जाली दीन की नमाज का एक मंजर
एक बादशाह ने हनफियत से तौबा कर ली.
किताब ‘हयातुल हैवान अल कुबरा’ प्रकाशित मिस्र जिल्द 2 पेज 214 में है (अरबी मतन का तर्जुमा) बादशाह सुल्तान महमूद इमाम अबू हनीफा के मजहब पर था׀ और वह इल्म हदीस की हिस रखता था׀ मशाइख से हदीस सुनता और प्रश्न किया करता था׀ इस प्रकार अक्सर हदीस को उसने शाफई मजहब के अनुसार पाया और उसने फुकहा को जहमा किया और उसने एक मजहब के दूसरे मजहब पर प्राथमिकाता का आग्रह किया׀ तो इस बात पर सब का इत्तिफाक हुआ कि दोनों मजहब के अनुसार दो दो रकात नमाज पढी जाया इस प्रकार उस नमाज में नजर व फिक्र् करने से जो मजहब अच्छा मालूम हो उसका अपना लेना चाहिये׀ इस प्रकार कफाल मिरवजी ने नमाज पढनी शुरू की तो वुजू को पूरी शर्तों से अदा किया और लिबास और इस्तकबाल किबला भी बखूबी किया और नमाज के अरकान और फर्ज व सुन्नतें और आदाब को अदा किया׀ और ऐसी नमाज पढी जिससे कमी करना इमाम शाफई के नजदीक दुरूस्त नहीं׀ फिर और दो रकात इस तौर से अदा कीं जो इमाम अबू हनीफा के नजदीक हों׀ फिर दबागत दी हुई कुत्ते की खाल को पहन लिया और उसको चौथाई नजासत (गन्दगी) से आलजूदा किया और नबीज खजूर से वुजू किया चूंकि गर्मी का मौसम था इसलिए मक्खियां और मच्छर जमा हो गये׀ और बे सुन्नियत के वुजू किया और वुजू भी उल्टा किया׀ यानी पहले बाया पैर धोया फिर दाया पैर फिर बायां हाथ धोया फिर दायां हाथ, फिर चौथाई सर का उल्टा मसह किया, फिर उल्टा मुंह धोया, फिर तीन बार नाक में पानी दिया, फिर तीन बार कुूल्ली की, फिर हाथ धोये, नमाज में दाखिल हुए तो बजाय तकबीर के फारसी जबान में कहा खुदाए बुजुर्ग अस्ता फिर किरात की तो बजाय ‘’मुदहाम्मतान’’ के फारसी में कहा, वह बुजुर्ग सब्ज, फिर बजाय सजदों के मुर्गग् की तरह बगैर फर्क के दो ठोंगे मारीं और तशहहुद पढा, गोज मार दिया और नमाज से बग़ैर सलाम के निकला׀ और कहा ए बादशाह यह नमाज इमाम अबू हनीफा की है׀ बादशाह ने कहा अगर इस तरह की नमाज अबू हनीफा की न हुई तो मैं तुझको कत्ल कर डालूंगा׀ इसलिए कि ऐसी नमाज तो कोई साहबे दीन जाइज न रखेगा׀ और फिर हनफियों ने अबू हनीफा की तरह इस तरह नमाज होने से इंकार कर दिया׀ तो कफाल मिरवजी ने हनफी मजहब की किताबें तलब कीं ׀ बादशाह ने मंगवादीं׀ और एक नसरानी आलिम को बुंलाया और इसको शाफई मजहब की किताबें पढने का हुक्म दिया हतो अबू हनीफा के मजहब की नमाज वैसी ही पाई गई जैसी कफाल मिरवजी ने पढ्कर दिखाई थी׀ तो बादशाह ने इमाम अबू हनीफा के मजहब को छोड दिया और इमाम शाफई के मजहब को अपना लिया׀
तो ऐ हनफ़ी भाइयो! अगर आपको क़फ़ाल मिरवजी की नमाज़ के मताल्लिक़ तसल्ली करना है तो मसाइल उपरोक्त का हवाले यहां बग़ौर मुलाहज़ा फ़रमायें और इसके बाद चाहें तो मिस्ल सुल्तान महमूद के इस मज़हब को खैर बाद कह दें, वरना कम से कम इसकी तस्दीक़ कर दें.
1. बे तरतीब वजू करे (पहले पांव धोए फिर मुंह फिर कुल्ली बग़ैरह) तो जाइज़ है.(हिदायाजिल्द 1/32,33)
2. भीगे हुए छुआरे का पानी (नबीज़ तमर) जो शीरीं हो गया हो तो उससे वजू जाइज़ है. ( आलमगरी जिल्द 1/32)
3. पतली निजासत (आदमी का पेशाब) हथेली की गहराई के बराबर माफ़ है (दूर्रे मुख्तार जिल्द 1/167, आलमगीरी जिल्द 1/71, हिदाया जिल्द 1/288) जिन जानवरों का गोश्त हलाल है उनके पेशाब में चौथाई से कम कपड़ा भर जाय तो माफ़ है. (दुर्रे मुख्तार जिल्द 1/168, आलमगीरी जिल्द 1/71, शरह वकाया69)
4. कुत्ते की हडडी और बाल और पटठे पाक हैं और कुत्ते की खाल का डोल और जाए नमाज़ बनाना जाइज़ है (दुर्रे मुख्तार 1/118,119, हिदाया 1/135) सुअर की खाल के सिवा हर जानवर की खाल दबाग़त से पाक हो जाती है (दुर्रे मुख्तार 1/117) आदमी की खाल दबागत से पाक हो जाती है. कुत्ते और हाथी की खाल दबाग़त से पाक हो जाती है (दुर्रे मुख्तार 1/117)
5. शूरू करना नमाज़ का सिवाय अरबी के दुरूस्त है, बजाय अल्लाहुअक्बर के अल्लाहु कबीर या अल्लाह किबार कहना जाइज़ है. बजाय अल्लाहुअक्बर के अल्हम्दु लिल्लाह या तबारकल्लाह कहे तो जाइज है. बजाय अल्लाहुअक्बर के सुब्हानल्लाह या ला इलाह इल्लल्लाह कहे तो जाइज़ है. अल्लाहुअक्बर का तर्जुमा फारसी में पढ़े तो जाइज है. नमाज़ के सब अज़कार और खुतबा व सना बगैरह हर ज़बान में दुरूस्त हैं. (दुर्रे मुख्तार, आलमगीरी) सब अज़कार सिवाय कि़रात के बावजूद अरबी जानने के ग़ैर जबान में जाइज़ हैं. (दुर्रे मुख्तार 1/247, हिदाया 1/449)
6. सलाम के वक्त क़सदन हदस करे (हवा ख़ारिज करे) तो नमाज़ फ़ासिद नहीं होगी, सलाम फैरने की भी जरूरत नहीं. (दुर्रे मुख्तार, हिदाया 620, शरह वकाया)
Assalam walaikum Bhai mujhe hayatul haywan kitab hindhi chahiye rahitho bhejiye
जवाब देंहटाएं