ मां के पेट में हो शरीर छोड़ती आयी हैं. अगर उल्लिखित दर्जा शरीर का अर्थ यह बतलाओ कि अमीरी और गरीबी की दशा से तात्‍पर्य है और तो फिर वही सवाल होगा कि गरीब, बदमाश, भंगड़ जो निर्धनता के कारण समस्‍त बुरे कर्म कर गुजरते हैं यही उनके लिए वास्‍तविक रूप है तो इन बेचारों की कैसी शामत आयी है कि एक तो निर्धनता और असमर्थता के बद कर्म करने पर सांसारिक हाकिम उनको कै़द करें और फिर वहां से ख़लासी (मोक्ष) पाकर भी आयें तो फिर वही नादारी और गरीबी के शरीर में परमेश्‍वर उनको ठूसें. फिर इसी तरह हमेशा तक उनकी बुरी गत होती रहे और अगर यह नेक भी हों तो क्‍या फा़यदा जबकि थोडे़ गुनाह पर भी है बाकी़ शरीर में कै़द होना और वहां से छूटकर वास्‍तविक हालत (गरीबी और मुहताजी) में आना है तो क्‍या नतीजा होगा इससे बहतर है कि इस बेचारी आत्‍मा को जो बकौ़ल आपके खुदा की पैदाइश भी नहीं. इस चन्‍द रोज़ की जि़न्‍दगी के अहसानों के बदले में (जो इस गरीबी) और मुहताजी की हालत में खुदा ने उन पर किये थे और दर-दर भीख मंगाई थी, उनसे दुगने चौगने बरस कै़द कर लिया जाता और फिर हमेशा के लिए इस कमबख्‍त़ को रिहाई होती और अपनी कमाई से आप गुजा़रा करती और ऐसे खुदा को दूर से सलाम कहती. सच पूछो तो खुदा अगर उसे छोड़ दे तो कभी भी खुदा के सामने न आवे और एक ही बार के आजमाने पर उसके बुलाने पर भी दूर से उसको लिख भेजे- (अर्थ)’’आज़माए हुए को आज़माने से निदामत (शर्मिन्‍दगी) हासिल होती है.’’


7.                  अगर मनुष्‍य शरीर आत्‍माओं के लिए असल है और हैवानी शरीर कै़दखा़ना तो बतलाइये यदि एक हजार या कम से कम सौ साल तक तमाम मख़लूक (जीव) नेक काम करे और कोई ऐसा काम न करे जिससे वह लायके़ सजा़ (सजा़ योग्‍य) हो तो उनकी दीनदारी के यह तो हैवानात (पशुओं) के शरीर में जाने से रहे हों. अल्‍बत्‍ता हैवानात अपनी-अपनी कै़द भुगत कर वास्‍तविक हालत (मनुष्‍य शरीर) की तरफ आवेगी जिसकी वजह से हैवानात में एक रोज़ ऐसी कमी होगी कि हमारी सवारी के लिए कोई घोड़ा, दूध के लिए कोई गाय और शहद के लिए कोई मक्‍खी भी न मिलेगी. क्‍या फिर इन बेचारे नेकियों का जो कई सालों तक नेकी के कामों में लगे रहे, यही इनाम होना चाहिए था जो आराम उनको बदकारी (दुष्‍कर्म) में था. गाड़ी सवारी को, गाय भैंस दूध पीने को, जानवर बोझदारी को वह भी हाथ से जाते रहे, बल्कि बगै़र देखे तो कुल इन्तिजा़म-ए-आलम (सम्‍पूर्ण स्रष्टि के प्रबन्‍धन) में अन्‍तर आ गया.


8.                  शाब्दिक परिवर्तन से हम यह भी कह सकते हैं कि अगर हैवानी शरीर भोग योनि है तो हम फर्ज़ करते हैं कि तमाम दुनिया में दो सौ साल तक तमाम लोग बदकार गददार (जैसा कि आजकल सामान्‍यत हैं) बलात्‍कारी, शराबी कुल के कुल इसी किस्‍म के हो रहे है. जिनमें से कोई भी मनुष्‍य शरीर के योग्‍य न हो तो बताइये तमाम दुनिया का इन्तिजाम कैसे होगा ? जबकि सारे ही जीव (रूह) अपनी बदकारी के कारण हैवानी शरीर में चले गये और एक रोज़ ऐसा आ पहुंचा कि सब के सब हैवानात हो गये और मनुष्‍य एक भी न हो तो नतीजा बुद्विजीवी सोच लें.

रूपान्‍तरितमसअला तनासुख (उर्दू)
लेखक- मौलाना अबुल वफा़ सनाउल्‍लाह अमरतसरी (रहमतुल्‍लाह)

पुनर्जन्‍म सिद्धांत

      पुनर्जन्‍म सिद्धांत सर्वमान्‍य सिद्धांत के रूप में माना जा रहा है׀ हिन्‍दुओं के ईश्‍वरीकृत वेदों में मूलतः पुनर्जन्‍म का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं है׀ यह बाद की कल्‍पना है׀ हिन्‍दुओं के घर में हर वाद पर विवाद है׀ पुनर्जन्‍म के साथ भी विरोधावास है׀ हिन्‍दुओं के धार्मिक ग्रन्‍थों में और सामान्‍य धार्मिक विश्‍वासों में और विशेषकर गरूड़ पुराण में स्‍वर्ण-नरक को भी मान्‍यता है׀ मरने वाले के लिए अनिवार्यतः स्‍वर्गवासी शब्‍द का प्रयोग हिन्‍दुओं में किया जाता है׀ गीता में जहां मृत्‍यु को पुराने वस्‍त्र त्‍याग और उसके बाद नए वस्‍त्र के रूप में अन्‍य जीवन धारण बतलाकर अर्जन को इस शरीर की नश्‍वरता का ज्ञान कराया गया है वहीं इसी गीता में अर्जुन को प्रभावी ढंग से उदबोधन हेतु कहा गया है कि अगर मरोग तो स्‍वर्ग में जाओगे और जीतोगे तो राज्‍य भोगोगे׀ इससे यह सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म और आवागमन सिद्धांत के बावजूद हिन्‍दुओं के साथ धार्मिक और नैतिक रूप से स्‍वर्ग-नरक का विश्‍वास भी सामान्‍यतः जुड़ा़ हुआ है׀ गीता की उपरोक्‍त उक्ति से यह भी सिद्ध होता है नैतिकता के लिए प्रेरणा स्‍वर्ग-नरक के विश्‍वास से ही संभव है׀ आखिर गीता का उद्देश्‍य अर्जुन को निमित्‍त मात्र बनाकर मानव को नैतिक कार्य के लिए प्रेरित ही तो करना था और इसके लिए कृष्‍ण ने स्‍वर्ग की उपलब्धि को ही मात्र उपाय समझा׀ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म हिन्‍दू दर्शन का एक दार्शनिक सिद्धांत भले ही हो, लेकिन धार्मिक मान्‍यता स्‍वर्ग-नरक की ही है׀ पुनर्जन्‍म का सिद्धांत तर्क शास्‍त्र के भी विपरीत है׀ कहा जाता है कि यह कलियुग है और पाप बढ़ता जा रहा है׀ सत्‍ययुग में पाप कम होते थे׀ साथ ही साथ यह भी कहा जाता है कि पुण्‍य से ही मनुष्‍य योनि प्राप्‍त होती है और पाप से पशु योनि׀ यदि ऐसा है तो आजकल जब कलियुग है और पाप चरम सीमा तक बढ़ रहे हैं, नित्‍य मनुष्‍यों की आबादी कैसे बढ़ रही है? जब पानी इसी जन्‍म में किए हुए पाप का अहसास नहीं करता तो पूर्वजन्‍म का उसे कैसे अहसास कराया जा सकता है? कदापि नहीं׀ तब इस परिस्थिति में पुनर्जन्‍म का सिद्धांत व्‍यर्थ और अनुपयोगी है׀ यह नैतिक शास्‍त्र के भी विरूद्ध है׀ मान लीजिए कि किसी का नौजवान पुत्र मर जाए और हमें वहां शोक सान्‍त्‍वना देने के लिए जाना पड़े तो क्‍या हम उस दुःखी पिता से यह कहें कि पुनर्जन्‍म में आपने किसी के पुत्र की हत्‍या की थी׀ दुःख में स्‍वयं को और दूसरों को सान्‍त्‍वना इसी कथन और विश्‍वास में निहित है कि धीरज रखिए׀

लेखक- श्री राजेन्‍द्र नारायण लाल ('इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय जीवन व्‍यवस्‍था')


आवागमन के तीन विरोधी तर्क (दलीलें)

इस क्रम मे सबसे बड़ी बात यह है कि सारे संसार के विद्वानों और शोध कार्य करने वाले साइंस दानों का कहना है कि इस धरती पर सबसे पहले वनस्पति जगत ने जन्म लिया। फिर जानवर पैदा हुए और उसके करोड़ों वर्ष बाद इन्सान का जन्म हुआ। अब जबकि इंसान अभी इस धरती पर पैदा ही नही हुए थे और किसी इन्सानी आत्मा ने अभी बुरे कर्म नहीं किए थे तो किन आत्माओं ने वनस्पति और जानवरों के शरीर में जन्म लिया?
दूसरी बात यह है कि इस धारणा का मान लेने के बाद यह मानना पड़ेगा कि इस धरती पर प्राणियों की संख्या में लगातार कमी होती रहे। जो आत्मायें मोक्ष प्राप्त कर लेंगी। उनकी संख्या कम होती रहनी चाहिये। अब कि यह तथ्य हमारे सागने है कि इस विशाल धरती पर इन्सान जीव जन्तु और वनस्पति हर प्रकार के प्राणियों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
तीसरी बात यह है कि इस संसार में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या में ज़मीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है। मरनेवाले मनुष्य की तुलना में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। कभी-कभी करोड़ो मच्छर पैदा हो जाते है जब कि मरने वाले उससे बहुत कम होते है। कहीं-कहीं कुछ बच्चों के बारे में यह मशहूर हो जाता है कि वह उस जगह को पहचान रहा है जहा वह रहता था, अपना पुराना, नाम बता देता है। और यह भी कि वह दोबारा जन्म ले रहा है। यह सब शैतान और भूत-प्रेत होते हैं जो बच्चों के सिर चढ़ कर बोलते है और इन्सानों के दीन ईमान को खराब करते हैं।
सच्ची बात यह है कि यह सच्चाई मरने के बाद हर इन्सान के सामने आ जायेगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने मालिक के पास जाता है, और इस संसार मे उसने जैसे कर्म किये है उनके हिसाब से सज़ा अथवा बदला पायेगा।
कर्मो का फल मिलेगा
यदि वह सतकर्म करेगा भलाई और नेकी की राह पर चलेगा तो वह स्वर्ग में जायेगा। स्वर्ग जहाँ हर आराम की चीज़ है। और ऐसी-ऐसी सुखप्रद और आराम की चीज़ें है जिनकों इस संसार में न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी दिल में उसका ख़्याल गुजारा। और सबसे बड़ी जन्नत (स्वर्ग) की उपलब्धि यह होगी कि स्वर्गवासी लोग वहॉ अपने मालिक के अपनी आँखों से दर्शन कर सकेंगे। जिसके बराबर विनोद और मजे़ कोई चीज नहीं होगी।
इस प्रकार जो लोग कुकर्म (बुरे काम) करेंगे, पाप करके अपने मालिक की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, वह नरक मे डाले जायेगे, वह वहॉ आग में जलेंगे। वहॉ उन्हें हर पाप की सज़ा और दंड मिलेगा। और सब से बड़ी सजा यह होगी कि वह अपने मालिक के दर्शन से वंचित रह जाऐगे। और उन पर उनके मालिक का अत्यन्त क्रोध होगा।­


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