शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

आवागमनीय पुनर्जन्‍म

 
      आर्यों की मान्‍यता है कि दुनिया में जो बन्‍दे गुनाह करते हैं उनकी सजा के लिए हैवानों के शरीर में उन्‍हें जाना पड़ता है. मगर किस तरह ? बैठे-बैठे हैवान नहीं बन जाते बल्कि बाकायदा अण्‍डे के अन्‍दर या हैवानों के पेट में शरीर तैयार होता है इसमें गुनाहगार (पापी) आदमी की रूह (आत्‍मा)डाली जाती है अर्थात् दुनिया का इन्तिजाम जिस कदर खुदा ने इंसानों और हैवानों में मिलाप का रखा है यह सब प्रबन्‍ध बन्‍दों के गुनाहों पर निर्भर करता है. चुनांचि आर्य धर्म मे एक समर्थक (पण्डित लेखराम) अपने रिसाले (पत्रिका) ‘’सबूत तनासुख’’ में यूं कलमबन्‍द हैं
      ‘’मसअला आवागमन (तनासुख) की रू से दो किस्‍म के शरीर माने गये हैं एक कर्मयोनि (आमाल खाना), दूसरा भोग योनि (सजा़ख़ाना. शरीर में समझने की ताक़त और अच्‍छा बुरा समझने की तमीज़ दी गई है वह कर्म योनि और जिस शरीर में नहीं दी गई है वह भोग योनि है. इस लिहाज से इंसान कर्म योनि और बाकी भोग योनि है. चूंकि हैवान भोग योनि है वह नेक या बद काम कर नहीं सकते जिस तरह जेल खा़ना के कै़दी सजा़ की अबधि गुज़र जाने के बाद जेल से रिहाई होती है न कि किसी अच्‍छे कर्म से. इसी प्रकार सजा़ की अबधि गुजरने के बाद हैवानी शरीर से रिहाई होनी चाहिए और फिर जिस दर्जा शरीर से पतन हुआ या उसी स्थिति में परिवर्तन किया जाता है हैवानी शरीर के पुन्‍य कर्मों से नहीं.’’ (सबूत तनावसुख पेज 197-198)
      उल्‍लेखनीय है कि तनासुख जिसे हिन्‍दी में पुनर्जन्‍म और आवागम भी कहते हैं यह है कि आत्‍मा छोड़ने इस शरीर के जिसमें वह अब है किसी ऐसे शरीर में चली जाय जो हस्‍बे दस्‍तूर मां के पेट या अण्‍डे के अन्‍दर तैयार हुआ हो, जिसको दूसरो शब्‍दों में तनासुख तवालुद भी कहते हैं यह है आर्यों का दावा.

      आर्यों का दावा जो हमने उनकी किताब से नकल किया है अपने अर्थ बतलाने में बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है है किसी व्‍याख्‍या और टिप्‍पणी का मुहताज नहीं. मजमून स्‍पष्‍ट है कि मनुष्‍य शरीर आत्‍मा के लिए असल है और बाकी हैवानी शरीर बतौर सजा़ पाप के अनुसार मिलते हैं. इसी तरह अगर यही आर्यों की मान्‍यता है और निस्‍संदेह यही है तो हमारी तरफ से इस पर संक्षिप्‍त सी द़्रष्टि है.

1.                  जब मनुष्‍य शरीर भोग योनि (कै़दखाना) नहीं तो फिर प्रश्‍न कि जिससे बजान आकर आप लोगों ने तनासुख तराशा था इसी तरह बहाल रहा. इस प्रश्‍न से बचने की गरज से आप लोगों ने पुनर्जन्‍म (पूर्व कर्म) का बदला माना था जिस मनुष्‍य ने जो कुछ पहली योनि में किया वहीं इसको वहां मिलता है और जो कुछ यहां करता है वह किसी दूसरी योनि में मिलेगा लेकिन आर्य मुसाफिर का उक्‍त कथन कहा रहा है कि मनुष्‍य शरीर भोग योनि नहीं जिसको दूसरे शब्‍दों में यूं कहें कि मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए प्रस्‍तावित नहीं हुआ बल्कि आत्‍माओं की असल मंजिल है. जब ही तो आपकी मिसाल कै़दी वाली सही होगी तो अब बतलाइये लंगड़ा लंगड़ा क्‍यों हुआ और कोढ़ी कोढ़ी क्‍यों हुआ और अन्‍धा अन्‍धा क्‍यों हुआ. अगर घबराकर कहें कि पिछले कर्मों का बदला है तो गलत, जबकि मनुष्‍य योनि भोग योनि नहीं तो इस योनि में पहले जुर्मों की सजा़ कैसी. अरबी मिसल (कहावत) निःसंदेह सच है (अर्थ)- ‘’मेंह से भाग कर परनाले के नीचे आ खडा़ हुआ.’’
2.                  सही बात तो यह है कि जिस मुजरिम को सजा़ देकर उसकी असली हालत की तरफ़ फैरना हो उसको सजा़ का ज्ञान भी होना चाहिए कि यह सजा़ म़ुझको अमुक पाप के बदले में मिली है ताकि भविष्‍य में इस पाप से बचे. इसी प्रकार अगर मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए है तो हैवानों (पशुओं) को भी उस जुर्म की ख़बर होनी चाहिए कि अमुक जुर्म की के कारण मुझे सजा़ मिली है ताकि इस सजा़ के पूरी करने के बाद मनुष्‍य शरीर में आकर वैसे जुर्म न करे. लेकिन इसकी विपरीत हम देखते हैं कि किसी आर्य को खबर नहीं कि पहले वह किस हैवान (कुत्‍ते, बिल्‍ले, घोड़े, बैल) की योनि में था और किस जुर्म की सजा़ का बदला था.


3.                  अगर मनुष्‍य दुष्‍कर्म की सजा़ भुगत कर अपनी वास्‍तविक हालत की तरफ ही आता है तो बेचारे अन्‍धे, कोढ़ी, भिक्षु, गरीब, फाके पर फाके उठाने वाले क्‍या हमेशा उसी हालत में रहेंगे और हमेशा से उसी हालत में हैं क्‍योंकि आपके कथनानुसार जिस दर्जा जिस्‍मानी (शरीर के रूप) से पतन हुआ था उसी रूप में इन्‍तका़ल (स्‍थानान्‍तरण) किया जाता है तो क्‍या उन असहायों की आत्‍मा ने कोई शपथ पत्र लिख दिया हुआ है कि हमें यही हालत पसन्‍द है.
4.                  अगर मनुष्‍य शरीर भोग योनि और जुर्मों के लिए सजा़खाना है तो आप लोगों को मुसलमानों और अन्‍य मांसाहारी कौ़मों का शुक्रगुजा़र होना चाहिए जो जानवरों को जिब्‍ह करके बहुतेरे आर्यों के भाई-बन्‍दों की निजात(मोक्ष)कराते हैं या कराने के सबब हैं.


5.                  अगर इस मनुष्‍य शरीर में आत्‍मा अपने असली तका़जा़ को पूरा न करेगी तो कौन से शरीर में करेगी, हालांकि हम देखते हैं कि बहुत से लोगों को सांसारिक निषिद्वों के अतिरिक्‍त प्राक्रतिक निषिद्व भी होते हैं. उदाहरणस्‍वरूप- आंख से अन्‍धा होना या कान से बहरा होना या किसी ऐसे निर्धन के घर में पैदा होना जहां वह सिवाय पेट पालने के (वह भी भीख मांगने और पाखा़ना उठाने से) कुछ कर ही नहीं सकते.


6.                  अगर मनुष्‍य का शरीर वास्‍तविक है और जिस शरीर से स्‍थानान्‍तरण होता है उसी शरीर में आत्‍मा आती है तो अवयस्‍क बच्‍चे क्‍या इसी तरह मरते रहेंगे और उनकी आत्‍माऐं हमेशा से इसी तरह छोटी उम्र में बल्कि कुछ मां के पेट में हो शरीर छोड़ती आयी हैं. अगर उल्लिखित दर्जा शरीर का अर्थ यह बतलाओ कि अमीरी और गरीबी की दशा से तात्‍पर्य है और तो फिर वही सवाल होगा कि गरीब, बदमाश, भंगड़ जो निर्धनता के कारण समस्‍त बुरे कर्म कर गुजरते हैं यही उनके लिए वास्‍तविक रूप है तो इन बेचारों की कैसी शामत आयी है कि एक तो निर्धनता और असमर्थता के बद कर्म करने पर सांसारिक हाकिम उनको कै़द करें और फिर वहां से ख़लासी (मोक्ष) पाकर भी आयें तो फिर वही नादारी और गरीबी के शरीर में परमेश्‍वर उनको ठूसें. फिर इसी तरह हमेशा तक उनकी बुरी गत होती रहे और अगर यह नेक भी हों तो क्‍या फा़यदा जबकि थोडे़ गुनाह पर भी है बाकी़ शरीर में कै़द होना और वहां से छूटकर वास्‍तविक हालत (गरीबी और मुहताजी) में आना है तो क्‍या नतीजा होगा इससे बहतर है कि इस बेचारी आत्‍मा को जो बकौ़ल आपके खुदा की पैदाइश भी नहीं. इस चन्‍द रोज़ की जि़न्‍दगी के अहसानों के बदले में (जो इस गरीबी) और मुहताजी की हालत में खुदा ने उन पर किये थे और दर-दर भीख मंगाई थी, उनसे दुगने चौगने बरस कै़द कर लिया जाता और फिर हमेशा के लिए इस कमबख्‍त़ को रिहाई होती और अपनी कमाई से आप गुजा़रा करती और ऐसे खुदा को दूर से सलाम कहती. सच पूछो तो खुदा अगर उसे छोड़ दे तो कभी भी खुदा के सामने न आवे और एक ही बार के आजमाने पर उसके बुलाने पर भी दूर से उसको लिख भेजे- (अर्थ)’’आज़माए हुए को आज़माने से निदामत (शर्मिन्‍दगी) हासिल होती है.’’


7.                  अगर मनुष्‍य शरीर आत्‍माओं के लिए असल है और हैवानी शरीर कै़दखा़ना तो बतलाइये यदि एक हजार या कम से कम सौ साल तक तमाम मख़लूक (जीव) नेक काम करे और कोई ऐसा काम न करे जिससे वह लायके़ सजा़ (सजा़ योग्‍य) हो तो उनकी दीनदारी के यह तो हैवानात (पशुओं) के शरीर में जाने से रहे हों. अल्‍बत्‍ता हैवानात अपनी-अपनी कै़द भुगत कर वास्‍तविक हालत (मनुष्‍य शरीर) की तरफ आवेगी जिसकी वजह से हैवानात में एक रोज़ ऐसी कमी होगी कि हमारी सवारी के लिए कोई घोड़ा, दूध के लिए कोई गाय और शहद के लिए कोई मक्‍खी भी न मिलेगी. क्‍या फिर इन बेचारे नेकियों का जो कई सालों तक नेकी के कामों में लगे रहे, यही इनाम होना चाहिए था जो आराम उनको बदकारी (दुष्‍कर्म) में था. गाड़ी सवारी को, गाय भैंस दूध पीने को, जानवर बोझदारी को वह भी हाथ से जाते रहे, बल्कि बगै़र देखे तो कुल इन्तिजा़म-ए-आलम (सम्‍पूर्ण स्रष्टि के प्रबन्‍धन) में अन्‍तर आ गया.


8.                  शाब्दिक परिवर्तन से हम यह भी कह सकते हैं कि अगर हैवानी शरीर भोग योनि है तो हम फर्ज़ करते हैं कि तमाम दुनिया में दो सौ साल तक तमाम लोग बदकार गददार (जैसा कि आजकल सामान्‍यत हैं) बलात्‍कारी, शराबी कुल के कुल इसी किस्‍म के हो रहे है. जिनमें से कोई भी मनुष्‍य शरीर के योग्‍य न हो तो बताइये तमाम दुनिया का इन्तिजाम कैसे होगा ? जबकि सारे ही जीव (रूह) अपनी बदकारी के कारण हैवानी शरीर में चले गये और एक रोज़ ऐसा आ पहुंचा कि सब के सब हैवानात हो गये और मनुष्‍य एक भी न हो तो नतीजा बुद्विजीवी सोच लें.

रूपान्‍तरितमसअला तनासुख (उर्दू)
लेखक- मौलाना अबुल वफा़ सनाउल्‍लाह अमरतसरी (रहमतुल्‍लाह)

पुनर्जन्‍म सिद्धांत

      पुनर्जन्‍म सिद्धांत सर्वमान्‍य सिद्धांत के रूप में माना जा रहा है׀ हिन्‍दुओं के ईश्‍वरीकृत वेदों में मूलतः पुनर्जन्‍म का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं है׀ यह बाद की कल्‍पना है׀ हिन्‍दुओं के घर में हर वाद पर विवाद है׀ पुनर्जन्‍म के साथ भी विरोधावास है׀ हिन्‍दुओं के धार्मिक ग्रन्‍थों में और सामान्‍य धार्मिक विश्‍वासों में और विशेषकर गरूड़ पुराण में स्‍वर्ण-नरक को भी मान्‍यता है׀ मरने वाले के लिए अनिवार्यतः स्‍वर्गवासी शब्‍द का प्रयोग हिन्‍दुओं में किया जाता है׀ गीता में जहां मृत्‍यु को पुराने वस्‍त्र त्‍याग और उसके बाद नए वस्‍त्र के रूप में अन्‍य जीवन धारण बतलाकर अर्जन को इस शरीर की नश्‍वरता का ज्ञान कराया गया है वहीं इसी गीता में अर्जुन को प्रभावी ढंग से उदबोधन हेतु कहा गया है कि अगर मरोग तो स्‍वर्ग में जाओगे और जीतोगे तो राज्‍य भोगोगे׀ इससे यह सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म और आवागमन सिद्धांत के बावजूद हिन्‍दुओं के साथ धार्मिक और नैतिक रूप से स्‍वर्ग-नरक का विश्‍वास भी सामान्‍यतः जुड़ा़ हुआ है׀ गीता की उपरोक्‍त उक्ति से यह भी सिद्ध होता है नैतिकता के लिए प्रेरणा स्‍वर्ग-नरक के विश्‍वास से ही संभव है׀ आखिर गीता का उद्देश्‍य अर्जुन को निमित्‍त मात्र बनाकर मानव को नैतिक कार्य के लिए प्रेरित ही तो करना था और इसके लिए कृष्‍ण ने स्‍वर्ग की उपलब्धि को ही मात्र उपाय समझा׀ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म हिन्‍दू दर्शन का एक दार्शनिक सिद्धांत भले ही हो, लेकिन धार्मिक मान्‍यता स्‍वर्ग-नरक की ही है׀ पुनर्जन्‍म का सिद्धांत तर्क शास्‍त्र के भी विपरीत है׀ कहा जाता है कि यह कलियुग है और पाप बढ़ता जा रहा है׀ सत्‍ययुग में पाप कम होते थे׀ साथ ही साथ यह भी कहा जाता है कि पुण्‍य से ही मनुष्‍य योनि प्राप्‍त होती है और पाप से पशु योनि׀ यदि ऐसा है तो आजकल जब कलियुग है और पाप चरम सीमा तक बढ़ रहे हैं, नित्‍य मनुष्‍यों की आबादी कैसे बढ़ रही है? जब पानी इसी जन्‍म में किए हुए पाप का अहसास नहीं करता तो पूर्वजन्‍म का उसे कैसे अहसास कराया जा सकता है? कदापि नहीं׀ तब इस परिस्थिति में पुनर्जन्‍म का सिद्धांत व्‍यर्थ और अनुपयोगी है׀ यह नैतिक शास्‍त्र के भी विरूद्ध है׀ मान लीजिए कि किसी का नौजवान पुत्र मर जाए और हमें वहां शोक सान्‍त्‍वना देने के लिए जाना पड़े तो क्‍या हम उस दुःखी पिता से यह कहें कि पुनर्जन्‍म में आपने किसी के पुत्र की हत्‍या की थी׀ दुःख में स्‍वयं को और दूसरों को सान्‍त्‍वना इसी कथन और विश्‍वास में निहित है कि धीरज रखिए׀

लेखक- श्री राजेन्‍द्र नारायण लाल ('इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय जीवन व्‍यवस्‍था')


आवागमन के तीन विरोधी तर्क (दलीलें)

इस क्रम मे सबसे बड़ी बात यह है कि सारे संसार के विद्वानों और शोध कार्य करने वाले साइंस दानों का कहना है कि इस धरती पर सबसे पहले वनस्पति जगत ने जन्म लिया। फिर जानवर पैदा हुए और उसके करोड़ों वर्ष बाद इन्सान का जन्म हुआ। अब जबकि इंसान अभी इस धरती पर पैदा ही नही हुए थे और किसी इन्सानी आत्मा ने अभी बुरे कर्म नहीं किए थे तो किन आत्माओं ने वनस्पति और जानवरों के शरीर में जन्म लिया?
दूसरी बात यह है कि इस धारणा का मान लेने के बाद यह मानना पड़ेगा कि इस धरती पर प्राणियों की संख्या में लगातार कमी होती रहे। जो आत्मायें मोक्ष प्राप्त कर लेंगी। उनकी संख्या कम होती रहनी चाहिये। अब कि यह तथ्य हमारे सागने है कि इस विशाल धरती पर इन्सान जीव जन्तु और वनस्पति हर प्रकार के प्राणियों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
तीसरी बात यह है कि इस संसार में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या में ज़मीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है। मरनेवाले मनुष्य की तुलना में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। कभी-कभी करोड़ो मच्छर पैदा हो जाते है जब कि मरने वाले उससे बहुत कम होते है। कहीं-कहीं कुछ बच्चों के बारे में यह मशहूर हो जाता है कि वह उस जगह को पहचान रहा है जहा वह रहता था, अपना पुराना, नाम बता देता है। और यह भी कि वह दोबारा जन्म ले रहा है। यह सब शैतान और भूत-प्रेत होते हैं जो बच्चों के सिर चढ़ कर बोलते है और इन्सानों के दीन ईमान को खराब करते हैं।
सच्ची बात यह है कि यह सच्चाई मरने के बाद हर इन्सान के सामने आ जायेगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने मालिक के पास जाता है, और इस संसार मे उसने जैसे कर्म किये है उनके हिसाब से सज़ा अथवा बदला पायेगा।
कर्मो का फल मिलेगा
यदि वह सतकर्म करेगा भलाई और नेकी की राह पर चलेगा तो वह स्वर्ग में जायेगा। स्वर्ग जहाँ हर आराम की चीज़ है। और ऐसी-ऐसी सुखप्रद और आराम की चीज़ें है जिनकों इस संसार में न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी दिल में उसका ख़्याल गुजारा। और सबसे बड़ी जन्नत (स्वर्ग) की उपलब्धि यह होगी कि स्वर्गवासी लोग वहॉ अपने मालिक के अपनी आँखों से दर्शन कर सकेंगे। जिसके बराबर विनोद और मजे़ कोई चीज नहीं होगी।
इस प्रकार जो लोग कुकर्म (बुरे काम) करेंगे, पाप करके अपने मालिक की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, वह नरक मे डाले जायेगे, वह वहॉ आग में जलेंगे। वहॉ उन्हें हर पाप की सज़ा और दंड मिलेगा। और सब से बड़ी सजा यह होगी कि वह अपने मालिक के दर्शन से वंचित रह जाऐगे। और उन पर उनके मालिक का अत्यन्त क्रोध होगा।­


बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है?

मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है? क्या उनके पास इसके संतोषजनक कारण हैं?
हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
प्रिय प्रश्नकर्ता,
शुभ प्रणाम के बाद,
पहले पहल तो आप का प्रश्न एक ऐसे व्यक्ति की तरफ से जो इस्लाम धर्म में प्रवेश नहीं किया है उचित प्रतीक होता है, किन्तु जो आदमी इस धर्म को व्यवहार में ला चुका है, इसके अंदर जो चीज़ें हैं उन पर उसका विश्वास और आस्था है और वह उस के अनुसार कार्य कर रहा है, तो उसे पूर्णतया उस नेमत की मात्रा का पता है जिस में वह जीवन यापन कर रहा है और वह इस धर्म की छत्र छाया में रह रहा है, इसके बहुत सारे कारण हैं जिन में से कुछ निम्नलिखित हैं :
1- मुसलमान केवल एक माबूद (पूज्य) की उपासना करता है जिसका कोई साझीदार नहीं, जिसके सुंदर नाम और उच्चतम गुण हैं। चुनाँचि मुसलमान की दिशा और उसका उद्देश्य एक होता है, वह अपने पालनहार और सृष्टिकर्ता पर विश्वास रखता और उसी पर भरोसा करता है, और उसी से मदद, सहायता और समर्थन मांगता है, वह इस बात पर विश्वास रखता है कि उस का पालनहार हर चीज़ पर सक्षम और शक्तिवान है, उसे बीवी और बच्चे की आवश्यकता नहीं है, उस ने आसमानों और धरती को पैदा किया, वही मारने वाला, जिलाने वाला, पैदा करने वाला और रोज़ी देने वाला है। अत: मुसलमान बन्दा उसी से रोज़ी मांगता है। वह अल्लाह सुनने वाला क़बूल करने वाला है, अत: बन्दा उसी को पुकारता (दुआ करता) और क़बूलियत की आशा रखता है। वह अल्लाह तौबा स्वीकार करने वाला, क्षमा करने वाला दयावान् है अत: बन्दा जब पाप करता है और अपने रब की इबादत में कोताही करता है, तो उसी के सामने तौबा करता है। वह अल्लाह सर्वज्ञानी, सब चीज़ों की सूचना रखने वाला, और देखने वाला है जो कि दिल की इच्छाओं, भेदों और सीने की बातों को भी जानता है, अत: बन्दा गुनाह के पास जाने से शर्म करता है और अपने नफ्स पर या किसी दूसरे पर ज़ुल्म नहीं करता है, क्योंकि वह जानता है कि उसका पालनहार उस से अवगत है और उसे देख रहा है। वह जानता है कि उस का रब हकीम (तत्वदर्शी) है, ग़ैब (प्रोक्ष) की बातों का जानने वाला है, अत: जो कुछ अल्लाह ने उसके लिए चयन किया है और उस के बारे में मुक़द्दर किया है, उस पर विश्वास और भरोसा करता है, और इस बात को मानता है कि उसके रब ने उस पर ज़ुल्म नहीं किया है, और उस ने उसके लिए जो भी फैसला किया है वह उसके लिए बेहतर है, अगरचे बन्दे को उसकी हिकमत (तत्वदर्शिता) का ज्ञान न हो।
2- मुसलमान की आत्मा पर इस्लामी उपासनाओं के प्रभाव : नमाज़ बन्दा और उसके पालनहार के बीच संपर्क का एक साधन है, जब वह विनम्रता के साथ नमाज़ में प्रवेश करता है तो सुकून (शान्ति), इत्मेनान (संतुष्टि) और आराम का अनुभव करता है, क्योंकि वह एक मज़बूत स्तंभ का शरण लेता है और वह अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल है, इसीलिए इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहा करते थे : हमें नमाज़ के द्वारा राहत पहुँचाओ, और जब आप को कोई मामला पेश आता था तो आप नमाज़ की तरफ भागते थे। हर वह आदमी जो किसी मुसीबत में पड़ गया और नमाज़ को आज़माया तो उसे जो मुसीबत पहुँची है उस से ढारस (सांत्वना) और धैर्य की सहायता का अनुभव हुआ है। इस का कारण यह है कि वह नमाज़ में अपने रब के कलाम (वाणी) को पढ़ता है और रब के कलाम (वाणी) के प्रभाव की तुलना किसी मनुष्य के कलाम के प्रभाव से नहीं की जा सकती। जब कुछ मनोवैज्ञानिकों के कलाम से कुछ राहत मिल सकती है तो जिसने मनोवैज्ञानिक को पैदा किया है उसके कलाम का प्रभाव कितना व्यापक होगा।
और जब हम ज़कात की ओर आते हैं जो कि इस्लाम का एक स्तंभ है, तो वह आत्मा को कंजूसी और लालच से पाक करने, दानशीलता की आदत डालने, गरीबों और ज़रूरतंमदों की सहायता करने के लिए है और एक अज्र व सवाब है जो अन्य इबादतों के समान क़ियामत के दिन लाभ देगा, मानव द्वारा लगाये जाने वाले करों के समान कठोर और बोझ नहीं है, यह एक हज़ार (1000) में केवल 25 है जिसे एक सच्चा मुसलमान इच्छापूर्वक अदा करता है, वह उस से भागता नहीं है, यहाँ तक कि अगर कोई उसके पीछे लगने वाला न हो।
जहाँ तक रोज़ा का संबंध है तो वह अल्लाह की उपासना के स्वरूप खाने पीने की चीज़ों और संभोग से रूक जाना है, और इस में भूखे और वंचित लोगों की भावनाओं का एहसास होता है, तथा सृष्टि पर सृष्टिकर्ता की नेमतों को याद दिलाना है तथा इस में अनगिनत अज्र व सवाब (पुण्य) है।
अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज (तीर्थ यात्रा) जो इब्राहीम अलैहिस्सलाम के द्वारा बनाया गया था, यह अल्लाह के आदेश का अनुपालन, दुआ की क़ुबूलियत और दुनिया भर के मुसलमानों से मिलने का शुभ अवसर है।
3- इस्लाम ने प्रत्येक भलाई का आदेश किया है और प्रत्येक बुराई से रोका है, सभी आचरण व व्यवहार और शिष्टाचार का ओदश दिया है, जैसे सच्चाई, विवेचना, सहनशीलतान विनम्रता, नम्रता, नरमी, शर्म व हया, वादा पूरा करना, गरिमान दया, न्यायन साहसन धैर्य, मित्रता, सन्तुष्टि, सतीत्वता, शुद्धता, एहसान व भलाई, आसानी, विश्वस्नीयता (अमानतदारी), एहसान वा भलाई का आभारी होना, क्रोध को दबा लेना (गुस्सा पी जाना)। तथा माता-पिता के साथ सदव्यवहार करने, रिश्तेदारों के साथ संबंध बनाये रखने, पीड़ितों और ज़रूरतमंदों की मदद करने, पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करने, अनाथ की संपत्ति की रक्षा और उसकी देख-रेख करने, छोटों पर दया करने, बड़ों का सम्मान करने, नौकरों और जानवरों के साथ कोमलता बरतने, रास्ते से हानिकारक और कष्टदायक चीज़ों को हटाने, मीठी बोल बोलने, बदला लेने की ताकत के बावजूद माफ कर देने, एक मुसलमान का अपने मुसलमान भाई के प्रति शुभ चिंतक होने और उसे नसीहत करने, मुसलमानों की आवश्यकताओं को पूरा करने, क़र्ज चुकाने में असमर्थ व्यक्ति को मोहलत (छूट) देने, अपने ऊपर दूसरे को वरीयता देने, ढारस बंधाने और दिलासा देने, हँसते हुए चेहरे के साथ लोगों का अभिवादन करने, पीड़ित की मदद करने, बीमार का दौरा करने, अत्याचार से ग्रस्त लोगों की सहायता करने, दोस्तों को उपहार देने, मेहमान का मान सम्मान करने, पत्नी के साथ अच्छा रहन सहन करने, उस पर और उसके बच्चों पर खर्च करने, सलाम को फैलाने, अन्य व्यक्ति के घर में प्रवेश करने से पहले अनुमति लेने का आदेश किया है ताकि आदमी घर वालों के निजी और पर्दा करने की चीज़ों को न देखे।
जब कुछ गैर मुस्लिम इन में से कुछ चीज़ों को करते हैं, तो वे ऐसा केवल सामान्य शिष्टाचार के रूप में करते हैं, किन्तु उन्हें अल्लाह से बदले, पुण्य और प्रलय के दिन कामयाबी और सफलता की आशा नहीं होती है।
जब हम उन चीज़ों की तरफ आते हैं जिन से इस्लाम ने रोका है, तो हम उन्हें व्यक्ति और समाज के हित में पाते हैं, सभी निषिद्ध बातें अल्लाह और बन्दे के बीच, तथा मनुष्य और स्वयं उसके नफ्स के बीच तथा मनुष्यों में से एक दूसरे के बीच संबंध की रक्षा करने के लिए हैं, उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए आईये हम ढेर सारे उदाहरण लेते हैं :
इस्लाम ने अल्लाह के साथ शिर्क करने और अल्लाह को छोड़ कर दूसरे की पूजा करने से रोका है, और यह कि अल्लाह के सिवा दूसरे की इबादत करना दुर्भाग्य और बिपदा है, तथा नुजूमियों और ज्योतिशियों के पास जाने और उनकी पुष्टि करने से रोका है, इसी तरह जादू से मना किया है जो दो व्यक्तियों के बीच जुदाई डालने या उनके बीच संबंध पैदा करने के लिए किया जाता है, लोगों के जीवन और संसार की घटनाओं में तारों और सितारों के प्रभाव के बारे में आस्था रखने से, ज़माने को बुरा भला कहने (गाली देने) से मना किया है क्योंकि अल्लाह ही ज़माने को उलट फेर करता है, तथा बुरा शकुन लेने से रोका है, क्योंकि यह अंधविश्वास और निराशावाद है।
इस्लाम ने नेकियों और अच्छे कामों को रियाकारी (दिखावा), शोहरत की इच्छा और किसी पर एहसान जतलाने के द्वारा नष्ट करने से रोका है।
अल्लाह को छोड़ कर किसी अन्य को सज्दा करने के लिए झुकने (शीश नवाने), मुनाफिक़ो (पाखंडियों) या फासिक़ों (पापियों) के साथ, उनसे मानूस होते हुये या उन्हें मानूस करते हुए, बैठने से रोका है।
तथा आपस में एक दूसरे को अल्लाह की फटकार, या उसके क्रोध, या नरक के द्वारा धिक्कार करने (लानत भेजने) से मनाही किया है।
स्थिर (ठहरे हुये) पानी में पेशाब करने, सार्वजनिक रास्ते, लोगों के छाया हासिल करने की जगहों और पानी के घाट पर शौच करने से रोका है, तथा पेशाब या पैखाना करते समय क़िब्ला (मक्का में अल्लाह के घर) की ओर मुँह या पीठ करने से रोका है, पेशाब करते समय आदमी को दाहिने हाथ से अपने लिंग को पकड़ने से रोका है, जो आदमी शौच कर रहा हो उस को सलाम करने से रोका है, तथा नींद से जागने वाले आदमी को बर्तन में अपना हाथ डालने से रोका यहाँ तक कि वह उसे धुल ले।
तथा सूरज के उगते समय, उसके ढलते समय और उसके डूबते समय नफ्ल नमाज़ पढ़ने से रोका है, क्योंकि वह शैतान की दो सींगों के बीच उगता और डूबता है।
तथा जब आदमी के सामने भोजन तैयार हो और वह उसके खाने का इच्छुक हो, तो उस हालत में नमाज़ पढ़ने से रोका है, इसी तरह आदमी को ऐसी स्थिति में नमाज़ पढ़ने से रोका है जब वह पेशाब, पैखाना और हवा (गैस) को रोक रहा हो, क्योंकि यह सभी स्थितियाँ नमाज़ी को अपेक्षित एकाग्रता और ध्यान से विचलित कर देती हैं।
तथा नमाज़ी को नमाज़ के अंदर अपनी आवाज़ को ऊँची करने से रोका है ताकि दूसरे मोमिनों को इस से कष्ट न पहुँचे, तथा जब आदमी ऊँघ रहा हो तो उसे  क़ियामुल्लैल (तहज्जुद) को जारी रखने से रोका है, बल्कि उसे सो जाना चाहिए फिर उठ कर  क़ियामुल्लैल करना चाहिए, इसी तरह पूरी रात जाग कर इबादत करने से रोका है विशेषकर जब यह निरंतर हो।
इसी तरह नमाज़ी को मात्र वुज़ू टूटने का शक हो जाने के कारण अपनी नमाज़ से बाहर निकलने से रोका है यहाँ तक कि वह हवा निकलने की आवाज़ सुन ले या बदबू महसूस करे।
मिस्जदों में खरीदने बेचने और गुमशुदा चीज़ का एलान करने से रोका है क्योंकि ये इबादत और अल्लाह के ज़िक्र के स्थान हैं, इसलिए इन में दुनियावी काम करना उचित नहीं है।
जब नमाज़ की जमाअत खड़ी हो जाये तो तेज़ चलकर आने से रोका है, बल्कि सुकून और वक़ार के साथ चलना चाहिये, इसी तरह मिस्जदों के विषय में आपस में गर्व करने और उसे लाल या पीले रंग, या चमक दमक की चीज़ों से सजाने और हर उस चीज़ से रोका है जो नमाज़ियों के ध्यान को बांट देते हैं।
तथा एक दिन के रोज़े को दूसरे दिन के रोज़े से उनके बीच में इफ्तारी किए बिना मिलाने से रोका है, इसी तरह महिला को अपने पति की उपस्थिति में उसकी अनुमति के बिना नफ्ली रोज़ा रखने से रोका है।
क़ब्रों पर निर्माण करने, या उसे ऊँची करने, उस पर बैठने, जूता-चप्पल पहन कर उनके बीच चलने फिरने, उस पर रौशनी करने, उस पर कोई चीज़ लिखने और उसे उखाड़ने से रोका है, इसी तरह क़ब्रों को मिस्जदें (पूजास्थल) बनाने से मना किया है।
तथा किसी आदमी के मर जाने पर नौहा करने (रोने-पीटने), कपड़ा फाड़ने, बाल खोलने से मना किया है, जाहिलियत के काल के लोगों की तरह मरने की सूचना देने से मना किया है, किन्तु किसी के मरने की मात्र सूचना देने में कोई हरज (आपत्ति) नहीं है।
तथा सूद खाना निषिद्ध है, तथा हर वह क्रय-विक्रय जो अज्ञानता, धोखा-धड़ी पर आधारित हो वह निषिद्ध है, खून, शराब, सुअर और मूर्तियाँ बेचने से मना किया है, तथा जिस चीज़ को भी अल्लाह तआला ने हराम घोषित किया है, उसकी क़ीमत भी हराम है चाहे उसे बेचा जाये या खरीदा जाये, इसी तरह नज्श से रोका गया है और वह यह है कि जो आदमी खरीदना नहीं चाहता है वह सामान की क़ीमत को बढ़ा दे जैसाकि बहुत सी नीलामी की बोलियों में होता है, इसी तरह किसी सामान को बेचते समय उसके ऐब को छिपाने से रोका है, इसी तरह आदमी जिस चीज़ का मालिक नहीं है उस को बेचना तथा किसी चीज़ को अपने क़ब्ज़े में करने से पहले बेच देना निषिद्ध है, इसी तरह आदमी का अपने भाई के बेचने पर बेचना, अपने भाई की खरीद पर खरीद करना, और अपने भाई के भाव ताव पर भाव ताव करना निषिद्ध है। फलों को बेचने से रोका है यहाँ तक कि उसका पकना ज़ाहिर हो जाये और आफत ग्रस्त होने से सुरक्षित हो जाये, नाप और तौल में कमी करने से, ज़खीरा करने से, तथा ज़मीन या खजूर के बाग इत्यादि में हिस्से दार को अपने शेयर को बेचने से मना किया है यहाँ तक कि उसे अपने साथी पर पेश कर दे, यतीमों के माल को जुल्म करके खाने से से रोका है, जुवा (लाटरी) का धन खाने से परहेज़ करने का हुक्म दिया है, लूट खसूट और जुवा से, रिश्वत (घूँस) लेने और देने, लोगों का माल छीनने, लोगों का माल अवैध रूप से खाने, इसी तरह उसे नष्ट कर देने के इरादे से लेने से मना किया है, लोगों की चीज़ों में कमी करने (हक़ मारने), गिरी पड़ी चीज़ को छिपाने और गायब कर देने, गिरी पड़ी चीज़ को उठाने से रोका है सिवाय इसके कि वह उसकी पहचान (ऐलान) करवाये, हर प्रकार की धोखा-धड़ी, ऐसा क़ज़Z लेने से जिसे चुकाने का इरादा न हो, इसी तरह अपने मुसलमान भाई का माल उसकी खुशी के बिना लेने से मना किया है, इसी तरह शर्म व हया के तलवार से लिया गया माल हराम है, तथा सिफारिश के कारण उपहार स्वीकार करने से रोका है।
ब्रह्मचर्य और बधिया हो जाने से मना किया है, रिश्तेदारी के संबंधों को तोड़ने के डर से दो सगी बहनों को एक साथ शादी में रखने तथा किसी औरत और उसकी फूफी को और किसी औरत और उसकी खाला को एक साथ शादी में रखने से मना किया है, "शिगार" नामी (अर्थात् अदले बदले की) शादी से रोका है, और वह इस प्रकार है कि उदाहरण के तौर पर आदमी कहे कि तुम मुझ से अपनी बेटी या बहन की शादी कर दो और मैं अपनी बेटी या बहन की शादी तुम से कर दूँगा, इस प्रकार यह औरत दूसरी के बदले में हो, तो यह अन्याय और हराम है। तथा मुत्आ (अस्थायी शादी) से रोका है, जो कि दो पक्षों के बीच पारस्परिक सहमति से एक निर्धारित अवधि तक के लिए होता है और अवधि समाप्त होने पर उस शादी का अंत हो जाता है। मासिक धर्म की अवधि में बीवी से संभोग करने से रोका है, बल्कि जब वह पवित्र हो जाये तो उस से सहवास करे, तथा औरत के गुदा (पाखाने के रास्ते) में संभोग करना निषिद्ध है, अपने भाई के शादी के पैग़ाम (प्रस्ताव) पर शादी का पैग़ाम (प्रस्ताव) देना निषिद्ध है यहाँ तक कि वह उसे छोड़ दे या उसे अनुमति दे दे, पहले से शादीशुदा (जैसे बेवा या तलाक़शुदा) औरत की शादी उसकी सलाह व मश्वरा के बिना और कुँवारी औरत की शादी उसकी अनुमति लिए बिना करना निषिद्ध है, नवविवाहित जोड़े को एक खुशहाल जीवन और बेटे की बधाई देने से मना किया है, क्योंकि यह जाहिलियत के समय के लोगों की शुभकामना है जो लड़कियों से नफरत करते थे, तलाक़शुदा औरत को अपने गर्भ को छुपाने से रोका है, पति और पत्नी के बीच संभोग से संबंधित जो बातें होती हैं उन्हें दूसरों से बयान करने से रोका गया है, बीवी को उसके पति के खिलाफ भड़काने और तलाक़ से खिलवाड़ करने से रोका है, किसी औरत के लिए निषिद्ध है कि वह अपने बहन के तलाक़ का मुतालबा करे चाहे वह (पहले से उसकी) बीवी हो या शादी के लिए प्रस्तावित हो, उदाहरण के तौर पर एक औरत किसी मर्द से यह मांग करे कि वह अपनी बीवी को तलाक़ दे दे ताकि यह औरत उस से शादी कर ले, औरत को बिना इजाज़त अपने पति के धन से खर्च करने से मना किया है, औरत को अपने पति के बिस्तर को छोड़ने से रोका है, और यदि बिना किसी शरई कारण के ऐसा करती है तो फरिश्ते उस पर लानत भेजते हैं, आदमी को अपने बाप की बीवी से शादी करने से रोका है, आदमी को ऐसी औरत से संभोग करने से रोका है जो किसी दूसरे आदमी से गर्भवती हो, आदमी को अपनी आज़ाद बीवी से उसकी अनुमति के बिना अज़्ल करने से रोका गया है (अज़्ल कहते हैं कि संभोग के दौरान आदमी पत्नी की यौनि से बाहर वीर्यपात करे), आदमी को यात्रा से लौटते समय अचानक रात के समय अपनी पत्नी के पास आ धमकने से रोका है, हाँ अगर अपने आने के समय की पूर्व सूचना दे दे तो कोई बात नहीं, पति को अपनी पत्नी के मह्र को उसकी सहमति के बिना लेने से रोका है, तथा पत्नी को इस उद्देश्य से परेशान करने और हानि पहुँचाने से रोका है ताकि वह परेशान होकर अपना धन देकर उस से छुटकारा हासिल करे।
महिलाओं को अपने श्रृंगार का प्रदर्शन करने से रोका है, औरत के खतने में अति करने से रोका है, औरत को अपने पति के घर में उसकी अनुमति के बिना किसी दूसरे को प्रवेश दिलाने से रोका है, अगर शरीअत का विरोध न होता हो तो सामान्य अनुमति काफी है, माँ और उसके बच्चे के बीच जुदाई पैदा करने से रोका है, तथा दय्यूसियत (निर्लज्जता, अपने परिवार में अनैतिक कार्य देखकर चुप रहने) से रोका है, परायी महिला को नज़र उठाकर देखने, और एक आकस्मिक झलक के बाद दुबारा देखने से मना किया है।
मुर्दार खाने से रोका है, चाहे वह डूब कर मरा हो, या गला घोंटने से, या शाट (सदमा) से, या ऊँची जगह से गिरने से, तथा खून, सुअर के मांस से, और जो जानवर अल्लाह के अलावा किसी और के नाम पर ज़ब्ह किया गया हो, और जो मूर्तियों के लिए ज़ब्ह किया गया है, इन सब से रोका है।
ऐसे जानवरों का मांस खाने और उनका दूध पीने से रोका है जो गंदगियों और कचरों का आहार लेते हैं, इसी तरह नुकीले दाँत वाले मांसभक्षी जानवरों और पंजे से शिकार करने वाले परिंदों का गोश्त खाने, और पालतू गदहे का मांस खाने से मना किया है, जानवरों को तकलीफ देकर मारने अर्थात् उसे बांध कर किसी चीज़ से मारना यहाँ तक कि वह मर जाये, या उसे चारा (भोजन) के बिना बांधे रखने से मना किया है, दांत या नाखुन से जानवर को ज़ब्ह करने, दूसरे जानवर के सामने किसी जानवर को ज़ब्ह करने, या जानवर के सामने छुरी तेज़ करने से मना किया हैं।
कपड़े और अलंकरण के छेत्र में
लिबास और पहनावे में अपव्यय करने और पुरूषों को सोना पहनने से मना किया है, नग्न होने, नंगे चलने फिरने, रान को खोलने, टखनों से नीचे कपड़ा लटकाने, या गर्व के तौर पर कपड़ा घसीटने, और शोहरत (दिखावे) के कपड़े पहनने से मना किया है। 
झूठी गवाही से, पाकदामन औरत पर आरोप लगाने से, निर्दोष पर आरोप लगाने से और बुहतान अर्थात् किसी पर झूठ गढ़ने से मना किया है।
ऐब टटोलने, त्रुटियाँ निकालने, बुरे उपनाम के द्वारा बुलाने, गीबत, चुगलखोरी, मुसलमानों का उपहास करने, हसब व नसब पर गर्व करने, नसब में ऐब लगाने, गाली गलोज बकने, बुरी बात कहने, अश्लील और असभ्य तरीक़े से बात करने, ऊँची आवाज़ में बुरी बात कहने से मना किया है सिवाय उसके जिस पर अत्याचार किया गया हो।
झूठ बोलने से मना किया है और सबसे सख्त छूठ सपने के बारे में झूठ बोलना है, उदाहरण के तौर पर कोई प्रतिष्ठा, या भौतिक लाभ प्राप्त करने, या जिस से उसकी दुश्मनी है उसे भयभीत करने के लिए झूठा सपना गढ़ना।
आदमी को स्वयं अपनी प्रशंसा करने से मना किया है, सरगोशी (चुपके चुपके वार्तालाप) करने से मना किया है, अत: तीसरे को छोड़ कर दो आदमियों को सरगोशी नहीं करनी चाहिए ताकि वह चिंता ग्रस्त न हो, मोमिन (विश्वासी) पर अभिशाप करने या ऐसे आदमी को अभिशाप करने से मना किया है जो शापित किये जाने का योग्य नहीं है।
मृतकों की बुराई करना निषिद्ध है, तथा मौत की दुआ करने, या किसी मुसीबत से पीड़ित होने के कारण मौत की कामना करने, अपने ऊपर, संतान, नौकरों, और धन-संपत्ति पर शाप (बद-दुआ) करने से मना किया है।
जो खाना दूसरों के सामने है उस में से खाने से, तथा खाने के बीच में से खाने से मना किया है, बल्कि किनारे से खाना चाहिए क्योंकि बर्कत खाने के बीच में उतरती है, टूटे हुए बर्तन के टूटे हुए हिस्से से नहीं पीना चाहिए ताकि इस से उसे नुकसान न पहुँचे, बर्तन के मुँह से नहीं पीना चाहिए, तथा बर्तन में सांस लेने और पेट के बल लेट कर खाना खाने से मना किया है, ऐसे दस्तरख्वान पर बैठने से मना किया है जिस पर शराब पी जाती है।
सोते समय घर में आग को जलती छोड़ने से मना किया है, पेट के बल सोने से मना किया है, तथा इस बात से मना किया है कि आदमी बुरा सपना बयान करे या उसकी व्याख्या करे, क्योंकि यह शैतान की चाल है।
किसी को बिना अधिकार के क़त्ल करने से मना किया है, गरीबी के डर से बच्चों का क़त्ल करने से मना किया है, आत्म-हत्या करना निषिद्ध किया है, व्यभिचार, लौंडेबाज़ी (समलैंगिकता) करने, शराब पीने, उसे निचोड़ने, उसे उठाने और उसे बेचने से मना किया है, अल्लाह को नाराज़ करके लोगों को खुश करने से मना किया है, माता-पिता को डांट डपट करने और उफ तक कहने से भी मना किया है, बच्चे को अपने बाप के अलावा किसी और की तरफ मंसूब होने से मना किया है, आग के द्वारा सज़ा देने से रोका है, जीवितो और मृतकों को आग के द्वारा जलाने से मना किया है, मुस्ला (शव को विकृत) करने से मना किया है, गलत काम, पाप और अत्याचार पर सहयोग करने से मना किया है, अल्लाह की अवज्ञा में किसी आदमी का पालन करने से मना किया है, झूठी क़सम खाने और विनाशकारी शपथ लेने से मना किया है, लोगों की अनुमति के बिना छुप कर उनकी बातें सुनने से रोका है, लोगों के निजी अंगों को देखने से मना किया है, ऐसी चीज़ का दावा करने से जो उसका नहीं है और जो चीज़ आदमी के पास नहीं है उसके होने का इज़हार करने से, और आदमी जो नहीं किया है उस पर प्रशंसा किए जाने का प्रयास करने से मना किया है, किसी के घर में उनकी अनुमति के बिना देखने या झांकने से मना किया है, फुज़ूल खर्ची और अपव्यय से मना किया है, पाप करने की क़सम खाने, जासूसी करने, नेक पुरूषो और महिलाओं के बारे में बदगुमानी करने से मना किया है, एक दूसरे से ईर्ष्या, नफरत, द्वेष करने और पीठ फेरने से मना किया है, बातिल पर जमे रहने, तथा गर्व, घमण्ड, खुदपसन्दी, तथा स्वाभिमानता के तौर पर मस्ती करने और खुशी का प्रदर्शन करने से मना किया है, मुसलमान को अपने दान को वापस लेने से रोका है, भले ही उस को खरीद कर ही क्यों न हो, मज़दूर से पूरा काम लेने और उसे पूरी मज़दूरी न देने से रोका है, बच्चों को उपहार देने में न्याय से काम न लेने से रोका है, अपनी संपूर्ण संपत्ति की वसीयत कर देने और अपने वारिसों को भिखारी छोड़ देने से रोका है, अगर कोई आदमी ऐसा करता है तो उसकी वसीयत को केवल एक तिहाई माल में ही लागू किया जाये गा, पड़ोसी के साथ दुर्व्यवहार करने से रोका है, वसीयत में किसी को नुक़सान पहुँचाने से रोका है, बिना किसी शरई कारण के मुसलमान से तीन दिन से अधिक बातचीत करना छोड़ देने से रोका है, दो अंगुलियों के बीच कंकरी रख कर मारने से रोका गया है, क्योंकि इस से नुकसान पहुँचने का डर है जैसे कि आँख फूट जाना या दाँत टूट जाना, किसी वारिस के लिए वसीयत करने से रोका है क्योंकि अल्लाह तआला ने हर वारिस को उसका हक़ दे दिया है, पड़ोसी को कष्ट पहुँचाने से रोका है, एक मुसलमान को अपने मुसलमान भाई की ओर हथियार के द्वारा संकेत करने से मना किया है, तलवार को मियान से बाहर लेकर चलने से मना किया है ताकि किसी को नुक़सान न पहुँचे, दो आदमियों के बीच उनकी अनुमति के बिना जुदाई पैदा करने से रोका है, उपहार को यदि उसमें कोई शरई आपत्ति न हो तो उसे लौटाने से मना किया है, मूर्ख लोगों को धन देने से रेका है, अल्लाह तआला ने कुछ पुरूषों और महिलाओं को दूसरों पर जो प्रतिष्ठा प्रदान किया है उसकी कामना करने से मना किया है, एहसान जतलाकर और कष्ट पहुँचाकर सद्क़ात व खैरात को नष्ट करने से रोका है, गवाही को छिपाने से मना किया है, अनाथ को दबाने और मांगने वाले को डाँट-डपट करने से रोका है, अशुद्ध और अपवित्र दवा के द्वारा उपचार करने से मना किया है क्योंकि अल्लाह तआला ने उम्मत की शिफा उस चीज़ के अंदर नहीं रखा है जिसे उस पर हराम कर दिया है, युद्ध में बच्चों और महिलाओं को क़त्ल करने से मना किया है, किसी आदमी को किसी पर गर्व करने से रोका है, वादा तोड़ने से मना किया है, अमानत में खियानत करने से मना किया है, बिना ज़रूरत लोगों से मांगने से रोका है, मुसलमान को इस बात से रोका है कि वह किसी मुसलमान को भयभीत करे या हंसी मज़ाक या गंभीरता में उसका सामान ले ले, आदमी को इस बात से रोका है कि वह अपने हिबा या अनुदान को वापस ले ले सिवाय बाप के जो उस ने अपने बच्चे को दिया है (उस को वापस ले सकता है), बिना अनुभव के हकीम बनने से रोका है, चींटी, शहद की मक्खी और हुदहुद (हुपु पक्षी) को क़त्ल करने से मना किया है, पुरूष को पुरूष के निजी भाग और महिला को महिला के निजी भाग को देखने से मना किया है, दो लोगों के बीच उनकी अनुमति के बिना बैठने से मना किया है, केवल जाने पहचाने लोगों को सलाम करने से मना किया है, बल्कि आदमी जिस को जानता पहचानता है और जिस को नही जानता पहचानता है, हर एक को सलाम करेगा, आदमी को शपथ और अच्छे अमल के बीच क़सम को रूकावट नहीं बनाना चाहिये, बल्कि जो अच्छा हो उसे करना चाहिए और क़सम का कफ्फारा देना चाहिए, क्रोध की हालत में दो पक्षों के बीच फैसला करने, या दूसरे पक्ष की बात को सुने बिना किसी एक पक्ष के हक में फैसला करने से मना किया है, आदमी को अपने साथ ऐसी चीज़ लेकर बाज़ार में से गुज़रने से मना किया है जिस से मुसलमानों को तकलीफ पहुँच सकती है जैसे कि बिना कवर के धार वाले सामान, आदमी को इस बात से मना किया है कि वह दूसरे आदमी को उसकी जगह से उठा दे फिर स्वयं उस जगह बैठ जाये, आदमी को अपने भाई के पास से उसकी अनुमति के बिना उठकर चले जाने से मना किया है।
इनके अतिरिक्त अन्य आदेश और प्रतिषेध भी हैं जो मनुष्य और मानवता के सौभाग्य के लिए आये हैं, तो क्या ऐ प्रश्नकर्ता तू ने इस धर्म के समान कोई अन्य धर्म देखा या जाना है?
इस उत्तर को फिर से पढ़, फिर अपने आप से प्रश्न कर : क्या यह घाटे की बात नहीं है कि तू इस धर्म की एक अनुयायी नहीं है?
अल्लाह तआला महान क़ुर्आन में फरमाता है :"और जो व्यक्ति इस्लाम के सिवा कोई अन्य धर्म ढूंढ़े गा, तो वह (धर्म) उस से कदापि स्वीकार नहीं किया जायेगा, और वह आखिरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।" (सूरत आल-इम्रान:85)
अंत में, मैं तुम्हारे लिए और इस उत्तर को पढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह कामना करता हूँ कि उसे सीधे मार्ग पर चलने और सत्य का अनुपालन करने का शुभ अवसर प्राप्त हो।
शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद

स्रोत- http://www.islam-qa.com/hi/ref/islamqa/219/print