शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

कब्र परस्‍ती

चन्‍द अहम सवाल
एक शख्‍स मुश्किल में है और वह अल्‍लाह के सिवा किसी ओर को पुकारना चाहता है जिसके बारे में यह मशहूर कर दिया गया है कि यह मुश्किल दूर कर सकते हैं׀  यानी कि जैसे लोग कहते हैं या अली कर मदद, या गौस कर मदद, बगैरह बगैरह ׀  अब जो शख्‍स मुश्किल में है वह हिन्‍दोस्‍तान में गौस पाक को पुकार रहा है और कुछ लोग पाकिस्‍तान में पुकार रहे हैं बांग्‍लादेश में पुकार रहे हैं, हजारों मील का फासला है׀  तो फिर सवाल यह पैदा होता है ׀
1. तो या गौस पाक या कोई भी नबी, वली और कोई भी बुजुर्ग उसकी आवाज को सुन सकते हैं, चलो हम यह भी मान लेते हैं, कि वे सुनते हैं, तो फिर सवाल यह पैदा होता है׀
2.    क्‍या वे दुनिया की हर भाषा जानते हैं ? क्‍योंकि इस दुनिया में हर तरह के बोलने वाले हैं, अमेरिकन अमेरिकी भाषा में पुकारेगा, पंजाबी पंजाबी भाषा में पुकारेगा, गुजराती-गुजराती भाषा में पुकारेगा, बगैरह बगैरह ׀  तो क्‍या वह दुनिया की हर भाषा जानते हैं ? चलो हम यह भी मान लेते हैं कि वह दुनिया की हर भाषा जानते हैं फिर एक मिनट में हजारों और सैंकडों लोग उनको पुकारते हैं, क्‍योंकि एक वक्‍त में कई लोगों को मुश्किल पेश आ सकती है׀  तो फिर यह सवाल पैदा होता है ׀
3.    क्‍या उस हस्‍ती को  जो जिन्‍दा है या मुर्दा उसे कभी नींद भी आती है या नहीं, या वह हमेशा जागते ही रहते हैं׀  अगर उन्‍हें नींद आती है तो फिर हमारे पास उनका टाइम टेबिल होना चाहिए कि वे कब सोते हैं कब जागते हैं׀  हमारे अल्‍लाह की शान तो यह है कि उसे न नींद आती है नींद तो नींद उसे ऊंघ तक नहीं आती׀  यह तो हमारे अल्‍लाह की शान है, लेकिन अल्‍लाह के सिवा जिसको यह पुकारना चाह रहा है, चाहे वह हस्‍ती जिन्‍दा हो या मुर्दा उन्‍हें कभी नींद नहीं आती अगर कभी नींद आती है तो हमारे पास एक लिस्‍ट होनी चाहिए कि वे कब सोते हैं और जाग रहे होते हैं, ताकि हम अपनी मुश्किल को उस वक्‍त पेश करें जब वे जाग रहे हों, उनको नींद में हम परेशान न करें, या फिर वह बतलाया जाय कि उन्‍हें कभी नींद ही नहीं आती, और जिसे कभी नींद ही नहीं आती वह कौन है, अल्‍लाह है׀  तो फिर यह सवाल पैदा होता है ׀
4.    एक शख्‍स गूंगा है, या कोई इंसान ऐसी मुश्किल में फंसा हुआ है, कि उसका गला बन्‍द है, आवाज नहीं निकल रही है, अगर वह दिल में अपनी मुश्किल अल्‍लाह के सिवा किसी हस्‍ती के लिए पेश करता है जो जिन्‍दा है या मुर्दा׀  तो क्‍या वह हस्‍ती उसके दिल की फरियाद को सुन सकती है? अल्‍लाह की शान तो यह है कि जो तुम छुपाते हो या जो तुम जाहिर करते हो उसे भी अल्‍लाह जानता है׀  एक गूंगा पुकारना चाहे या अली कर मदद या गौस कर मदद तो उसकी आवाज नहीं निकलती दिल में कहेगा, तो क्‍या गौस पाक को इसकी भी खबर हो जाती है या जिन बुजुर्गों को लोग पुकारते हैं अगर यह अकीदा रखते हैं, तो बताओ वे मुसलमान हो सकते हैं׀  तो फिर यह सवाल पैदा होता है׀
5.    अगर अल्‍लाह तमाम मुश्किलों को हल कर सकता है और करता है तो फिर ये बताओ गैर के पास जाने की क्‍या जरूरत है׀  और अगर अल्‍लाह के सिवा कोई मुश्किलों को हल कर सकता है तो फिर बताओ अल्‍लाह की क्‍या जरूरत है׀  न-अऊजो बिल्‍लाह (अल्‍लाह की पनाह) यह यही साबित करना चाहते हैं कि कुछ मदद अल्‍लाह कर देता है और कुछ मदद यह कर देते हैं׀  तो फिर ये सवाल पैदा होता है׀
6.    अगर अल्‍लाह के सिवा जिसको यह पुकारते हैं चाहे नबी हो वली हो या पीर हो कोई भी हो, अगर जिसको ये मुश्किल कुशा(संकट मोचक) समझते हैं, हाजत रवा समझते हैं अगर तमाम मुश्किलों के हल करने पर कादिर हैं, या अगर तमाम मुश्किलों के हल करने पर कादिर नहीं है तो हो सकता है, कुछ मुश्किलों के हल करने का बेडा अल्‍लाह ने उठाया हो और कुछ दूसरों ने उठाया हो, तब भी हमारे सामने ऐसी सूरत में एक लिस्‍ट होनी चाहिए कि कौन सी मुश्किलें अल्‍लाह से हल करवाई जायें और कौन सी गैर अल्‍लाह से हल करवाये जायें׀  तो फिर ये सवाल पैदा होता है ׀
7.    क्‍या अल्‍लाह के सिवा जो हस्‍ती मुश्किल दूर कर सकती है, क्‍या वो मुश्किल में डाल भी सकती है, या उसकी डयूटी सिर्फ मुश्किलों को दूर करने पर है׀  हमने तो आज कल किसी को मुश्किल में डालते हुए नहीं सुना ׀ सबकों मुश्किल कुशा (संकट मोचक) ही कहते हुए सुना׀  अगर वह मुश्किल कुशा है, तो क्‍या वह मुश्किल में डालते भी हैं, अगर वो हस्‍ती मुश्किल हल कर सकती है तो मुश्किल में डालने वाला कौन है׀  न-अऊजो बिल्‍लाह इसका मतलब यह हुआ कि अल्‍लाह मुश्किल में डालता है, यह लोग मुश्किल से निकालते हैं, तो न-अऊजो बिल्‍लाह यह तो बडे हमदर्द हुए जालिम तो सबसे बडा अल्‍लाह हुआ׀  तो फिर यह सवाल पैदा होता है׀

8.    जाहिर है कि नतीजा यही निकलेगा कि अल्‍लाह तआला मुश्किल में डालने वाला है, और अल्‍लाह के सिवा जो हस्‍ती है जिनको ये लोग पुकारते हैं, वो मुश्किल हल करने वाले हैं׀  (अब यहां मानलो कि), एक हस्‍ती का काम मुश्किल डालने पर हो और दूसरी हस्‍ती का काम मुश्किल को दूर करने पर हो׀  तो दोनों हस्तियों में कौन जीतेगा, डालने वाला जीतेगा या हल करने वाला जीतेगा, यह तो लडाना हुआ, अल्‍लाह के मुकाबले में गैरों को׀  तो फिर यह सवाला पैदा होता है׀
9.    अगर किसी की नमाजे जनाजा हमें पढनी हो तो उसकी मगफिरत या  बख्शिश के लिए हम अल्‍लाह को पुकारेंगे या गैर अल्‍लह को पुकारेंगे׀  जब तुम मरने में अल्‍लाह को पुकारते हो तो जिन्‍दगी में अल्‍लाह को क्‍यों नहीं पुकारते׀
 ऐ अल्‍लाह हम सबको नेक अमल करने की तौफीक अता फरमा׀  कुरआन और सुन्‍नत पर अमल करने की तौफीक अता फरमा׀  हम सबकों नबी से सच्‍ची और पक्‍की मुहब्‍बत करने की तौफीक अता फरमा׀  शिर्क जैसे बदतरीन जुर्म से बचने की और शिर्क जैसे बडे गुनाह से तौबा करने की तौफीक अता फरमा׀  दुनिया के मुसलमानों को तौहीद के झन्‍डे को लहराने की तौफीक अता फरमा׀  आमीन या रब्‍बल आलमीन

कुरआन करीम के नवें पारे में सूरे आराफ की आयत नं0 196 में अल्‍लाह तआला इरशाद फरमाता है׀  तर्जुमा- (ऐ नबी आप कह दीजिए) बेशक मेरा मददगार तो सिर्फ अल्‍लाह है׀  (यानी मेरा दोस्‍त हिमायती और सर परस्‍त और मेरे सब काम बनाने वाला एक अल्‍लाह मुझको काफी है׀)
कुरआन करीम के छत्‍तीसवें पारे में सूरे काफ की आयत नं0 16 में अल्‍लाह तआला इरशाद फरमाता है׀  तर्जुमा- इन्‍सान को पैदा करने वाले सिर्फ हम हैं और उसके जी में जो ख्‍यालात आते हैं वो सब हमको मालूम हैं और हम तो इन्‍सान की गर्दन की रग से ज्‍यादा करीब हैं׀

कुरआन करीम के बीसवें पारे में सूरे नम्‍ल की आयत नं0 62 में अल्‍लाह तआला इरशाद फरमाता है׀  तर्जुमा- अल्‍लाह के सिवा वह कौन है? जो बेकस लाचार की पुकार को जब भी वह दुआ करे कबूल फरमा लेता है और मुसीबत से छुटकारे के रास्‍ते खोल देता है׀
हर मुसलमान सब नमाजों में और हर एक रकात में बार बार अल्‍लाह से वादा करता है कि (हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझ ही से मदद चाहते हैं. सूरे फातिहा आयत नं0 4)

रविवार, 18 सितंबर 2011

जाली दीन की नमाज का एक मंजर

जाली दीन की नमाज का एक मंजर
एक बादशाह ने हनफियत से तौबा कर ली.

किताब हयातुल हैवान अल कुबरा प्रकाशित मिस्र जिल्‍द 2 पेज 214 में है (अरबी मतन का तर्जुमा) बादशाह सुल्‍तान महमूद इमाम अबू हनीफा के मजहब पर था׀ और वह इल्‍म हदीस की हिस रखता था׀ मशाइख से हदीस सुनता और प्रश्‍न किया करता था׀ इस प्रकार अक्‍सर हदीस को उसने शाफई मजहब के अनुसार पाया और उसने फुकहा को जहमा किया और उसने एक मजहब के दूसरे मजहब पर प्राथमिकाता का आग्रह किया׀ तो इस बात पर सब का इत्तिफाक हुआ कि दोनों मजहब के अनुसार दो दो रकात नमाज पढी जाया इस प्रकार उस नमाज में नजर व फिक्र् करने से जो मजहब अच्‍छा मालूम हो उसका अपना लेना चाहिये׀ इस प्रकार कफाल मिरवजी ने नमाज पढनी शुरू की तो वुजू को पूरी शर्तों से अदा किया और लिबास और इस्‍तकबाल किबला भी बखूबी किया और नमाज के अरकान और फर्ज व सुन्‍नतें और आदाब को अदा किया׀ और ऐसी नमाज पढी जिससे कमी करना इमाम शाफई के नजदीक दुरूस्‍त नहीं׀ फिर और दो रकात इस तौर से अदा कीं जो इमाम अबू हनीफा के नजदीक हों׀ फिर दबागत दी हुई कुत्‍ते की खाल को पहन लिया और उसको चौथाई नजासत (गन्‍दगी) से आलजूदा किया और नबीज खजूर से वुजू किया चूंकि गर्मी का मौसम था इसलिए मक्खियां और मच्‍छर जमा हो गये׀ और बे सुन्नियत के वुजू किया और वुजू भी उल्‍टा किया׀ यानी पहले बाया पैर धोया फिर दाया पैर फिर बायां हाथ धोया फिर दायां हाथ, फिर चौथाई सर का उल्‍टा मसह किया, फिर उल्‍टा मुंह धोया, फिर तीन बार नाक में पानी दिया, फिर तीन बार कुूल्‍ली की, फिर हाथ धोये, नमाज में दाखिल हुए तो बजाय तकबीर के फारसी जबान में कहा खुदाए बुजुर्ग अस्‍ता फिर किरात की तो बजाय ‘’मुदहाम्‍मतान’’ के फारसी में कहा, वह बुजुर्ग सब्‍ज, फिर बजाय सजदों के मुर्गग् की तरह बगैर फर्क के दो ठोंगे मारीं और तशहहुद पढा, गोज मार दिया और नमाज से बग़ैर सलाम के निकला׀ और कहा ए बादशाह यह नमाज इमाम अबू हनीफा की है׀ बादशाह ने कहा अगर इस तरह की नमाज अबू हनीफा की न हुई तो मैं तुझको कत्‍ल कर डालूंगा׀ इसलिए कि ऐसी नमाज तो कोई साहबे दीन जाइज न रखेगा׀ और फिर हनफियों ने अबू हनीफा की तरह इस तरह नमाज होने से इंकार कर दिया׀ तो कफाल मिरवजी ने हनफी मजहब की किताबें तलब कीं ׀ बादशाह ने मंगवादीं׀ और एक नसरानी आलिम को बुंलाया और इसको शाफई मजहब की किताबें पढने का हुक्‍म दिया हतो अबू हनीफा के मजहब की नमाज वैसी ही पाई गई जैसी कफाल मिरवजी ने पढ्कर दिखाई थी׀ तो बादशाह ने इमाम अबू हनीफा के मजहब को छोड दिया और इमाम शाफई के मजहब को अपना लिया׀


तो ऐ हनफ़ी भाइयो! अगर आपको क़फ़ाल मिरवजी की नमाज़ के  मताल्लिक़ तसल्‍ली करना है तो मसाइल उपरोक्‍त का हवाले यहां बग़ौर मुलाहज़ा फ़रमायें और इसके बाद चाहें तो मिस्ल सुल्‍तान महमूद के इस मज़हब को खैर बाद कह दें, वरना कम से कम इसकी तस्‍दीक़ कर दें.
1. बे तरतीब वजू करे (पहले पांव धोए फिर मुंह फिर कुल्‍ली बग़ैरह) तो जाइज़ है.(हिदायाजिल्‍द 1/32,33)
2. भीगे हुए छुआरे का पानी (नबीज़ तमर) जो शीरीं हो गया हो तो उससे वजू जाइज़ है. ( आलमगरी जिल्‍द 1/32)
3. पतली निजासत (आदमी का पेशाब) हथेली की गहराई के बराबर माफ़ है (दूर्रे मुख्‍तार जिल्‍द 1/167, आलमगीरी जिल्‍द 1/71, हिदाया जिल्‍द 1/288) जिन जानवरों का गोश्‍त हलाल है उनके पेशाब में चौथाई से कम कपड़ा भर जाय तो माफ़ है. (दुर्रे मुख्‍तार जिल्‍द 1/168, आलमगीरी जिल्‍द 1/71, शरह वकाया69)
4. कुत्‍ते की हडडी और बाल और पटठे पाक हैं और कुत्‍ते की खाल का डोल और जाए नमाज़ बनाना जाइज़ है (दुर्रे मुख्‍तार 1/118,119, हिदाया 1/135) सुअर की खाल के सिवा हर जानवर की खाल दबाग़त से पाक हो जाती है (दुर्रे मुख्‍तार 1/117) आदमी की खाल दबागत से पाक हो जाती है. कुत्‍ते और हाथी की खाल दबाग़त से पाक हो जाती है (दुर्रे मुख्‍तार 1/117)
5. शूरू करना नमाज़ का सिवाय अरबी के दुरूस्‍त है, बजाय अल्‍लाहुअक्‍बर के अल्‍लाहु कबीर या अल्‍लाह किबार कहना जाइज़ है. बजाय अल्‍लाहुअक्‍बर के अल्‍हम्‍दु लिल्‍लाह या तबारकल्‍लाह कहे तो जाइज है. बजाय अल्‍लाहुअक्‍बर के सुब्‍हानल्‍लाह या ला इलाह इल्‍लल्‍लाह कहे तो जाइज़ है. अल्‍लाहुअक्‍बर का तर्जुमा फारसी में पढ़े तो जाइज है. नमाज़ के सब अज़कार और खुतबा व सना बगैरह हर ज़बान में दुरूस्‍त हैं. (दुर्रे मुख्‍तार, आलमगीरी) सब अज़कार सिवाय कि़रात के बावजूद अरबी जानने के ग़ैर जबान में जाइज़ हैं. (दुर्रे मुख्‍तार 1/247, हिदाया 1/449)
6. सलाम के वक्‍त क़सदन हदस करे (हवा ख़ारिज करे) तो नमाज़ फ़ासिद नहीं होगी, सलाम फैरने की भी जरूरत नहीं.    (दुर्रे मुख्‍तार, हिदाया 620, शरह वकाया)

वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता

जो इंसा को जीने का अंदाज सिखाता है
सांसों की आमद का गहरा राज बताता है
जो यह कहता है दुनिया कैसे ईजाद हुई
इस गलती से खारिज आदम की फरियाद हुई
जो यह कहता है दुनिया को सदा एक समझो
अपने एक होने में अल्‍लाह की सिर्फ रजा समझो
जो यह कहता है कि जो कुछ भी है फानी है
कहते हैं हम जिसे कयामत वह तो आनी है
कैसे होती सुबह कैसे शाम बताता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
जहां बुराई खतम , शुरू इस्‍लाम वहां से होता है
अपने बन्‍दों को इसका पैगाम वहां से है
एक मुकम्‍मल जिसने यह कानून बनाया है
उसने अपने बन्‍दों को हर गाम सिखाया है
कैसे जीना है तुमको और कैसे मरना है
इस दुनिया में रह कर क्‍या करना न करना है
हर अच्‍छी बातों का हुक्‍म हमें जो देता है
और आखिरत बन जाय यह दीन ही ऐसा है
जो इंसां को एक कामिल इंसा बनाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
आज जहां में देखो तो हर ओर बुराई है
और बदी से नेकी की घनघोर लडाई है
इंसां ने दौलत को अपना धरम् बनाया है
और गुनाहों को ही अपना करम बनाया है
किसको है परवाह फराइज और उसूलों  की
दुनिया याद रही, भूले हर बात वह नबियों की
इक रस्‍ता है जो जन्‍नत की राह दिखाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
दुनिया में आये हो तो इंसान बनो पहले
जिसकी उम्‍मत में हो, उसकी राह चलो पहले
उसकी फर्माबरदारी का नाम मुहब्‍बत है
यही अकीदा कहलाये और यही इबादत है
वेद हो या तौरेत  हो, इंजील हो या कुरआन
लेकिन दीने फितरत, दीने कयिम , एक है हां
वह कि जो ईमां नहीं लाये पछतायेंगे
जब दोजख की तकलीफों को सह न पायेंगे
जो सच्‍चा ईमान और यकीन और इल्‍म बढाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
जो हजरत नूह पर उतरा इस्‍लाम वही तो है
आप (सल्‍ल0) तक पहुंचा इस्‍लाम वही तो है
जिक्र जिसका वेदों में इस्‍लाम वही तो है
और कुरआन की सूरों में इस्‍लाम वही तो है
जो समझाया नबियों ने इस्‍लाम वही तो है
दी इस्‍लाह हदीसों ने इस्‍लाम वही तो है
जो ईमान मुजमल है  इस्‍लाम वही तो है
और ईमान् मुफस्सिल  है इस्‍लाम वही तो है
जो कलिमा ए तैयब पहले पहल पढाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
मैंने सोचा बुत को पूजू रूह नहीं मानी
इसको पूजो उसको पूजूं, क्‍या है मनमानी
दौलता पूजा, कुर्सी पूजा और लहू पूजा
पत्‍थर पूजा, घर  की पूजा और पशु पूजा
जो कुछ है बस एक वही बस एक वही नादां
इंसां को भगवान समझना है उसका अपमां
इससे बहतर है कि तुम खुद को पहचानो
बदी, गुनाहों से बच जाओ, बात मेरी मानो
जिसके जरिये इंसान दुआयें पाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
इस मजहब में दुनिया का हर राज नुमायां है
जीने से मरने तक का हर तौर सिखाया है
है पाबन्‍दी कलमो, रोजों और नमाजों की
हज लाजिम है और लिखी फहरिस्‍त जकातों की
इंसान के हर एक अमल की खास दुआयें हैं
इक इक सूरह में अल्‍लाह की लाख शुआयें हैं
जैसे मां बच्‍चे को अच्‍छी बात सखाती है
अकल हुई तौहीद समझ ईमान सुनाती है
और हिदायत  जिसको दे मालिक वह पाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है
इसमें है तहजीब  सदाकत और वफादारी
घूंघट, आंचल, नेकी, लज्‍जा और पर्दादारी
इज्‍जत, गैरत और एक सलीका और भलाई है
मजबूती, बहबूदी, जाहिर सिर्फ खुदाई है
यह तो बस आमाल अदब इखलाक नफासत है
शिर्क नहीं है, कुफ्र नहीं है सिर्फ इताअत है
बडे बुजुर्गों की इज्‍जत, मां वालिद का सम्‍मान
बच्‍चों को बस बनके दिखला तेरा है कुरआन
इसीलिए यह धर्म हया के दिल को भाता है
वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

असली इस्‍लाम और जाली इस्‍लाम


हमारे मुसलमानों की एक बद बख्‍ती और बद किस्‍मती यह है कि जिस तरह मुसलमान तमाम रसूलों पर ईमान रखते हैं लेकिन अमल अपने रसूल हजरत मुहम्‍मद सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम की लाई और बताई हुई शरीयत पर करते हैं, इसी तरह ......मुसलमानों का हाल यह है कि ईमान तो जरूर अल्‍लाह के रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम पर रखते हैं लेकिन अपने इमाम की बनाई हुई शरीयत पर करते हैं׀ और अपने आपको उन्‍हीं इमामों की तरफ मन्‍सूब करते हैं׀ नाम के लिए जरूर अपने आपको मुसलमान कहते हैं, लेकिन क्‍या इन्‍हें सही मुसलमान कहा जा सकता है? हमारी समझ में तो ऐसा नहीं आता׀
हजरत उमर.फारूक रजिअल्‍लाहो अन्‍हु ने अल्‍लाह के रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम एक फैसले और .फरमान को न मानने वाले की गर्दन उडादी थी और उसको मुरतद व मुनाफिक.करार दिया था׀ अब जो लोग मोहतरम व मुकर्रम सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम के सैंकडों फरामीन व फैसलों को न मानें׀ उनको आखिर मुनाफिक और मुरतद क्‍यों नहीं करार दिया जा सकता?    एक तरफ बिदअती बरेल्बियों ने अहमद रजा खान बरेल्‍बी को अपना बुत बना लिया है तो दूसरी तरफ देवबन्दियों ने उलेमाए देवबन्‍द को अपना बुत बना लिया है׀ कादनियों ने मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी को तबलीगी जमात ने मौलाना जकरिया व इलयास ग्रुप को׀ जमात इस्‍लामी ने मौलाना मोदूदी को अहले कुरआन ने अब्‍दुल्‍लाह चकडाल्‍वी और पता नहीं किस किस को׀ (इन्‍होंने अल्‍लाह के सिवा अपने धर्मज्ञाताओं और संसार त्‍यागी सन्‍तों को रब बना लिया और मसीह सुत मरयम को भी׀ हालांकि इन्‍हें इसके वसवा और कोई आदेश नहीं दिया गया था कि अकेले इलाह (पूज्‍य) के सिवा और किसी की इबादत (बन्‍दगी) न करें׀ उसके सिवा और कोई इलाह नहीं (तर्जुमा9.31)׀
गर्ज कि आज हिन्‍दोस्‍तान में हर तरफ जो दीने इस्‍लाम नजर आता है और मुसलमानाने हिन्‍दोस्‍तान जिस इस्‍लाम पर अमल पैरा हैं वह लगभग 75 प्रतशित जाली और डुप्‍लीकेट दीन है׀

आइये इसके चन्‍द नमूने देखें...
कब्रों पर चिरागां
1. रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम ने कब्रों की जियारत करने वाली औरतों पर लानत फरमाई और कब्रों पर मसजिद बनाने वालों पर लानत की और कब्रों पर चिराग जलाने वालों पर लानत की׀(हदीस(अबू दाउद तिर्मिजी निसाई)
नमाज जनाजा में सूरह फातिहा न पढना
2. बर्गर सूरह फातिहा के कोई नमाज नहीं (हदीस बुखारी व मुसलिम)
फज्र की सुन्‍नते बरबाद
3. जब नमाज (की जमात)खडी हो जाये सिवाय फर्ज नमाज के कोई नमाज (पास) नहीं होती (हदीस सहीह मुसलिम)
कुत्‍ते के नापाक बर्तन का मसला
4. जब कुत्‍ता तुम्‍हारे बर्तन में से पी जाय तो उसे सात मर्तबा धोओ (हदीस सहीह बुखारी व मुसलिम)
फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम
कुत्‍ते के झूठे बर्तन को तीन दफा धोया जाय(हिदाया किताबुत्‍तहारा)
कुत्‍ते की खरीद फरोख्‍त का मसला
5. रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम ने कुत्‍ते की कीमत से और जानिया की उजरत जिना से और काहिन के हलवे मांडे से मना फरमाया है׀ (सहीह बुखारी व मुसलिम)
 फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम
कुत्‍ते की भेडिये की खरीद व फरोख्‍त जायज है׀  (हिदाया किताबुल बुयू)
मैयत की तरफ से रोजे रखने का मसला
6. रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम फरमाते हैं कि जो शख्‍स मर जाय उसकी तरफ से उसके वली रोजे रख लें׀ (सहीह बुखारी व मुसलिम)
फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम
मैयत की तरफ से उसका वली रोजे न रखे׀ (हिदाया किताबुस्‍सोम)
जुमे के खुतबे के वक्‍त की नमाज का मसला
7.रसूल0 ने खुतबा पढाते हुए फरमाया जब तुम में से कोई जमा के दिन इमाम के खुतबा पढने की हालत में आये तो वह दो रकाते पढ ले और जरा हल्‍की पढे (असली इस्‍लाम यानी सहीह मुसलिम, मिश्‍कात)
फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम का फसला
जुमे के दिन इमाम के निकलते ही लोगों को न कोई नमाज पढनी चाहिये और न कोई बात करनी चा‍हिये (हिदाया किताबुस्‍सलात बाबुल जुमा)
इकहरी तकबीर का मसला
8. इकहरी तकबीर के लिए बुखारी व मुसलिम की हदीस है.सिवाय कदका मतिस्‍सलाह के लेकिन फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम में है तकबीर भी अजान की तरह यानी दोहरी कहे׀ (हिदाया बाबुल अजान)
नमाज ईद से पहले कुरबानी का मसला

9. रसूल सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम ने नमाज ईद से फारिग होते ही कुरबानी का गोश्‍त देखा जो नमाज की फरागत से पहले ही कुर्बान कर दी गई थीं तो आपने फरमाया जिसने नमाज से पहले कुरबानी की हो उसे उसकी जगह और कुरबानी करनी चाहिए׀ (सहीह बुखारी व सहीह मुसलिम)
फिक्‍ह यानी जाली इस्‍लाम
शहर के इर्द गिर्द रहने वाले देहाती तो बाद फज्र कुरबानी कर लें׀ (हिदाया किताबुल उजहिया)

रूपान्‍तरण- असली इस्‍लाम क्‍या है और जाली इस्‍लाम क्‍या है׀ (उर्दू- लेखक अबूल इकबाल सलफी, इदारा दावतुल इस्‍लाम, मुम्‍बई से माखूज)

शनिवार, 13 अगस्त 2011

Shadi Aur Muslim Muaashira

ہم جس معاشرے میں رہتے ہیں وہ ایک اہل حدیث معاشرہ ہے۔ لیکن اس معاشرے میں کئ باتیں ایسی رچ بس گئ ہیں کہ ہمیں ی انکا احساس تک نہیں ہوتا کہ ہم کیا کر رہیں ہیں۔ بات دراصل یہ ہے کہ ہم قرآن اور آخری رسول صلی اللہ علیہ وسلم کی شریعت پر جزوی طور پر ہی اپنی خواہش کے مطابق  چلنا چاہتے ہیں۔ ہماری طرز زندگی میں کئ مقام ایسے آتے ہیں کہ وہ شریعت کو بالاے طاق رکھے رہتے ہیں۔ اس کڑی میں ہمارے کچھ عمل ایسے ہیں جو شریعت کے ساتھ گھال میل ہیں اور ہم اسے مجموئ طور پر انجام دیتے ہیں وہ شادی بیاہ کے موقع پر اکثر دیکھتے ہیں۔انمیں سے ایک ہے نکاح کے موقع پر لڑکی کے گھر مختلف قسم کے پکوانوں کی چاہ میں  کئ سو افراد کو لیکر دعوت اڑانے جانا اور دیگر غیر شرعی کاموں کے لیے جٹنا۔
اس موقع پر غیر شرعی کاموں  میں کھڑے ہوکر دعوت بھی کھانا ہے، جبکہ قرآن مجید میں ہے  وَالَّذِينَ كَفَرُوا يَتَمَتَّعُونَ وَيَأْكُلُونَ كَمَا تَأْكُلُ الْأَنْعَامُ وَالنَّارُ مَثْوًى لَهُمْ﴿047:012﴾ (ترجمعہ) اور جو لوگ کافر ہوئے وہ (دنیا ہی کا) فائدہ اٹھا رہے ہیں اور مثل چوپایوں کے کھا رہے ہیں (١) ان کا اصل ٹھکانا جہنم ہے۔
‏ تفسیر احسن البیان میں ہے
  یعنی جس طرح جانوروں کو پیٹ اور جنس کے تقاضے پورے کرنے کے علاوہ اور کوئ کام نہیں ہوتا۔ یہی حال کافروں کا ہے، انکا مقصدِ زندگی بھی کھانے پینے کے علاوہ کچھ نہیں، آخرت سے وہ بالکل غافل ہیں اس سے ضمناً کھڑے کھڑے کھانے کی ممانعت کا بھی اثبات ہوتا ہے، جس کا آج کل دعوتوں میں عام رواج ہے کیوں کہ اس میں بھی جانوروں سے مشابہت ہے جسے کافروں کا شیوہ بتلایا گیا ہے۔
آگرہ اندیا میں مشہور و معروف عالمِ دین جناب رضاءاللہ عبد الکریم مدنی صاحب نے سوال و جواب کے ایک موقع پر مذکورہ بالا معاشرتی رواج کے بارے میں سوال کے جواب میں کہا کہ ایسا کرنا جہالت ہے اور غیر قوموں کی نقل ہے۔ اور اسکے بعدابھی  زیادہ وقت نہیں گزرا یکم اپریل 2011  کو مقامی جلسہ کے انعقاد کے موقع پرخصوصی خطیب  جناب مولانا مطیع الرحمن چترویدی صاحب کے دوران ِ خطاب سامعین سے ایک سوال داغنے پر پورے جلسے میں سکوت طاری ہوگیا۔ سوال بہن کو وراثت کے حق سے متعلق تھا۔ سکوت طاری ہونے کی نوبت کیوں آئ، اسکے کچھ اسباب ہو سکتے ہیں مثلاً غیر قوموں کی نقل کرتے ہوےء جہیزو باراتیوں کیلےء  ایک خطیررقم خرچ کرنا۔ شادی کے بعد بھی سلامی، چھوتھی وغیرہ کے نام پر فضول خرچی و غیر شرعی کام کرنا، لیکن بہن کو وراثت کے حق سے محروم رکھنا۔