हनफिया खुल्लम खुल्ला सहीह हदीसों को नहीं मानते हैं
हनफी मजहब ‘तादीले अरकान’ (अरकाने नमाज का ठीक तरह से अदा करने) की हदीसों को भी नहीं मानता׀ हदीस में साफ साफ है कि नमाज के हर हर रूक्न में इत्मीनान वाजिब है׀ नमाज की सेहत और नमजा का होना इसी पर निर्भर है. अब इस सिलसिलें की हदीसें मुलाहिजा फरमाइये׀
हजरत अबू हुरेरा रजिअल्लाहो अन्हु बयान फरमाते है कि रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मसजिद के एक गोशे में तशरीफ फरमा थे कि एक शख्स मसजिद में दाखिल हुआ और नमाज पढी׀नमाज खतम करके वह आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर हुआ और सलाम अर्ज किया, आपने इसके सलाम का जवाब दिया और फरमाया जाओ फिर से नमाज पढो, तुमने नमाज नहीं पढी׀ वह गया और फिर वैसी ही नमाज पढी और फिर हाजिरे खिदमत होकर सलाम अर्ज किया׀ फिर आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उसके सलाम का जवाब दिया और फरमाया जाओ फिर से नमाज पढो, तुमने नमाज नहीं पढी׀ जब तीसरी बार आपने सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फिर यही फरमाया तो उसने अर्ज किया या रसूल अल्लाह मुझे सिखा दीजिए कि मैं किस तरह नमाज पढा करूं׀ इस पर आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जब तुम नमाज के लिए खडे हो तो पहले अच्छी तरह से कामिल वुजू करो, फिर किबला रूख खडे होकर अल्लाहु अकबर कहो, फिर कुरआन मजीद में से जो तुम्हें याद हो पढो, फिर रूकू करो, और इत्मीनान से रूकू से सिर उठाओ यहां तक कि इत्मीनान से सीधे खडे हो जाओ, फिर सिजदा करो, फिर दूसरे सिजदा से सिर उठा कर इत्मीनान से बैठ जाओ, फिर तीसरी रकात के लिए सीधे खडे हो जाओ, इसी तरह से हर रकात और हर नमाज में करो׀ (संदर्भ- बुखारी शरीफ, प्रकाशित देवबन्द प़0 212 हदीस 744 व मुस्लिम शरीफ)
हजरत साबित बयान करते हैं कि अनस रजिअल्लाहो अन्हु हमारे सामने नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की नमाज की कैफियत बयान करते थे तो वह नमाज पढकर बताते थे जिस वक्त वह अपना सिर रूकू से उठाते थे खडे हो जाते थे यहां तक कि हम कहते कि यकीनन यह सिजदा करना भूल गये׀ (संदर्भ- बुखारी शरीफ, प्रकाशित देवबन्द प़0 213 हदीस 744 व मुस्लिम शरीफ)
हजरत अनस बिन मालिक कहते हैं कि मैं इस बात में कमी न करूंगा कि तुम्हें वैसी ही नमाज पढाऊ जैसी कि मैंने नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को नमाज पढते देखा है׀ साबित कहते हैं कि अनस बिन मालिक ऐसी बात करते थे कि मैंने तुम लोगों को वह अमल करते नहीं देखा वह जब अपना सिर रूकू से उठाते थे तो खडे हो जाते थे यहां तक कि कहने वाला कहता कि वह सिजदा करना भूल गये׀ और दोनों सिजदों के दरमियान में इतनी देर तक बैठे रहते कि देखने वाला समझता कि वह दूसरा सिजदा करना भूल गये׀
गये׀ (संदर्भ- बुखारी शरीफ, प्रकाशित देवबन्द प़0 218 हदीस 679 व सहीह मुस्लिम शरीफ जिल्द दौम प़ 62)
पाठकों देखा आपने सुकून और इत्मीनान से नमाज पढने की ताकीद में कितनी हदीसें आई हैं׀ इस सिलसिले में और भी बहुत सी हदीसें हैं लेकिन हमने यहां बुखारी व मुसलिम की चन्द हदीसें नकल की हैं׀ आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का साफ साफ हुक्म मौजूद है कि ऐसी नमाज ही नहीं होती जो इत्मीनान के साथ न पढी जाया लेकिन हनफिया इन तमाम अहादीसे रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम, फरामीने रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम और सुनने रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को नहीं मानते׀ क्योंकि इनका मजहब हनफी है׀ यह मजहब इस्लाम और इस्लाम के नबी की बातों को क्यों मानने लगे-
यह वह उम्मत है कि फरमाने नबी सुनकर कहे
मैं तो हनफी हूं न मानूंगा यह फरमाने हदीस
रूपान्तरण- असली इस्लाम क्या है और जाली इस्लाम क्या है׀ (उर्दू- लेखक अबूल इकबाल सलफी, इदारा दावतुल इस्लाम, मुम्बई से माखूज)
HANFIAS are good to their actions,but the writer of this article thinking as he likes.
जवाब देंहटाएंI think u r absolutely right........
जवाब देंहटाएंMr writer is right actually
जवाब देंहटाएंTo Mr writer---
जवाब देंहटाएंmy dear brother what amount of money you are getting from the dushmanan-e-islam...IS TARAH KI TAFREEQ AAP KYU DAAL RAHE HAIN... islam dil se hota hai na ki actions se, agar apke dil imaan se khali hain aur aap bade itminaan se namaaz ada kar rahe hain to aisi namaaz se tauba....
TERA IMAM BE SHAOOR, TERI NAMAAZ BE HUZOOR
AISI NAMAAZ SE GUZAR, AISE IMAAM SE GUZAR