रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कब्र परस्‍त मुशरिक

(तर्जुमा) और वह दिन भी काबिले जिक्र (वर्णनीय) है जिस दिन हम उनको सब को जमा करेंगे फिर मुशरिकीन से कहेंगे कि तुम और तम्‍हारे शरीक अपनी जगह ठहरो फिर हम उनके आपस में फूट डाल देंगे और उनके वह शुरका कहेंगे कि तुम हमारी इबादत नहीं करते थे सो हमारे तुम्‍हारे दरमियान गवाह के तौर पर अल्‍लाह काफी है, कि हमको तुम्‍हारी इबादत की खबर भी न थी.
व्‍याख्‍या ः- यह आयत इस बात पर स्‍पष्‍ट उदाहरण है कि मुशरिकीन जिनको मदद के लिए पकारते थे वह महज पत्‍थर की मूर्तिया नहीं थीं (जिस तरह कि आज कल के कब्र परस्‍त अपनी कब्र परस्‍ती को जाइज साबित करने के लिए कहते हैं कि इस किस्‍म की आयतें तो बुतों के लिए हैं) बल्कि वह अक्‍ल व शुऊर रखने वाले अफराद ही होते थे जिनके मरने के बाद लोग उनके मजस्‍समे और बुत बना कर पूजने शुरू कर देते थे,जिस तरह कि हजरत नूह अलैहिस्‍सलाम की कौम के तर्जे अमल से भी साबित है जिसका खुलासा सहीह बुखारी में मौजूद है. दूसरा यह भी मालूम हुआ कि मरने के बाद इंसान कितना भी नेक हो, हत्‍ता कि नबी व रसूल हो, उसे दुनिया के हालात का इल्‍म नहीं होता. उसके ताबेदार और मुरीद उसे मदद के लिए पुकारते हैं उसके नाम की नज्र व नियाज देते हैं,उसकी कब्र पर मेले-ठेले का इन्तिजाम करते है, लेकिन वह बेखबर होता है और उन तमाम चीजों का इंकार ऐसे लोग कियामत वाले दिन करेंगे. यही बात सूरह अहकाफ आयत नं0 5-6 में भी बयान की गई है.

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