मंगलवार, 29 नवंबर 2011

दस मुहर्रम और मुसलमान


मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म में निहायत महत्व व फ़जीलत रखता है। तमाम मुसलमानों के निकट इसका मुका़म व अहतराम रखना अनिवार्य है। इस्लामी साल की शुरूआत भी इसी महीने से होती है। इसी तरह इस्लामी साल के बारह महीनों में रजब, जुलका़दह, जुलहिज्जह के महीने भी ताजीम (सम्मान) के लायक हैं। अल्लाह तआला का फ़रमान है कि- अल्लाह के यहांँ ज़मीन व आसमान के पैदा किये जाने के दिन ही से महीनों की गिनती बारह है। इसलिए तुम अपने आप पर अत्याचार न करो। (सूरहःतौबह-36)
आशूरा का रोजा़- आशूरा मुहर्रम की दसवीं तारीख को कहा जाता है। इस दिन की बड़ी फ़जीलत है व अहमियत है। अल्लाह तआला ने इस दिन हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को और उनकी कौ़म बनी इस्राईल को फ़िरऔन के अत्याचार से छुटकारा दिलाया था। इस दिन रोजा़ रखना सुन्नत है और इसकी बड़ी अहमियत और फ़जीलत आई है। इससे पिछले एक साल के सगी़रा गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं। हजरत क़तादा रजिअल्लाहों अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से आशूरा के रोजे़ के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया यह पिछले एक साल के पापों (गुनाहों) का कफ्फ़ारा बन जाता है। (मुसलिम) मुूहर्रम की दसवीं तारीख को रोजा़ रखने के साथ उसके आगे या पीछे एक दिन को रोजे़ को मिला लेना होगा (अहमद)
मुहर्रम की बिदअतें- मुहर्रम में मसनून काम सिर्फ़ रोजा़ है, मगर आजकल के मुसलमान इसमें रोजा़ रखने के बजाय खुराफा़त में उलझ गये हैं। हजरत हुसैन (रजिअल्लाहों अन्हु) की शहदत के कारण मुहर्रम के दिन को ग़म व मातम का दिन बना लिया गया है। जबकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के ज़माने में रोजा़ के सिवाय कुछ नहीं था।
ताज़िया बनाना- ताज़िया बनाना महापाप है। काग़जों व लकड़ियों से ताज़िया बनाते हैं। हजारों स्त्री-पुरूष सजदा करते हैं, उससे मुरादें मांगते हैं। यह लोग ख्याल करते हैं कि इसमें हजरत हुसैन (रजिअल्लाहों अन्हु) की आत्मा आ ती है। अपने बच्चों को ताज़िया के नीचे से गुज़रवाते हैं, ताकि वह तमाम मुसीबतों व नज़रे   बद (कुदृष्टि) से महफ़ूज रहें। यह सब शिर्क का काम है और ऐसा करना हराम है। अल्लाह तआला  का फ़रमान है- क्या तुम उस चीज़ को पूजते हो, जिसको खुद बनाते हो। जबकि अल्लाह तआला ने तुमको और तुम्हारे काम को पैदा किया है। (सूरहःसाफ़फ़ात)
नौहा व मातम - इस्लाम ने मुसीबतों पर सब्र करने का आदेश दिये है और मातम करने वाले पर लानत भेजी गई है। हदीस में है कि अल्लाह तआला की लानत हो उस पर जिसने मुसीबत पर बाल मुंड लिये, जो़र से चिल्लाया और कपड़े फाड़े। (मुसलिम) इसी तरह ढोल, ताशा, नगाड़ा बजाना हराम है। हदीस में आया है कि रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि अल्लाह ने मुझे सारी दुनिया के लिये रहमत व हिदायत बनाकर भेजा है और मुझे हुक्म दिया है कि मैं तमाम बाजों, ढोलों, ताशों, नगाड़ों आदि को मिटादूं।

रविवार, 20 नवंबर 2011

मुसलिम होने का मतलब

 अल्लाह के नाम से हम उसी की तारीफ़ करते हैं, उसी से मदद तलब करते हैं और माफ़ी के तलबगार हैं। अल्लाह जिसे सही मार्गदर्शन (सीधा रास्ता) करना चाहे उसे कोई भटका नहीं सकता और जिसे अल्लाह रास्ते से भटकाना चाहे उसे कोई सही राह पर नहीं ला सकता। हम गवाही देते हैं कि कोई माबूद (पूजा के लायक) नहीं है सिवाए अल्लाह के और गवाही देते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और अन्तिम रसूल हैं।
 सबसे पहले मुसलिम शब्द का मतलब मालूम करते हैं । मुसलिम शब्द जिसका हम आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं, का असल मतलब क्या है? मुसलिम वह है जो अपनी इच्छा, मर्जी अल्लाह की मर्जी, ख्वाहिश के आगे त्याग दे। दूसरे शब्दों में अपने आपको अल्लाह के लिए समर्पित कर देना । अब सवाल है कि कौन मुसलिम है और कौन मोमिन? क्या कोई आदमी अपने जन्म के आधार (गुण) पर मुसलिम हो सकता है? क्या आदमी मुसलिम सिर्फ इसी वजह से हो सकता है कि वह किसी मुसलिम का बेटा या बेटे का बेटा (पौ़त्र) है? क्या कोई महज मुसलिम घर में पैदा होने मात्र से मुसलिम हो जाता है? जैसे कि हिन्दू का बेटा हिन्दू होता है या अंग्रेज का बेटा अं्रग्रेज होता है । क्या मुसलिम जाति है या राष्ट्र्ीयता है। क्या मुसलिम होना मुसलिम उम्मत से संबंध रखना है । जैसे आर्यन लोग आर्यन जाति से संबंधित थे। जैसे जापानी लोग जापनी होते हैं, क्योंकि वह जापान में जन्म लेते हैं । उसी तरह से क्या मुसलमान मुसलिम कहलाता है क्योंकि उसने मुसलिम मुल्क में या मुसलिम घर में जन्म लिया है ? आपका इन सवालों से संबंधित उत्तर ‘न’ में होगा। एक मुसलिम सही मायने में मुसलिम नहीं हो सकता, महज इस वजह से कि वह मुसलिम पैदा हुआ है।  वह मुसलिम इसलिए है क्योंकि वह इस्लाम को मानता है। अगर वह इस्लाम को त्यागता है वब वह मुसलिम नहीं होता। कोई आदमी चाहे ब्राह्मण हो या राजपूत, अंग्रेज हो या जापानी, काला हो या गोरा वह शख्स इस्लाम ग्रहण करने पर मुसलिम समाज (कौ़म) का सदस्य बन जाता है। इसके विपरीत यदि कोई शख्स जो मुसलिम घर में पैदा हुआ है उसको मुसलिम उम्मत से निकाल दिया जाता है या उसने इस्लाम को अपनाने से छोड़ दिया चाहे वह नबी का उत्तराधिकारी ही क्यों न हो। वह मुसलिम नहीं हो सकता।
 यह इस बात को स्थापित करता है कि अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत (उपहार) जिसका हम आनन्द उठाते हैं कि मुसलिम होना, यह कोई ऐसी बात नहीं कि वह अपने आप पैतृक रूप में हमें हमारे मां, बाप से मिलती है, जो जिन्दगी भर आधिकारिक रूप से हमारे नज़रिये और अख़लाक़ के बरखिलाफ़ हमारे पास रहती है। यह एक तोहफ़ा है जिसको पाने के लिए हमें लगातार लड़ना है।
 हम सब इस बात पर राजी है कि इस्लाम ग्रहण करने पर हम मुसलिम बन जाते हैं । लेकिन इस्लाम ग्रहण करने का मतलब क्या है? क्या इसके मायने यह होते हैं कि जो केाई भी यह ज़बानी इक़रार करता है कि ‘‘मैं मुसलिम हूं’’ या मैंने इस्लाम कुबूल कर लिया है? वह यह कहने से सच्चा मुसलमान बन जाता है ? या इसका मतलब यह होता है कि जैसे एक हिन्दू धर्म को मानने वाला कुछ संस्कृत के लिखे शब्दों को पढ़ ले बिना उनके मतलब को समझे। इसी तरह से कोई शख्स कुछ अरबी शब्दों को बिना उनका मतलब जाने पढ़े और मुसलमान हो जाए? आप इस सवाल का क्या जवाब देंगे। हम इसका जवाब देंगे कि इसलाम कुबूल करने का मतलब होता है कि मुसलमान पूरे होश और समझ-बूझ के साथ स्वीकार करे कि जो कुछ भी कुरआन में उतारा गया है उसके हिसाब से चलें। जो लोग इसके मुताबिक अमल नहीं करते हकी़क़त में वह मुसलिम नहीं हैं।
 इस्लाम में सबसे पहले ज्ञान (इस्लामी मालूमात) है और फिर उस ज्ञान को (व्यवहार में लाना )अमली जामा पहनाना है। कोई भी शख्स सच्चा मुसलिम नहीं हो सकता बिना इस्लाम का मतलब जाने,क्योंकि  वह मुसलमान होता है तो न कि जन्म से बल्कि ज्ञान (इस्लामी मालूमात) हासिल कर उसे अपनी जिन्दगी में व्यवहारिक रूप से उतारे। यह बात स्पष्ट है कि कोई मालूमात न होने कि वजह से सच्चा मुसलिम बनना और रहना नामुमकिन है। मुसलमान घरों में जन्म लेना, मुसलमानी नाम रखना, मुसलमानी पहनावे (कपड़े) पहनना और अपने आपको मुसलिम पुकारना ही मुसलमान होने के लिए काफ़ी नहीं है ।
 काफ़िर (नास्तिक) और मुसलिम के बीच अन्तर सिर्फ़ नाम का ही नहीं है, जैसे किसी का नाम स्मिथ या रामलाल और अब्दुल्लाह  है। कोई आदमी सिर्फ़ नाम की वजह से काफ़िर और मुसलिम नहीं होता । इसमें सबसे बड़ा अन्तर इस्लामी मालूमात का और उसपर अमल का है । एक काफ़िर यह नहीं समझता कि उसका अल्लाह से क्या संबंध है और अल्लाह का उससे क्या ताल्लुक़ है । जिस तरह से वह अल्लाह की मर्जी को नहीं जानता उसी तरह से वह सीधा रास्ता नहीं जान सकता, जिसपर चलकर वह अपनी जिन्दगी गुजा़र सके। यदि एक मुसलिम अल्लाह की मर्जी को नज़रअन्दाज़ कर दे, तब किस आधार पर काफ़िर के बजाय मुसलमान कहा जायेगा?
 यहांँ पर जजा़ (इनाम) और सजा़ में अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा फ़र्क़ है, जो रस्मी तौर पर (दावा करने वाले) कथित मुसलिम और एक सच्चे मुसलमान  के बीच एक कथित तौर पर मुसलिम होने का दावा करने वाला मुसलमान कहलाया जा सकता है, जब वह मुसलिम नाम रखे और मुसलिम घर में पैदा हुआ हो। लेकिन अल्लाह के नज़दीक  सच्चा मुसलमान वही हागा, जो इस्लामी मालूमात रखता हो और कुरआन व सुन्नत के मुताबिक अमल करे। ऐसे वह लेग हैं, जिनको अल्लाह ने कुरआन के अन्दर मोमिन का खिताब दिया है और इन मोमिनों के लिए अल्लाह ने आखिरत में अच्छे इनाम का वादा किया है।
अल्लाह हमंे उन लोगों में से बनाये जो निरन्तर अपने गुनाहों की बख्शिश मांगते रहते हैं और वह अपनी असीमित रहमत और अपनी हिफ़ाजत में रखे । आमीन.

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

सन् 1996 में इस्‍लाम कुबूल करने वाली एक नव मुसलिम औरत का मुसलमानों के नाम खुला ख़त

बिसमिल्‍लाहिर्रहमानिर्रहीम
मेरे दीनी भाई-बहनो ! अस्‍सलामो अ़लैकुम व रहमतुल्‍लाह व बरकातहू,
     मुझे इस्‍लाम से बहुत प्‍यार था और मैं जब मुसलमानों को देखती तो उन्‍हें बहुत सही और उनका मज़हब बहुत सच्‍चा समझती थी׀ लिहाजा़, अल्‍लाह के फ़ज़ल व करम से मैंने आज से तक़रीबन 15 साल पहले इस्‍लाम को कुबूल कर लिया׀ जिसकी वजह से मेरे मां-बाप, भाई-बहन सारे रिश्‍तेदार अब सिर्फ नाम के ही रिश्‍तेदार रह गये है यानि सब मुझसे छूट गये׀ सोचा था कि मुसलमान बनने पर सभी मुसलमान मुझे बहुत चाहेंगे और मेरे इस क़दम का स्‍वागत करेंगे पर जब मैंने इस्‍लाम कुबूल किया तो मुझे वहां उल्‍टी ही गंगा बहती मिली׀ दीन की सही बातें समझने के बाद जब मैंने उन्‍हें समझना चाहा तो मुझे ही उन्‍होंने गुमराह-दोज़खी़, वहाबी और न जाने किन-किन अल्‍का़ब (सम्‍बोधन) से नवाज़ना शुरू किया, क्‍योंकि जो बुत परस्‍ती मैं छोड़कर आयी वही सब कुछ मैंने थोड़े से बदले हुए नामों के साथ मुसलमानों को क़ब्रों के साथ करते हुए देखा, तो मेरे दिल में आया कि ये सब तो मैं अपने पुराने धर्म में भी कर रही थी तब मुझे इस्‍लाम कुबूल करने की ही क्‍या ज़रूरत थी?  लेकिन जब इस्‍लाम की मूल शिक्षाओं को गौ़र से समझा तब मालूम हुआ कि आज के आ़म मुसलमान तो अपने ही धर्म की मूल शिक्षाओं से बहुत ही दूर हैं और इनके धार्मिक विद्वान (उलमा व मौलवी) भी इन्‍हें उन मूल शिक्षाओं से बहुत ही दूर रखे हुए हैं और धर्म की आड़ में अपनी रोजी़-रोटी चला रहे हैं׀ कुरआन में भी है- ‘’बहुत से आ़लिम व दरवेश लोगों का माल नायज़ तरीके़ से खाते है और अल्‍लाह के रास्‍ते से रोकते हैं׀’’ (सूरह तौबा-34)

     इस्‍लाम की मूल शिक्षाओं का स्रोत सिर्फ और सिर्फ कुरआन व हदीस है लेकिन आजके नाम-निहाद (तथाकथित) और पेट के पुजारी मौलवियों ने ये भ्रामक प्रचार कर रक्‍खा है कि आ़म मुसलमान कुरआन व हदीस को नहीं समझ सकता, क्‍योंकि ये बहुत कठिन है׀     जबकि अल्‍लाह तआ़ला का फ़रमान है कि- ‘’हमने इसे आसान बनाया है समझने के लिये, तो है कोई समझने वाला?’’ (सूरह क़मर-17)
जब मैं सिर्फ कक्षा 4 तक की पढ़ी हुई और मैंने पूरे कुरआन के हिन्‍दी अनुवाद को पढ़ा तो मेरी समझ में वो आ गया , फिर ये मौलवी ना जाने कैसे ये कहता है कि कुरआन बहुत सख्‍त है और तुम नहीं समझ सकते (नउज़बिल्‍लाह)׀   
     जब मैंने इस्‍लाम की मूल शिक्षाओं को समझा तब मुझे पता चला कि मैंने कितनी बड़ी कामयाबी की राह को पा लिया है और अल्‍लाह तआ़ला के फ़ज़ल व करम से कितनी बड़ी गुमराही से बच गयी׀
     मैं आप सभी मुसलमान भाईयों की खि़दमत में किसी की लिखी ये पंक्तियां पेश कर रही हूं, जिन्‍हें पढ़ कर आप को शायद थोड़ी ना-गवारी तो ज़रूर लगेगी लेकिन जब आप ठण्‍डे दिमाग़ से सोचेंगे और कुरआन व हदीस की मूल शिक्षाओं से मिलायेंगे तो आपको इन्‍शाअल्‍लाह इन पंक्तियों के एक-एक शब्‍द बिल्‍कुल सच व सही लगेंगे׀ हो सकता है कि आप मेरे विचार और ख्‍यालात से मुत्‍तफि़क़ (सहमत) न हों लेकिन मैं अपने अनुभव और अपने विचारों को फिर भी पेश कर रही हूं कि शायद आप इस पर गौ़र करें और अपनी इस्‍लाह करें׀ 
     ‘’शायद कि उतर जाये सीनों में मेरी बात’’
गै़र मुसलिम का, मुसलिम से खि़ताब
एक ही प्रभु की पूजा हम अगर करते नहीं,
एक ही रब के सामने, सर आप भी रखते नहीं׀  ׀    
           अपना सजदागाह देवी का अगर स्‍थान है׀
           आपके सजदों का मरकज भी तो क़ब्रस्‍तान है׀   ׀    
अपने देवी-देवताओं की गिनती , हम अगर रखते नहीं׀
आप भी तो मुश्किल कुशाओं को, गिन सकते नहीं׀    ׀    
           जितने कंकर उतने शंकर ये अगर मशहूर है׀   
           जितने मुर्दे उतने सजदे, आपका दस्‍तूर है׀     ׀    
अपने देवी-देवताओं को है अगर कुछ अख्तयार׀
आपके वलियों की ताक़त का नहीं है कुछ शुमार׀ ׀    
           वक्‍त मुश्किल का है नारा अपना तो, जब बजरंग वली׀
           आपको भी देखा लगाते नारा, अल मदद या अली׀     ׀    
लेता है अवतार प्रभु अपना, तो हर देश में׀    
आपने समझा अल्‍लाह को मुस्‍तफ़ा के भेष में׀   ׀    
           जिस तरह से हम बाजाते, मंदिरों में घंटियां׀   
           तुरबतों पर आपको , देखा बजाते तालियां׀ ׀    
हम भजन करते हैं गाकर, देवता की खूबियां׀  
आप भी क़ब्रों पर गाते , झूम कर क़व्‍वालियां׀   ׀    
           हम चढाते हैं बुतों पर, दूध और पानी की धार׀ 
           आपको देखा चढाते, सुर्ख़ चादर शानदार׀ ׀    
बुत की पूजा हम करें, हमकों मिले नार-ए-सकर׀
आप कब्रों पर झुकें, क्‍यूंकर मिले जन्‍नत में घर?
           आप भी मुशरिक- हम भी मुशरिक, मामला जब साफ़ है׀    
           जन्‍नती तुम दोज़ख़ी हम, ये भी कोई इन्‍साफ़ हे?
हम भी जन्‍नत में रहेंगे, तुम अगर हो जन्‍नती׀
वर्ना दोज़ख़ में रहेंगे, आप हमारे साथ ही׀ ׀    
           हम भी छोड़ें-तुम भी छोड़ो, हैं ग़लत जो रास्‍ते׀ 
           एक ही माबूद को पूजें, आओ- अल्‍लाह के वास्‍ते׀ ׀    

     अन्‍त में आप सभी मुसलिम भाईयों से आह्वान करती हूं (हालांकि ये काम आपको खुद ही करना चाहिए था) कि आप लोग कुरआन व हदीस की तालीमात (शिक्षाओं)को खुद पढ़ें, खुद समझें तो इन्‍शाअल्‍लाह इस्‍लाम की सही तस्‍वीर आप खुद ही जान जायेंगे׀    आपसे मैं सिर्फ इतना ही कहूंगी कि आप सभी दीनी भाई-बहनें कम से कम एक बार पूरे कुरआन मजीद को तर्जुमे के साथ पढ़ डालें, फिर देखें कि क्‍या आपको कुरआन समझ में नहीं आता है? और ये देखिये कि आज जो कुछ आप तीज-त्‍यौहार के नाम पर सवाब पाने की नियत से कर रहे हैं क्‍या वो सब ठीक है? जिसे आज आपने ऐन इस्‍लाम समझकर गै़रूल्‍लाह को अल्‍लाह का मुका़म देकर उस पर सवाब की नियत से जो कुछ भी दीन और मज़हब के नाम पर कर रहे हैं क्‍या वो सब जायज़ है? या ठीक है? करआन को गि़लाफ़ में रख कर सिर्फ ताक़ों की जी़नत मत बनाइये, बल्कि उसे पढि़ये, गौ़र करिये और अपनी जिन्‍दगी में उतारने की कोशिश करिये और वक्‍त़ की नमाजें मुक़र्ररा वक्‍त पर अदा करें, दीनी मां-बहने भी अपनी नमाजों की पाबन्‍दी करें और जुमा के दिन ज़रूर मसजिद में जाकर ख़ुत्‍बा सुने और जमाअ़त में शामिल हुआ करें׀    मसजिद में औरतें भी मुकम्‍मल पर्दे के साथ (उनका इन्‍तजा़म भी अलग रहना चाहिये) जाकर एक इमाम के पीछे नमाज़ अदा कर सकती हैं׀
     पर अफ़सोस है कि इस भी आज नाम-निहाद जेब भरू पीर और पेट भरू मौलवियों ने नाजायज़ क़रार दे रखा है जबकि औरतों को बनावटी बैअ़त और मजा़रों की हाजि़री के लिये बेपर्दा करने में इन्‍हें कोई ऐब नज़र नहीं आता׀   ये सब शैतान कि़स्‍म के लोग हैं, ऐसे लोगों के बहकावे में मत आयें׀ अल्‍लाह के नबी मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के वक्‍त में भी औरतें मसजिद में जाकर, अलग से खड़ी होकर नमाजें अदा किया करती थीं इसलिये ये जायज़ है और आज भी मसजिदों में इसका इन्‍तजा़म होना चाहिये׀ एक बात और जान लीजिये कि अल्‍लह के नबी (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने ईदैन (ईद-बक़रीद) की नमाजें औरतों को ईदगाह में जाकर अदा करने का ह़ुक्‍म दिया है इसलिये औरतों को ईदैन की नमाज़ मे शामिल होना वाजिब है, अगर हैज़ (मासिक धर्म) की हालत में हों तब भी जाना वाजिब है, हां उस हाल में नमाज़ नहीं पढ़ेंगी बल्कि अलग बैठेंगी और खुत्‍बा व दुआ बगैरह में शामिल रहेंगी, अगर एक औरत के पास पर्दे के लिये कपड़ा न हो तो दूसरी औरत अपने चादर में उसे भी ले ले, अगर आपको इन बातों पर यकी़न न हो तो इन हदीसों का खुद मुतालआ (अध्‍ययन) कर लें׀   
1-बुखरी, हदीस नं0 981, 2- मुसलिम, हदीस नं0 890, 3- अबूदाउद, ह0नं0 1136, 4-तिर्मिजी़ ह0न0 537, 5-इब्‍ने माजा़ ह0नं0 1308, 6- नसई भाग3, 7-अहमद, भाग5, पेज84, 8-बैहकी़, भाग3 पेज305 ׀   

     आखि़र में अल्‍लाह तआ़ला से द़ुआ़ है कि वो मेरी इस छोटी सी कोशिश को कु़बूल फ़रमाए और हम सभी मुसलमानों को इस्‍लाम की सही तालीमात (शिक्षाओं) पर चलने वाला अपने नबी-ए-करीम (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के बताये हुए तरीकों पर अ़मल करने वाला सच्‍चा-पक्‍का मोमिन बनाये और जन्‍नतुल फि़रदौस में हमें जगह अ़ता करे ׀ (आमीन) आप सभी अपनी इस नव मुसलिम बहन को अपनी नेक दुआ़ओं में ज़रूर याद रखियेगा, अगर कोई ग़लती हुई हो तो माफ़ करियेगा ׀
आपकी एक नव मुसलिम बहन जा़हिदा मुहम्‍मदी
(इस्‍लामिक रिसर्च सेन्‍टर, मिर्जापुर)

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम के स्‍‍थान पर 786 लिखना

बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम की जगह 786 लिखने की बिदअ़त एक अर्से से मुसलिम हलकों में मक़बूलियत व शरई हैसियत हासिल कर चुकी है. रिसालों, किताबों एवं खुतूत तक ही महदूद (सीमित) नहीं है, बल्कि लोग गाडि़यों और दुकानों में लिखा करते हैं और अपने हर काम का आगा़ज (शुभारम्‍भ) इसी से करते हैं.
     बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम को 786 लिखना यह दर असल नाम-निहाद उलमाए किराम का तर्जे-अम़ल है, यह हज़रात 786 को बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम का नेमुल बदल (प्रतिस्‍थानीय) क़रार देते हुए बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम की बेहुरमती से बचने के लिए अपने खुतूत व रसाइल (पत्र-पत्रिकाओं) में 786 का इस्‍तेमाल करते हैं और इसे रिवाज देते हैं और बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम लिखने में आ़र (शर्म) महसूस करते हुए परहेज़ करते है और कहते हैं कि यह तालीमाते नबवी के खिलाफ़ है.
     हालांकि यह हकी़क़त में सिराते मुस्‍तकी़म (सत्‍मार्ग) से इन्हिराफ (इंकार) और दीन-ए-इस्‍लाम व कुरआने मुक़ददस के साथ खुला हुआ मजा़क है. क्‍योंकि कुरआ़न मजीद के अन्‍दर अल्‍लाह तआ़ला ने हज़रत सुलेमान (अलैहिस्‍सलाम) के एक ख़त का तज़किरा (उल्‍लेख) किया है, जिसकी इब्तिदा बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम से की गई है.
     सन 6 हिजरी में सुलह हुदैबिया के मौके़ पर पैग़म्‍बरे इस्‍लाम और मुसलमानों का मुशरिकों से जिन 6 शर्तों पर मुआहिदा (समझौता) हुआ था, इस अहद नामे की तहरीर का आगा़ज भी हज़रत अ़ली (रजि़अल्‍लाहु अन्‍हु) ने बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम से किया था. सन 7 हिजरी के आखि़र में नबी करीम (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने अमीरों व सुल्‍तानों के नाम पर जितने भी खुतूत (पत्र) रवाना किये थे, सबके शुरू में बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम लिखा गया था.
     हालांकि प्‍यारे नबी (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) यकी़नी तौर पर जानते थे कि यह खुतूत कुफ्फार और मुशरिकी़न के नापाक हाथों में जायेंगे और मुखा़तिब (संबोधित) भी वही लोग थे. मगर क्‍या शान-ए-इलाही कि इब्तिदा अल्‍लाह पाक के मुकददस नाम से और इख्तिमाम भी इस पर.
     हम 786 के पैरोकारों से पूछना चाहते हैं कि क्‍या हमारे असलाफ़ को ताजीम-ए-इलाही से कोई सरोकार नहीं था. क्‍या कुरआने मुकददस की ताजी़म हमसे कम किया करते थे या उनको शरीयत की समझ हमसे कम थी, जो हम इस कमी को पूरा कर रहे हैं. यह मुसल्‍लम (खुली) हकी़क़त है कि हमारे असलाफ़ कुरआने मजीद की ताजी़म व तकरीम हमसे ज्‍़यादा किया करते थे और उनका फ़हम व इदराक भी हमसे कहीं ज्‍़यादा था. दर असल 786 हिन्‍दुओं के भगवान हरीक़ष्‍णा के हुरूफ़ (अक्षरों) का मजमूई योग है. हुरूफ़ को आदाद (अंकों)  में तब्‍दील (परिवर्तितत्र) करना, यह एक यहूदी मंसूबा साजी़ और इस्‍लाम के खि़लाफ़ प्रोपैगेण्‍डा है और दुश्‍मनाने इस्‍लाम की एक साजि़श के तहत यह काम अमल में आया है, जिसका मक़सद दीने इस्‍लाम की असली शक्‍ल व सूरत को मसख़ (बिगाड़ना) करना है.
     ज़रा सोचिये ! जब हम बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम के बजाय अपने खुतूत बगैरह की इब्तिदा में 786  लिखते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि हम एक अल्‍लाह के बजाय हरीक्रष्‍णा और अल्‍लाह दोनों को मानते हैं तो ऐसी सूरत में कलिमा तौहीद के मुन्‍कर क़रार पाते हैं. जब हमारा अकीद-ए-तौहीद ही नहीं रहा तो फिर मुसलमानियत कहां रही. हालांकि हमारे अकी़दे के मुताबिक़ हमारा सिर्फ़ एक अकेला रब अल्‍लाह है.
     अगर तुम्‍हारे नाम का अदद 420 या 92 आ जाय और नाम के बजाय यूं पुकारा जाय, ऐ 420 ! इधर आओ. तो क्‍या तुम इस बात को गवारा करोगे, हरगिज़ नहीं. क्‍योंकि बुरे अल्‍का़ब (सम्‍बोधन) से किसी को पुकराना इस्‍लामी आदाब के खि़लाफ़ है. और इसकी कुरआन में मज़म्‍मत (निंदा) की गई है, जबकि तुम्‍हारी ईमानी गै़रत इस बात को कुबूल करने के लिए तैयार नहीं है तो फिर तुम अल्‍लाह और मुहम्‍मद जैसे प्‍यारे नाम को गिनती व अदद में तब्‍दील करके बाअसे-अहतराम (आदरणीय) कैसे तसव्‍वुर करते हो? यह अल्‍लाह और मुहम्‍मद के नाम की तौहीन नहीं है तो और क्‍या है?
     ऐसे तहरीफ़ (परिवर्तन) करने वाले जा़लिम हैं और बिसमिल्‍लाहिर्रमानिर्रहीम को 786 या मुहम्‍मद के बजाय 92 और अल्‍लाह के बजाय 66 लिखना और बोलना आदाबे इस्‍लामी के खि़लाफ़ और शिर्क व बिदअ़त का काम है. लिहाजा़ अब भी वक्‍त है अल्‍लाह तआ़ला से खा़लिस तौबा कर लो और यहूदी सिफ्त मफा़द परस्‍त हज़रात के मकरो-फ़रेब में आकर अपने ईमान को गदला मत बनाओ.  (अल्‍लाह तआ़ला हमें इसकी तौफ़ीक दे, आमीन)

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

आवागमनीय पुनर्जन्‍म

 
      आर्यों की मान्‍यता है कि दुनिया में जो बन्‍दे गुनाह करते हैं उनकी सजा के लिए हैवानों के शरीर में उन्‍हें जाना पड़ता है. मगर किस तरह ? बैठे-बैठे हैवान नहीं बन जाते बल्कि बाकायदा अण्‍डे के अन्‍दर या हैवानों के पेट में शरीर तैयार होता है इसमें गुनाहगार (पापी) आदमी की रूह (आत्‍मा)डाली जाती है अर्थात् दुनिया का इन्तिजाम जिस कदर खुदा ने इंसानों और हैवानों में मिलाप का रखा है यह सब प्रबन्‍ध बन्‍दों के गुनाहों पर निर्भर करता है. चुनांचि आर्य धर्म मे एक समर्थक (पण्डित लेखराम) अपने रिसाले (पत्रिका) ‘’सबूत तनासुख’’ में यूं कलमबन्‍द हैं
      ‘’मसअला आवागमन (तनासुख) की रू से दो किस्‍म के शरीर माने गये हैं एक कर्मयोनि (आमाल खाना), दूसरा भोग योनि (सजा़ख़ाना. शरीर में समझने की ताक़त और अच्‍छा बुरा समझने की तमीज़ दी गई है वह कर्म योनि और जिस शरीर में नहीं दी गई है वह भोग योनि है. इस लिहाज से इंसान कर्म योनि और बाकी भोग योनि है. चूंकि हैवान भोग योनि है वह नेक या बद काम कर नहीं सकते जिस तरह जेल खा़ना के कै़दी सजा़ की अबधि गुज़र जाने के बाद जेल से रिहाई होती है न कि किसी अच्‍छे कर्म से. इसी प्रकार सजा़ की अबधि गुजरने के बाद हैवानी शरीर से रिहाई होनी चाहिए और फिर जिस दर्जा शरीर से पतन हुआ या उसी स्थिति में परिवर्तन किया जाता है हैवानी शरीर के पुन्‍य कर्मों से नहीं.’’ (सबूत तनावसुख पेज 197-198)
      उल्‍लेखनीय है कि तनासुख जिसे हिन्‍दी में पुनर्जन्‍म और आवागम भी कहते हैं यह है कि आत्‍मा छोड़ने इस शरीर के जिसमें वह अब है किसी ऐसे शरीर में चली जाय जो हस्‍बे दस्‍तूर मां के पेट या अण्‍डे के अन्‍दर तैयार हुआ हो, जिसको दूसरो शब्‍दों में तनासुख तवालुद भी कहते हैं यह है आर्यों का दावा.

      आर्यों का दावा जो हमने उनकी किताब से नकल किया है अपने अर्थ बतलाने में बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है है किसी व्‍याख्‍या और टिप्‍पणी का मुहताज नहीं. मजमून स्‍पष्‍ट है कि मनुष्‍य शरीर आत्‍मा के लिए असल है और बाकी हैवानी शरीर बतौर सजा़ पाप के अनुसार मिलते हैं. इसी तरह अगर यही आर्यों की मान्‍यता है और निस्‍संदेह यही है तो हमारी तरफ से इस पर संक्षिप्‍त सी द़्रष्टि है.

1.                  जब मनुष्‍य शरीर भोग योनि (कै़दखाना) नहीं तो फिर प्रश्‍न कि जिससे बजान आकर आप लोगों ने तनासुख तराशा था इसी तरह बहाल रहा. इस प्रश्‍न से बचने की गरज से आप लोगों ने पुनर्जन्‍म (पूर्व कर्म) का बदला माना था जिस मनुष्‍य ने जो कुछ पहली योनि में किया वहीं इसको वहां मिलता है और जो कुछ यहां करता है वह किसी दूसरी योनि में मिलेगा लेकिन आर्य मुसाफिर का उक्‍त कथन कहा रहा है कि मनुष्‍य शरीर भोग योनि नहीं जिसको दूसरे शब्‍दों में यूं कहें कि मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए प्रस्‍तावित नहीं हुआ बल्कि आत्‍माओं की असल मंजिल है. जब ही तो आपकी मिसाल कै़दी वाली सही होगी तो अब बतलाइये लंगड़ा लंगड़ा क्‍यों हुआ और कोढ़ी कोढ़ी क्‍यों हुआ और अन्‍धा अन्‍धा क्‍यों हुआ. अगर घबराकर कहें कि पिछले कर्मों का बदला है तो गलत, जबकि मनुष्‍य योनि भोग योनि नहीं तो इस योनि में पहले जुर्मों की सजा़ कैसी. अरबी मिसल (कहावत) निःसंदेह सच है (अर्थ)- ‘’मेंह से भाग कर परनाले के नीचे आ खडा़ हुआ.’’
2.                  सही बात तो यह है कि जिस मुजरिम को सजा़ देकर उसकी असली हालत की तरफ़ फैरना हो उसको सजा़ का ज्ञान भी होना चाहिए कि यह सजा़ म़ुझको अमुक पाप के बदले में मिली है ताकि भविष्‍य में इस पाप से बचे. इसी प्रकार अगर मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए है तो हैवानों (पशुओं) को भी उस जुर्म की ख़बर होनी चाहिए कि अमुक जुर्म की के कारण मुझे सजा़ मिली है ताकि इस सजा़ के पूरी करने के बाद मनुष्‍य शरीर में आकर वैसे जुर्म न करे. लेकिन इसकी विपरीत हम देखते हैं कि किसी आर्य को खबर नहीं कि पहले वह किस हैवान (कुत्‍ते, बिल्‍ले, घोड़े, बैल) की योनि में था और किस जुर्म की सजा़ का बदला था.


3.                  अगर मनुष्‍य दुष्‍कर्म की सजा़ भुगत कर अपनी वास्‍तविक हालत की तरफ ही आता है तो बेचारे अन्‍धे, कोढ़ी, भिक्षु, गरीब, फाके पर फाके उठाने वाले क्‍या हमेशा उसी हालत में रहेंगे और हमेशा से उसी हालत में हैं क्‍योंकि आपके कथनानुसार जिस दर्जा जिस्‍मानी (शरीर के रूप) से पतन हुआ था उसी रूप में इन्‍तका़ल (स्‍थानान्‍तरण) किया जाता है तो क्‍या उन असहायों की आत्‍मा ने कोई शपथ पत्र लिख दिया हुआ है कि हमें यही हालत पसन्‍द है.
4.                  अगर मनुष्‍य शरीर भोग योनि और जुर्मों के लिए सजा़खाना है तो आप लोगों को मुसलमानों और अन्‍य मांसाहारी कौ़मों का शुक्रगुजा़र होना चाहिए जो जानवरों को जिब्‍ह करके बहुतेरे आर्यों के भाई-बन्‍दों की निजात(मोक्ष)कराते हैं या कराने के सबब हैं.


5.                  अगर इस मनुष्‍य शरीर में आत्‍मा अपने असली तका़जा़ को पूरा न करेगी तो कौन से शरीर में करेगी, हालांकि हम देखते हैं कि बहुत से लोगों को सांसारिक निषिद्वों के अतिरिक्‍त प्राक्रतिक निषिद्व भी होते हैं. उदाहरणस्‍वरूप- आंख से अन्‍धा होना या कान से बहरा होना या किसी ऐसे निर्धन के घर में पैदा होना जहां वह सिवाय पेट पालने के (वह भी भीख मांगने और पाखा़ना उठाने से) कुछ कर ही नहीं सकते.


6.                  अगर मनुष्‍य का शरीर वास्‍तविक है और जिस शरीर से स्‍थानान्‍तरण होता है उसी शरीर में आत्‍मा आती है तो अवयस्‍क बच्‍चे क्‍या इसी तरह मरते रहेंगे और उनकी आत्‍माऐं हमेशा से इसी तरह छोटी उम्र में बल्कि कुछ मां के पेट में हो शरीर छोड़ती आयी हैं. अगर उल्लिखित दर्जा शरीर का अर्थ यह बतलाओ कि अमीरी और गरीबी की दशा से तात्‍पर्य है और तो फिर वही सवाल होगा कि गरीब, बदमाश, भंगड़ जो निर्धनता के कारण समस्‍त बुरे कर्म कर गुजरते हैं यही उनके लिए वास्‍तविक रूप है तो इन बेचारों की कैसी शामत आयी है कि एक तो निर्धनता और असमर्थता के बद कर्म करने पर सांसारिक हाकिम उनको कै़द करें और फिर वहां से ख़लासी (मोक्ष) पाकर भी आयें तो फिर वही नादारी और गरीबी के शरीर में परमेश्‍वर उनको ठूसें. फिर इसी तरह हमेशा तक उनकी बुरी गत होती रहे और अगर यह नेक भी हों तो क्‍या फा़यदा जबकि थोडे़ गुनाह पर भी है बाकी़ शरीर में कै़द होना और वहां से छूटकर वास्‍तविक हालत (गरीबी और मुहताजी) में आना है तो क्‍या नतीजा होगा इससे बहतर है कि इस बेचारी आत्‍मा को जो बकौ़ल आपके खुदा की पैदाइश भी नहीं. इस चन्‍द रोज़ की जि़न्‍दगी के अहसानों के बदले में (जो इस गरीबी) और मुहताजी की हालत में खुदा ने उन पर किये थे और दर-दर भीख मंगाई थी, उनसे दुगने चौगने बरस कै़द कर लिया जाता और फिर हमेशा के लिए इस कमबख्‍त़ को रिहाई होती और अपनी कमाई से आप गुजा़रा करती और ऐसे खुदा को दूर से सलाम कहती. सच पूछो तो खुदा अगर उसे छोड़ दे तो कभी भी खुदा के सामने न आवे और एक ही बार के आजमाने पर उसके बुलाने पर भी दूर से उसको लिख भेजे- (अर्थ)’’आज़माए हुए को आज़माने से निदामत (शर्मिन्‍दगी) हासिल होती है.’’


7.                  अगर मनुष्‍य शरीर आत्‍माओं के लिए असल है और हैवानी शरीर कै़दखा़ना तो बतलाइये यदि एक हजार या कम से कम सौ साल तक तमाम मख़लूक (जीव) नेक काम करे और कोई ऐसा काम न करे जिससे वह लायके़ सजा़ (सजा़ योग्‍य) हो तो उनकी दीनदारी के यह तो हैवानात (पशुओं) के शरीर में जाने से रहे हों. अल्‍बत्‍ता हैवानात अपनी-अपनी कै़द भुगत कर वास्‍तविक हालत (मनुष्‍य शरीर) की तरफ आवेगी जिसकी वजह से हैवानात में एक रोज़ ऐसी कमी होगी कि हमारी सवारी के लिए कोई घोड़ा, दूध के लिए कोई गाय और शहद के लिए कोई मक्‍खी भी न मिलेगी. क्‍या फिर इन बेचारे नेकियों का जो कई सालों तक नेकी के कामों में लगे रहे, यही इनाम होना चाहिए था जो आराम उनको बदकारी (दुष्‍कर्म) में था. गाड़ी सवारी को, गाय भैंस दूध पीने को, जानवर बोझदारी को वह भी हाथ से जाते रहे, बल्कि बगै़र देखे तो कुल इन्तिजा़म-ए-आलम (सम्‍पूर्ण स्रष्टि के प्रबन्‍धन) में अन्‍तर आ गया.


8.                  शाब्दिक परिवर्तन से हम यह भी कह सकते हैं कि अगर हैवानी शरीर भोग योनि है तो हम फर्ज़ करते हैं कि तमाम दुनिया में दो सौ साल तक तमाम लोग बदकार गददार (जैसा कि आजकल सामान्‍यत हैं) बलात्‍कारी, शराबी कुल के कुल इसी किस्‍म के हो रहे है. जिनमें से कोई भी मनुष्‍य शरीर के योग्‍य न हो तो बताइये तमाम दुनिया का इन्तिजाम कैसे होगा ? जबकि सारे ही जीव (रूह) अपनी बदकारी के कारण हैवानी शरीर में चले गये और एक रोज़ ऐसा आ पहुंचा कि सब के सब हैवानात हो गये और मनुष्‍य एक भी न हो तो नतीजा बुद्विजीवी सोच लें.

रूपान्‍तरितमसअला तनासुख (उर्दू)
लेखक- मौलाना अबुल वफा़ सनाउल्‍लाह अमरतसरी (रहमतुल्‍लाह)

पुनर्जन्‍म सिद्धांत

      पुनर्जन्‍म सिद्धांत सर्वमान्‍य सिद्धांत के रूप में माना जा रहा है׀ हिन्‍दुओं के ईश्‍वरीकृत वेदों में मूलतः पुनर्जन्‍म का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं है׀ यह बाद की कल्‍पना है׀ हिन्‍दुओं के घर में हर वाद पर विवाद है׀ पुनर्जन्‍म के साथ भी विरोधावास है׀ हिन्‍दुओं के धार्मिक ग्रन्‍थों में और सामान्‍य धार्मिक विश्‍वासों में और विशेषकर गरूड़ पुराण में स्‍वर्ण-नरक को भी मान्‍यता है׀ मरने वाले के लिए अनिवार्यतः स्‍वर्गवासी शब्‍द का प्रयोग हिन्‍दुओं में किया जाता है׀ गीता में जहां मृत्‍यु को पुराने वस्‍त्र त्‍याग और उसके बाद नए वस्‍त्र के रूप में अन्‍य जीवन धारण बतलाकर अर्जन को इस शरीर की नश्‍वरता का ज्ञान कराया गया है वहीं इसी गीता में अर्जुन को प्रभावी ढंग से उदबोधन हेतु कहा गया है कि अगर मरोग तो स्‍वर्ग में जाओगे और जीतोगे तो राज्‍य भोगोगे׀ इससे यह सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म और आवागमन सिद्धांत के बावजूद हिन्‍दुओं के साथ धार्मिक और नैतिक रूप से स्‍वर्ग-नरक का विश्‍वास भी सामान्‍यतः जुड़ा़ हुआ है׀ गीता की उपरोक्‍त उक्ति से यह भी सिद्ध होता है नैतिकता के लिए प्रेरणा स्‍वर्ग-नरक के विश्‍वास से ही संभव है׀ आखिर गीता का उद्देश्‍य अर्जुन को निमित्‍त मात्र बनाकर मानव को नैतिक कार्य के लिए प्रेरित ही तो करना था और इसके लिए कृष्‍ण ने स्‍वर्ग की उपलब्धि को ही मात्र उपाय समझा׀ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म हिन्‍दू दर्शन का एक दार्शनिक सिद्धांत भले ही हो, लेकिन धार्मिक मान्‍यता स्‍वर्ग-नरक की ही है׀ पुनर्जन्‍म का सिद्धांत तर्क शास्‍त्र के भी विपरीत है׀ कहा जाता है कि यह कलियुग है और पाप बढ़ता जा रहा है׀ सत्‍ययुग में पाप कम होते थे׀ साथ ही साथ यह भी कहा जाता है कि पुण्‍य से ही मनुष्‍य योनि प्राप्‍त होती है और पाप से पशु योनि׀ यदि ऐसा है तो आजकल जब कलियुग है और पाप चरम सीमा तक बढ़ रहे हैं, नित्‍य मनुष्‍यों की आबादी कैसे बढ़ रही है? जब पानी इसी जन्‍म में किए हुए पाप का अहसास नहीं करता तो पूर्वजन्‍म का उसे कैसे अहसास कराया जा सकता है? कदापि नहीं׀ तब इस परिस्थिति में पुनर्जन्‍म का सिद्धांत व्‍यर्थ और अनुपयोगी है׀ यह नैतिक शास्‍त्र के भी विरूद्ध है׀ मान लीजिए कि किसी का नौजवान पुत्र मर जाए और हमें वहां शोक सान्‍त्‍वना देने के लिए जाना पड़े तो क्‍या हम उस दुःखी पिता से यह कहें कि पुनर्जन्‍म में आपने किसी के पुत्र की हत्‍या की थी׀ दुःख में स्‍वयं को और दूसरों को सान्‍त्‍वना इसी कथन और विश्‍वास में निहित है कि धीरज रखिए׀

लेखक- श्री राजेन्‍द्र नारायण लाल ('इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय जीवन व्‍यवस्‍था')


आवागमन के तीन विरोधी तर्क (दलीलें)

इस क्रम मे सबसे बड़ी बात यह है कि सारे संसार के विद्वानों और शोध कार्य करने वाले साइंस दानों का कहना है कि इस धरती पर सबसे पहले वनस्पति जगत ने जन्म लिया। फिर जानवर पैदा हुए और उसके करोड़ों वर्ष बाद इन्सान का जन्म हुआ। अब जबकि इंसान अभी इस धरती पर पैदा ही नही हुए थे और किसी इन्सानी आत्मा ने अभी बुरे कर्म नहीं किए थे तो किन आत्माओं ने वनस्पति और जानवरों के शरीर में जन्म लिया?
दूसरी बात यह है कि इस धारणा का मान लेने के बाद यह मानना पड़ेगा कि इस धरती पर प्राणियों की संख्या में लगातार कमी होती रहे। जो आत्मायें मोक्ष प्राप्त कर लेंगी। उनकी संख्या कम होती रहनी चाहिये। अब कि यह तथ्य हमारे सागने है कि इस विशाल धरती पर इन्सान जीव जन्तु और वनस्पति हर प्रकार के प्राणियों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
तीसरी बात यह है कि इस संसार में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या में ज़मीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है। मरनेवाले मनुष्य की तुलना में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। कभी-कभी करोड़ो मच्छर पैदा हो जाते है जब कि मरने वाले उससे बहुत कम होते है। कहीं-कहीं कुछ बच्चों के बारे में यह मशहूर हो जाता है कि वह उस जगह को पहचान रहा है जहा वह रहता था, अपना पुराना, नाम बता देता है। और यह भी कि वह दोबारा जन्म ले रहा है। यह सब शैतान और भूत-प्रेत होते हैं जो बच्चों के सिर चढ़ कर बोलते है और इन्सानों के दीन ईमान को खराब करते हैं।
सच्ची बात यह है कि यह सच्चाई मरने के बाद हर इन्सान के सामने आ जायेगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने मालिक के पास जाता है, और इस संसार मे उसने जैसे कर्म किये है उनके हिसाब से सज़ा अथवा बदला पायेगा।
कर्मो का फल मिलेगा
यदि वह सतकर्म करेगा भलाई और नेकी की राह पर चलेगा तो वह स्वर्ग में जायेगा। स्वर्ग जहाँ हर आराम की चीज़ है। और ऐसी-ऐसी सुखप्रद और आराम की चीज़ें है जिनकों इस संसार में न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी दिल में उसका ख़्याल गुजारा। और सबसे बड़ी जन्नत (स्वर्ग) की उपलब्धि यह होगी कि स्वर्गवासी लोग वहॉ अपने मालिक के अपनी आँखों से दर्शन कर सकेंगे। जिसके बराबर विनोद और मजे़ कोई चीज नहीं होगी।
इस प्रकार जो लोग कुकर्म (बुरे काम) करेंगे, पाप करके अपने मालिक की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, वह नरक मे डाले जायेगे, वह वहॉ आग में जलेंगे। वहॉ उन्हें हर पाप की सज़ा और दंड मिलेगा। और सब से बड़ी सजा यह होगी कि वह अपने मालिक के दर्शन से वंचित रह जाऐगे। और उन पर उनके मालिक का अत्यन्त क्रोध होगा।­