एक मुसलमान का ईमान है कि अच्छे कामों का प्रचार करना और बुरे काम मिटाना उस वक्त जरूरी हो जाता है जब नेकी मादूम (समाप्त) हो रही हो और बुराई फैल रही हो׀ विशेषत उन लोगों पर जो इसकी सामर्थ्य रखते हों׀ वास्तव में अल्लाह पर ईमान के बाद दीनी जिम्मेदारियों में यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है׀ अल्लाह तआला ने इन पवित्र शब्दों में इसका जिक्र कुरआन में फरमाया है कि- ‘’तुममें से एक ऐसी जमात जरूर रहे जो अच्छाई की दावत दे,नेकी का हुक्म करे और बुरे काम से राके और यही लोग कामयाब हैं׀’’(3׀104)और कुरआन में एक जगह फरमाया ‘’मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें एक दूसरें के साथी हैं, अच्छाई का हुक्म करते हैं और बुराई से रोकते हैं, नमाज काइम करते हैं, जकात की अदायगी करते और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करते हैं׀(9׀71)
हदीस- तुममे से जो व्यक्ति किसी बुराई को देखे तो चाहिए कि उसे हाथ से रोक दे׀ अगर इसकी भी ताकत (सामर्थ्य) नहीं है तो जबान से रोके׀ अगर इसकी भी ताकत न हो तो दिल से इसको (बुराई को) बुरा समझे और यह ईमान का कमजोर तरीन दर्जा है׀ (सहीह मुसलिम)
हदीस- धरती पर अल्लाह की एक हद को काइम (स्थापित) करना, वहां के इंसानों के लिए चालीस दिन की बारिश से बहतर है ( सुनन निसाई)
हदीस- जब एक फाजिर (दुराचारी) आदमी मर जाता है तो बन्दे ही इससे राहत महसूस नहीं करते, शहर भी पेड़ और जानवर भी आराम पाते हैं׀ (सहीह बुखारी, सहीह मुसलिम)
यकीनन अल्लाह तआला खास लोगों के आम (गुनाहों) की वजह से आम लोगों को अजाब नहीं देता, यहां तक कि जब आम लोगों का हाल यह हो जाय कि वह बुराई अपने दरम्यान (मध्य) होते देखें और वह पर नकीर करने पर कादिर (मना करने की सामर्थ्य रखते) हों लेकिन वह इसे आलोचना का निशाना न बनायें׀ जब ऐसा होने लगे तो अल्लाह तआला का अजाब आम और खास सब लोगों को अपनी लपेट में ले लेता है׀ एक दूसरी रवायत में इस फरीजे (कर्तव्य) के छोड़ने पर यह चेतावनी दी गई है कि तुम अल्लाह के अजाब के मुस्तहिक बन जाओगे׀ फिर अल्लाह तआला से दुआयें भी मांगोगे तो कुबूल नहीं होंगी׀ (हदीस मुस्नद अहमद जिल्द 5) इस हकीकत को नबी (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने एक मिसाल के जरिये से भी स्पष्ट किया׀
आपने (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ‘अल्लाह की हदों में मुदाहिनत (नरमी और दरगुजर) करने वाले और हदों (सीमाओं) को तोड़ने वाले की मिसाल उस कौम की सी है, जिन्होंने एक (दो मंजिला किश्ती) में सफर करने के लिए कुरआ अंदाजी की, कुछ के हिस्से में ऊपरी मंजिल और कुछ के हिस्से में निचली मंजिल आई׀ निचली मंजिल वाले पानी लेने के लिए ऊपरी मंजिल पर आते और उस हिस्से में बैठे हुए लोगों के पास से गुजरते तो वह तकलीफ महसूस करते, चुनांचे निचली मंजिल वालों ने कुल्हाड़ा पकड़ कर किश्ती में सूराख करना शुरू कर दिया ताकि नीचे से ही पानी ले लें और ऊपर जाने की जरूरत पेश न आये׀ सूराख करने की आवाज सुनकर ऊपर वाले आये और पूछा, तुम क्या कर रहे हो ? उन्होंने कहा, हम पानी लेने ऊपर जाते है तो तुम ना-गवारी (असहज) महसूस करते हो, चुनांचे हम नीचे ही सूराख करने लगे हैं, क्योंकि पानी के बगैर तो चारा नहीं׀ (नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया) अगर वह उसी वक्त उनका हाथ पकड़ लें और सूराख से रोक दें तो वह सूराख करने वालों को भी बचा लेंगे और अपने को भी बचा लेंगे और अगर वह उनको अपने हाल पर ही छोड़ देंगे तो उनको भी हलाक कर देंगे और अपने को भी हलाक कर लेंगे׀ (हदीस-सहीह बुखारी)
तजरबा और अनुभव से साबित है कि अगर बीमारी का इलाज न किया जाय तो वह शरीर में फैल जाती है और फिर उसका इलाज मुश्किल हो जाता है׀ इसी तरह बुराई को अगर शूरू से ही न खतम किया जाय और उसे समाज में फैलने दिया जाय और छोटे बड़े उसकी आदी हो जायें तो फिर उसे मिटाना और उसका समाधान मुश्किल हो जाता है और अन्ततः अल्लाह का अजाब (आपदायें) नाजिल होता है׀ यह ईश्वरीय विधान है इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता जैसा कि अल्लाह अपने कलाम (कुरआन) में फरमाता है ‘’यह अल्लाह का कानून है जो पहली कौमों में गुजर चुका है, और अल्लाह का कानून में तू हरगिज तब्दीली न पायेगा׀’’
यह भी तजुर्वा है कि अगर किसी मकान की सफाई न की जाय और उसमें से कूड़ा- करकट दूर न फेंका जाय तो कुछ समय बाद वह जगह रहने के काबिल नहीं रहती, उसका वातावरण दूषित और नफरत अंगेज हो जाता और उसमें बीमारी फैलाने वाले खूब जीवाणु पनपने लगते हैं, क्योंकि मेल-कुचेल और गन्दगी की बहुतात का नतीजा यही होता है׀ इसी प्रकार इस्लामी सोसायटी में बुराई को पनपने दिया जाय और अच्छाई का प्रचार न हो तो कुछ अर्से बाद लोग पाशविक और शैतानी प्रव़त्ति के हो जायेंगे׀ अच्छाई और बुराई का अन्तर समाप्त हो जायेगा और फिर उन्हें जिन्दा रहने का कोई हक अल्लाह की इस जमीन पर नहीं होगा׀ विभिन्न प्रकार के निमित्त द्वारा अल्लाह तआला उन्हें तबाह व बरबाद कर देगा׀
दुआ- अल्लाह तआला नेकियों की तौफीक दे और हर बुराई से महफूज रखे, आमीन׀
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