(तर्जुमा) मेरे बन्दों की एक जमात थी जो बराबर यही कहती रही कि ऐ परबरदिगार हम ईमान ला चुके हैं तो हमें बख्श और हम पर रहम फरमा, तू सब महरबानों से ज्यादा महरबान है. तुम उन्हें मजाक में ही उ.डाते रहे यहां तक कि तुमको मेरी यद भी भुला दी और तुम उनसे मजाक ही करते रहे, मैंने आज उन्हें उनके सब्र का बदला दे दिया है कि वह खातिर ख्वाह अपनी मुराद को पहुंच चुके हैं (सरह मोमिनून 109-111).
तफसीर ः- दुनिया में अहले ईमान के लिए एक सब्र आजमा दौर यह भी होता है कि वह जब दीन व ईमान के तकाजों पर अमल करते हैं तो दीन से ना आशना (अनभिज्ञ) और ईमान से बेखबर लोग उन्हें मजाक और मलामत (व्यंग्य व निंदा) का निशाना बना लेते हैं. कितने ही कमजोर ईमान वाले हैं कि वह इन मलामतो से डर कर बहुत से अल्लाह के अहकामात पर अमल करने से गुरेज करते हैं, जैसे दाढी है, पर्दे का मसअला है, शादी व्याह की हिन्दुवाना रस्मों से इज्तिनाव है, बगैरह बगैरह. खुश किस्मत हें वह लोग जो किसी भी मलामत की परवाह नहीं करते और अल्लाह और रसूल की इताअत-फरमा बरदारी से किसी भी मौके पर इन्हिराफ (मुंह नहीं मोडते) (ला यखाफू-न लो म-त ला इम) अल्लाह तआला कियामत वाले दिन उन्हें इसकी बहतरीन जजा अता फरमायेगा और उन्हें कामियाबी से सरफराज करेगा जैसा कि इस आयत से वाजेह है.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें